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कार चलाते समय टचस्क्रीन देखना कितना खतरनाक? इस रिसर्च ने खोली सबकी आंखें, जानें सारी डिटेल

पिछले कुछ सालों में कारों का इंटीरियर पूरी तरह बदल गया है. जहां पहले डैशबोर्ड पर साफ-सुधरे फिजिकल बटन, नॉब और स्विच होते थे, वही अब उनकी जगह बड़ी-बड़ी टचस्क्रीन ने ले ली है.

अगर आप रोज गाड़ी चलाते हैं तो आपके भी मन में कभी न कभी एक सवाल आया होगा कि आज के जमाने में गाड़ियों का मॉडर्न होना कहां तक सही है? क्या सब कुछ ऑटोमैटिक हो जाने को मॉडर्निटी कहते हैं. एक वक्त था जब आप चाहे जैसे चाहे ड्राइविंग करते समय वो कर सकते थे लेकिन क्या शायद अब ऐसा मुमकिन नहीं है?

जब सुविधा बन गई परेशानी

पिछले कुछ सालों में कारों का इंटीरियर पूरी तरह बदल गया है. जहां पहले डैशबोर्ड पर साफ-सुधरे फिजिकल बटन, नॉब और स्विच होते थे, वही अब उनकी जगह बड़ी-बड़ी टचस्क्रीन ने ले ली है. कार कंपनियों ने इसे भविष्य की ड्राइविंग बताया - काम बटन, ज़्यादा स्क्रीन और पूरी तरह डिजिटल अनुभव.

टचस्क्रीन क्यों लाई गईं?

कार कंपनियों के लिए टचस्क्रीन कई मायनों में फायदेमंद थीं लेकिन कई माईनो में ये ड्राइवर के लिए घातक साबित हो सकता है.एक बड़ी स्क्रीन कई बटनों और वायरिंग की जगह ले सकती थी, जिससे मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट कम होती थी.

सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए नए फीचर्स जोड़े जा सकते थे. इसके अलावा, बड़ी स्क्रीन कार को प्रीमियम और हाई-टेक लुक देती थी, जो खासकर इलेक्ट्रिक और स्मार्ट कारों के दौर में ग्राहकों को आकर्षित करती थी. शुरुआत में यह बदलाव आधुनिक और रोमांचक लगा, लेकिन धीरे-धीरे इसके नुकसान सामने आने लगे.

रिसर्च ने खोली आंखें

2020 में ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च ने इस समस्या को वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया. रिसर्च के अनुसार, ड्राइविंग के दौरान टचस्क्रीन का इस्तेमाल करने से ड्राइवर की प्रतिक्रिया समय में 57 प्रतिशत तक की देरी हो सकती है. यानी खतरे को पहचानने और ब्रेक लगाने में आधे से ज्यादा समय लग सकता है.

यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि हम सभी जानते हैं कि मोबाइल फोन चलाते हुए गाड़ी चलाना कितना खतरनाक माना जाता है. फर्क सिर्फ इतना है कि मोबाइल जेब में होता है, जबकि टचस्क्रीन डैशबोर्ड पर लगी होती है.

नियम भी हो रहे सख्त

ड्राइवरों की बढ़ती शिकायतों और रिसर्च के नतीजों के बाद अब नियामक संस्थाएं भी सतर्क हो गई हैं. अब नियम जनता के हित में होने चाहिए. यूरोपियन यूनियन की स्वतंत्र कार सेफ्टी एजेंसियों ने कार निर्माताओं को साफ संदेश दिया है कि अगर उन्हें पांच-स्टार सेफ्टी रेटिंग चाहिए, तो इंडिकेटर, वाइपर, हॉर्न, हेडलाइट और इमरजेंसी सिस्टम जैसे जरूरी फंक्शन्स के लिए फिजिकल बटन देना अनिवार्य होगा.

इस साल से ऐसे वाहन, जो जरूरत से ज्यादा टचस्क्रीन पर निर्भर होंगे, उन्हें टॉप सेफ्टी रेटिंग मिलना मुश्किल हो जाएगा. यह टचस्क्रीन पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है, बल्कि ड्राइविंग से जुड़े जरूरी कंट्रोल्स को फिर से सहज और सुरक्षित बनाने की कोशिश है.

कार कंपनियां भी बदल रही हैं रास्ता

यह चेतावनी सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रही. दुनिया की बड़ी कार कंपनियां अब अपने फैसलों पर दोबारा विचार कर रही हैं. वोक्सवैगन ने साफ कहा है कि वह अपने नए मॉडल्स में फिजिकल बटन वापस लाएगी. मर्सिडीज़-बेंज, जिसने सालों तक पूरी तरह स्क्रीन-आधारित इंटीरियर को बढ़ावा दिया, अब अपने डिज़ाइन में बदलाव कर रही है. पोर्श और हुंडई जैसी कंपनियाँ भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रही हैं.

भविष्य की कारें कैसी होंगी?

आने वाले समय में टचस्क्रीन पूरी तरह गायब नहीं होंगी. नेविगेशन, रिवर्स कैमरा और कभी-कभार इस्तेमाल होने वाले फीचर्स के लिए स्क्रीन जरूरी रहेंगी. लेकिन रोज़ाना इस्तेमाल होने वाले कंट्रोल — जैसे एसी, वॉल्यूम और लाइट — फिर से ड्राइवर के हाथ की सीधी पहुंच में होंगे.शायद यही असली स्मार्टनेस है. ऐसी कार जो दिखने में भविष्य की हो, लेकिन चलाने में इंसान के लिए सुरक्षित और सहज हो. इसीलिए आज कारों में बटन वापस आ रहे हैं — किसी पुराने ज़माने की याद के लिए नहीं, बल्कि एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य के लिए.

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About the author आशीष दुबे

प्रभावशाली स्टोरीटेलिंग और न्यूज़रूम अनुभव के साथ, मुझे न्यूज़ इंडस्ट्री में 5+ वर्षों का अनुभव है, जहां मैंने ब्रॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों पर काम किया है. एबीपी लाइव के साथ एंकर के रूप में कार्यरत हूं, जहाँ ऑटोमोबाइल बीट पर न्यूज़-ड्रिवन प्रोग्रामिंग, इन-डेप्थ रिव्यूज़ और वेबसाइट स्टोरीज़ पर काम कर रहा हूं.स्पष्टता, विश्वसनीयता और दर्शक-केंद्रित कंटेंट पर फोकस रहता है.

 
 
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