लोग जमकर कर रहे EVs का इस्तेमाल, 72 फीसदी बढ़ी पब्लिक चार्जिंग
EV Public Charger: देश के अलग-अलग राज्यों में भी पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों के इस्तेमाल में बड़ा अंतर देखने को मिला है. महाराष्ट्र में सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों पर करीब 378 MU बिजली की खपत हुई.

भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और इसका असर अब देश के पब्लिक चार्जिंग स्टेशन पर भी साफ दिखाई देने लगा है. नए आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में देश के पब्लिक EV चार्जिंग स्टेशनों पर बिजली की खपत एक साल में 72% से ज्यादा बढ़ गई. यह बढ़ोतरी बताती है कि लोग निजी कामों के साथ-साथ कमर्शियल कामकाज के लिए भी इलेक्ट्रिक गाड़ियों को तेजी से अपना रहे हैं.
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में देश के पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों पर करीब 848 मिलियन यूनिट (MU) बिजली की खपत हुई थी. यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 1,460 मिलियन यूनिट हो गया. यानी सिर्फ एक साल में पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों से इस्तेमाल होने वाली बिजली में 72 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई. ऐसे में चार्जिंग स्टेशनों पर EV को चार्ज करने की मांग तेजी से बढ़ रही है.
पहले के मुकाबले बढ़ा इस्तेमाल
- आंकड़ों की सबसे खास बात यह है कि पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों पर इस्तेमाल होने वाली बिजली का बड़ा हिस्सा भारी इलेक्ट्रिक गाड़ियों में किया जा रहा है. कुल बिजली खपत में करीब 74 फीसदी हिस्सा हेवी-ड्यूटी चार्जिंग का रहा. इसमें इलेक्ट्रिक बसें, ट्रक, ज्यादा कैपेसिटी वाली पैसेंजर कोच और कमर्शियल फ्लीट में इस्तेमाल होने वाली गाड़ियां शामिल हैं. वहीं, हल्के और मध्यम श्रेणी के निजी और कमर्शियल इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी रही.

- एक साल पहले तस्वीर थोड़ी अलग थी. फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में हेवी-ड्यूटी गाड़ियों की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी थी, जबकि हल्के और मध्यम वाहनों की हिस्सेदारी 30% थी. यानी अब सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क पर बड़े और कमर्शियल इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल पहले के मुकाबले और बढ़ा है.
महाराष्ट्र सबसे आगे, दिल्ली दूसरे नंबर पर
- देश के अलग-अलग राज्यों में भी पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों के इस्तेमाल में बड़ा अंतर देखने को मिला है. महाराष्ट्र में सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों पर करीब 378 MU बिजली की खपत हुई, जो देश की कुल पब्लिक चार्जिंग बिजली खपत का लगभग 26 फीसदी है. इसके बाद दिल्ली का नंबर रहा, जहां करीब 359 MU बिजली खर्च हुई. वहीं कर्नाटक में 213 MU और तेलंगाना में 111 MU बिजली की खपत दर्ज की गई.
- इन आंकड़ों से पता चलता है कि जहां EV की बिक्री और इस्तेमाल ज्यादा है, वहां चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. खासकर दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ पब्लिक चार्जिंग नेटवर्क की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है. हालांकि CEA का यह आंकड़ा पूरे देश की तस्वीर पूरी तरह नहीं दिखाता.
- रिपोर्ट में कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा शामिल नहीं हो पाया है. इनमें कई राज्य, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पुडुचेरी, चंडीगढ़ और दादरा एवं नगर हवेली शामिल हैं. CEA के मुताबिक इन क्षेत्रों की बिजली वितरण कंपनियों ने संबंधित जानकारी मौजूद नहीं कराई थी. इसलिए राष्ट्रीय बिजली खपत इससे भी ज्यादा हो सकती है.
- पब्लिक चार्जिंग पर बिजली की बढ़ती खपत को भारत में EV की बढ़ती बिक्री से जोड़कर देखा जा सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारत में कुल EV बिक्री 25 लाख यूनिट से ज्यादा रही. इसमें सालाना आधार पर करीब 24.6 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज हुई. कुल नए वाहनों के रजिस्ट्रेशन में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी करीब 8.5 फीसदी तक पहुंच गई. दोपहिया, तिपहिया और पैसेंजर इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में मजबूत बढ़ोतरी देखने को मिली.

ये चीजें करना बेहद जरूरी
- EV की संख्या बढ़ने के साथ सिर्फ ज्यादा इलेक्ट्रिक कार बनाना पर्याप्त नहीं है. उनके लिए पर्याप्त संख्या में चार्जिंग स्टेशन और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था भी जरूरी है. अगर किसी शहर या हाईवे पर EV चार्जिंग की सुविधा कम होगी, तो लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोगों के लिए इलेक्ट्रिक वाहन इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है.
- इसी वजह से CEA पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों से जुड़ी बिजली खपत के आंकड़ों को महत्वपूर्ण मानता है.इन आंकड़ों की मदद से सरकार और बिजली कंपनियां यह समझ सकती हैं कि आने वाले समय में बिजली की मांग कहां और कितनी बढ़ सकती है.इससे बिजली वितरण नेटवर्क की योजना बनाने और भविष्य के लिए जरूरी क्षमता तैयार करने में मदद मिल सकती है.
- भारत सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देकर पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण घटाने की कोशिश कर रही है. देश ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है. ऐसे में परिवहन क्षेत्र का इलेक्ट्रिक होना इस लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
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