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13 दिन में दो ग्रहण, क्या बदलेगी भारत की राजनीति की दिशा?

India Kundli Prediction 2026: 12 अगस्त को सूर्य ग्रहण, 28 अगस्त को रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण. क्या ये ग्रहण भारत में दिखेंगे और भारत की कुंडली के लिए क्या हैं संकेत बन रहे हैं? पढ़ें पूरी भविष्यवाणी.

India Kundli Prediction 2026: अगस्त 2026 का महीना कैलेंडर में तीन ऐसी तारीखें लेकर आ रहा है. 12 अगस्त को सूर्य ग्रहण, 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के साथ भारत की नई वार्षिक कुंडली की शुरुआत, और 28 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन चंद्र ग्रहण. सिर्फ 17 दिनों के भीतर तीन बड़ी खगोलीय-ज्योतिषीय घटनाएं जो अच्छे संकेत नहीं दे रही हैं.

इतने कम अंतराल में ग्रहणों का आना अपने आप में असामान्य नहीं है. सूर्य और चंद्र ग्रहण अक्सर 15 दिन के अंतर पर जोड़े में आते हैं. असामान्य वह बिंदु है, जहां इस बार का सूर्य ग्रहण लग रहा है.

ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह ठीक उसी जगह पड़ रहा है, जहां 15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत का सूर्य था. सबसे पहले वे फेक्ट समझते हैं, जिसकी वजह से यह महीना चर्चा में है.

क्या दोनों ग्रहण भारत में दिखेंगे?

नहीं. यही इस पूरी कहानी का सबसे जरूरी तथ्य है. 12 अगस्त 2026 का पूर्ण सूर्य ग्रहण मुख्य रूप से आर्कटिक क्षेत्र, ग्रीनलैंड, आइसलैंड और स्पेन में दिखाई देगा. खगोल विज्ञानियों के लिए यह बड़ी घटना है, क्योंकि करीब 27 साल बाद यूरोप की मुख्य भूमि से पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखेगा. स्पेन के कई शहरों में इसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग जुटेंगे. लेकिन भारत में उस समय रात होगी, इसलिए यह ग्रहण यहां बिल्कुल नहीं दिखेगा.

28 अगस्त 2026 का आंशिक चंद्र ग्रहण अमेरिकी महाद्वीपों में सबसे अच्छा दिखेगा. पंचांगों के अनुसार भारतीय समय से यह ग्रहण सुबह से दोपहर के बीच रहेगा. उस समय भारत में दिन रहेगा और चंद्रमा क्षितिज के नीचे होगा, इसलिए यह ग्रहण भी यहां दिखाई नहीं देगा.

धार्मिक नियम की भाषा में इसका सीधा अर्थ यह है कि दोनों ग्रहणों का सूतक काल भारत में मान्य नहीं होगा. शास्त्रों की स्थापित मान्यता है कि जो ग्रहण अपने स्थान से दिखाई ही न दे, उसका सूतक वहां नहीं माना जाता. यानी 28 अगस्त को बहनें बिना किसी संकोच के भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी, मंदिरों के पट खुले रहेंगे, पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यों पर कोई रोक नहीं होगी. सावन पूर्णिमा का यह पर्व अपनी पूरी परंपरा के साथ मनाया जा सकेगा.

तो फिर चर्चा किस बात की है?

यह सवाल जायज है. अगर ग्रहण भारत में दिखेगा ही नहीं, तो ज्योतिषी इसे भारत के लिए अहम क्यों बता रहे हैं?

दरअसल ज्योतिष में इस पर दो मत हैं. एक परंपरा मानती है कि ग्रहण का फल केवल उन्हीं क्षेत्रों पर विचार होता है, जहां वह दिखाई देता है. इस मत से देखें तो अगस्त के दोनों ग्रहण भारत के लिए सामान्य खगोलीय घटनाएं भर हैं, जिनका यहां कोई विशेष फल-विचार नहीं बनता.

लेकिन राष्ट्रों और बड़ी घटनाओं की कुंडली देखने वाली मेदिनी ज्योतिष की परंपरा दूसरी कसौटी अपनाती है. उसमें यह देखा जाता है कि ग्रहण आसमान में राशि चक्र के किस बिंदु पर लग रहा है, और वह बिंदु किसी देश की जन्म कुंडली के किस ग्रह को छू रहा है.

इस परंपरा में ग्रहण का दिखना जरूरी नहीं, उसका देश की कुंडली के संवेदनशील बिंदु से संपर्क ही पर्याप्त माना जाता है. और इसी कसौटी पर अगस्त 2026 का सूर्य ग्रहण असाधारण हो जाता है.

ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह ग्रहण कर्क राशि के आखिरी हिस्से में, आश्लेषा नक्षत्र में लगेगा. भारत की स्वतंत्रता कुंडली, जो 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि, नई दिल्ली के समय पर बनाई जाती है, उसमें देश का सूर्य ठीक इसी जगह स्थित है, कर्क राशि में लगभग 28 अंश पर, आश्लेषा नक्षत्र के चौथे चरण में.

आसान भाषा में कहें तो ग्रहण आसमान में ठीक उसी बिंदु पर लग रहा है, जहां आजादी के क्षण भारत का सूर्य खड़ा था. मेदिनी ज्योतिष में किसी देश के जन्मकालीन सूर्य पर ग्रहण को हल्के में नहीं लिया जाता, क्योंकि राष्ट्र की कुंडली में सूर्य सत्ता, सरकार, शीर्ष नेतृत्व, संवैधानिक संस्थाओं और देश की साख का प्रतिनिधि माना जाता है.

एक और बारीकी है. भारत का सूर्य कर्क राशि के बिल्कुल किनारे पर बैठा है, जहां से अगली राशि सिंह शुरू होती है. ज्योतिष में दो राशियों की इस संधि को बेहद नाजुक क्षेत्र माना जाता है, ठीक वैसे जैसे दो नदियों का संगम, जहां पानी सबसे ज्यादा भंवर खाता है. मान्यता है कि इस बिंदु पर पुरानी व्यवस्थाएं टूटती हैं और नई आकार लेती हैं. ग्रहण इसी संगम के पास पड़ रहा है.

इतिहास क्या कहता है, 1999 और 2008 की मिसालें

किसी भी ज्योतिषीय दावे को परखने का सबसे ईमानदार तरीका इतिहास है.

इससे पहले 11 अगस्त 1999 को भी सूर्य ग्रहण इसी आश्लेषा नक्षत्र में, भारत के जन्मकालीन सूर्य के करीब लगा था. अब 1999 का साल याद कीजिए. अप्रैल में वाजपेयी सरकार लोकसभा में सिर्फ एक वोट से गिर गई थी. मई से जुलाई तक देश करगिल युद्ध लड़ रहा था. और सितंबर-अक्टूबर में मध्यावधि चुनाव हुए, जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा तय की. यानी सत्ता, सेना और जनादेश, तीनों उसी साल कसौटी पर थे.

इसी तरह 1 अगस्त 2008 का सूर्य ग्रहण भी कर्क राशि में लगा था और भारत के कुछ हिस्सों में आंशिक रूप से दिखा भी था. वह साल भी राजनीतिक रूप से कम उथल-पुथल भरा नहीं था. जुलाई में परमाणु करार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार को विश्वास मत का सामना करना पड़ा, दुनिया आर्थिक संकट में उतरी, और नवंबर में मुंबई पर आतंकी हमला हुआ.

ज्योतिषी इन संयोगों को अपनी परंपरा की पुष्टि की तरह देखते हैं. उनका तर्क है कि जब-जब ग्रहण देश के जन्म-सूर्य के आसपास आता है, सत्ता से जुड़े बड़े सवाल सतह पर आ जाते हैं. लेकिन यहां वह ईमानदार पंक्ति भी दर्ज होनी चाहिए, जो अक्सर छूट जाती है, हर ऐसा ग्रहण उथल-पुथल नहीं लाया है. बीते दशकों में कई ग्रहण इसी क्षेत्र में लगे और साल सामान्य ढंग से बीत गए. इसलिए इसे भविष्यवाणी नहीं, एक संवेदनशील संकेत की तरह पढ़ा जाना चाहिए.

यह भी पढ़ें- 24 जुलाई से शुरू हुआ ग्रहों का बड़ा फेरबदल, नौकरी-धन और रिश्तों पर पड़ेगा सीधा प्रभाव

भारत की कुंडली की सबसे दिलचस्प बनावट

अब वह बात, जो इस पूरे विश्लेषण की रीढ़ है और जो आमतौर पर चर्चा से बाहर रह जाती है.

भारत की स्वतंत्रता कुंडली को जब भाव की बारीकी से देखा जाता है, तो सूर्य, बुध, शुक्र और शनि, चारों ग्रह उस घर में आते हैं जिसे ज्योतिष में जनता का घर कहा जाता है. यह घर देश की जमीन, आम लोगों की भावना, खेती, आंतरिक शांति और घर-परिवार के सुख का प्रतिनिधि माना जाता है.

यानी इस कुंडली में सत्ता जनता के घर में बैठी है.

ज्योतिष के जानकार इसे भारत के राजनीतिक मिजाज से जोड़कर देखते हैं. इस देश में सरकारें कानून की किताबों से ज्यादा जनता के मूड से चलती आई हैं. आजादी के बाद के इतिहास में जितनी भी बड़ी राजनीतिक करवटें आईं, चाहे वह कोई आंदोलन हो या सत्ता परिवर्तन, उनकी जड़ में हमेशा जनभावना का ज्वार रहा. कुंडली की भाषा में कहें तो सत्ता और जनभावना यहां एक ही धागे से बंधी हैं. जब भी सूर्य पर दबाव आता है, उसकी गूंज सीधे जनता के बीच सुनाई देती है.

इसी कुंडली में एक और संकेत छिपा है. शुक्र और शनि, दोनों ग्रह सूर्य के इतने करीब हैं कि ज्योतिष की भाषा में अस्त माने जाते हैं, यानी सूर्य के तेज में दबे हुए. शुक्र को अर्थव्यवस्था, कारोबार, महिलाओं और आम जीवन की सुख-सुविधा का कारक माना जाता है, जबकि शनि को किसान, मजदूर, कर्मचारी और दलित-आदिवासी, वंचित वर्ग का सिंबल माना जाता है.

व्याख्या करने वाले कहते हैं कि इसका अर्थ है कि आम आदमी की आवाज अक्सर सत्ता की चमक के पीछे दब जाती है. और ग्रहण वह घड़ी होती है, जब सूर्य की चमक कुछ देर के लिए मंद पड़ती है. मान्यता है कि तभी वे आवाजें सुनाई देने लगती हैं, जो लंबे समय से दबी थीं.

ग्रहों की चाल और तारीखों का मेल

ज्योतिष में हर देश और व्यक्ति की जिंदगी ग्रहों के अलग-अलग दौर से गुजरती मानी जाती है, जिसे दशा कहते हैं. भारत की कुंडली की दशा गणना के अनुसार सितंबर 2025 से देश पर मंगल का दौर चल रहा है, जो सितंबर 2032 तक रहेगा. इसके भीतर 9 फरवरी 2026 से 27 फरवरी 2027 तक मंगल के साथ राहु का दौर सक्रिय है.

अब तारीखें मिलाइए. अगस्त 2026 के दोनों ग्रहण ठीक इसी मंगल-राहु अवधि के बीचोबीच पड़ रहे हैं.

ज्योतिष में मंगल को टकराव, पुलिस, सेना और तेज कार्रवाई का ग्रह माना जाता है, जबकि राहु को भीड़, अफवाह, अचानक फैलने वाली लहर और इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया का कारक. जानकारों के मुताबिक इस जोड़ी के दौर में छोटी घटनाएं असामान्य तेजी से बड़ी बनती हैं. एक वीडियो, एक बयान या एक गिरफ्तारी कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय बहस का रूप ले सकती है.

लेकिन इस दौर का सबसे बड़ा खतरा हिंसा नहीं, भ्रम बताया जाता है. राहु के प्रभाव में सच और झूठ की रेखा धुंधली पड़ती है. कोई पुराना वीडियो नई घटना बनकर फैल सकता है, कोई गढ़ी हुई खबर भीड़ और प्रशासन के बीच चिंगारी बन सकती है.

इसलिए ज्योतिषीय सलाह और व्यावहारिक समझ, दोनों इस दौर में एक ही बात कहती हैं, किसी भी सूचना पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसकी जांच जरूरी है. इस अवधि में किसी भी आंदोलन या विवाद की दिशा भीड़ की ताकत से नहीं, तथ्यों के अनुशासन से तय होगी.

15 अगस्त से भारत की वार्षिक कुंडली और केंद्र में युवा

ज्योतिष की ताजिक परंपरा में हर देश की एक वार्षिक कुंडली बनती है, जो सालाना जन्मदिन के क्षण से अगले एक साल के मोटे रुझान बताती है. भारत की 2026-27 की वार्षिक कुंडली 15 अगस्त की सुबह से प्रभाव में आएगी.

इस कुंडली में तीन बातें ज्योतिषियों का ध्यान खींच रही हैं.

पहली, कुंडली का लग्न सिंह है, जो सत्ता, नेतृत्व और केंद्रीय शासन की राशि मानी जाती है. संकेत यह कि पूरे साल सरकार के फैसले ही राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रहेंगे. लेकिन उसी लग्न में केतु भी बैठा है, जिसे लोगों में यह भावना बढ़ाने वाला ग्रह माना जाता है कि उनकी सुनी नहीं जा रही. यानी एक तरफ सत्ता की चमक, दूसरी तरफ आम लोगों में दूरी का एहसास.

दूसरी, विरोध, टकराव और खुले विरोधियों वाले घर में राहु है, और वार्षिक गणना के अनुसार साल के शुरुआती करीब 55 दिन, 15 अगस्त से 9 अक्टूबर तक, इसी राहु के प्रभाव में गिने जा रहे हैं. जानकारों के अनुसार इस खिड़की में कोई भी मुद्दा, चाहे वह किसी भर्ती परीक्षा से जुड़ा हो, किसी विश्वविद्यालय से, किसी अदालती फैसले से या किसी कार्रवाई से, असामान्य रफ्तार से राष्ट्रीय बहस बन सकता है.

तीसरी और सबसे अहम, वार्षिक कुंडली में साल की ऊर्जा का केंद्र-बिंदु उस घर में बताया जा रहा है, जो युवाओं, विद्यार्थियों, शिक्षा और परीक्षाओं से जुड़ा है. व्याख्या साफ है, पढ़ाई, भर्ती, पेपर लीक और रोजगार जैसे मुद्दों पर नई पीढ़ी इस साल पहले से कहीं ज्यादा मुखर हो सकती है.

और यह पीढ़ी पुरानी राजनीति की भाषा नहीं बोलती. इसे लंबे भाषण नहीं चाहिए, प्रमाण चाहिए. यह वीडियो, दस्तावेज और आंकड़ों से सवाल पूछती है. इसके किसी अभियान का कोई एक बड़ा चेहरा नहीं होता, हजारों छोटे डिजिटल चेहरे होते हैं. यही वजह है कि ऐसी किसी मुहिम को रोकना आसान नहीं होता. एक अकाउंट बंद होता है, तो वही आवाज दूसरे नाम से उठ खड़ी होती है.

रक्षाबंधन के दिन ग्रहण का क्या अर्थ ?

28 अगस्त को सावन पूर्णिमा है, रक्षाबंधन है, और उसी दिन चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में लगेगा. जैसा ऊपर साफ किया गया, यह ग्रहण भारत में दिखेगा नहीं, इसलिए त्योहार पर कोई धार्मिक रोक नहीं है, न राखी के मुहूर्त पर कोई असर.

लेकिन मेदिनी ज्योतिष की नजर से यह ग्रहण वार्षिक कुंडली की उसी सिंह-कुंभ धुरी को छूता है, जिसके एक छोर पर देश की पहचान और दूसरे छोर पर विरोध बैठा है. चंद्रमा को जनता के मन, जनभावना और सामूहिक भावना का कारक माना जाता है.

इसीलिए जानकार ग्रहण के आसपास की अवधि को भावनात्मक रूप से संवेदनशील बता रहे हैं, जब कोई एक घटना लाखों लोगों को अचानक एक भावना से जोड़ सकती है.

ग्रहण किसी घटना की तारीख नहीं बताता. ज्योतिष की मान्यता में उसका प्रभाव पहले से शुरू होकर कई हफ्तों बाद तक चल सकता है. इसलिए 28 अगस्त को ही कुछ होगा, ऐसा कोई दावा कोई गंभीर ज्योतिषी नहीं करता. यह तारीख अलार्म नहीं, एक नाजुक मोड़ की तरह देखी जा रही है.

घबराने की बात है या समझने की?

इन तमाम संकेतों का सार क्या है?

इसे सरकार गिरने या किसी अनहोनी की भविष्यवाणी नहीं मानना चाहिए. यह साल सत्ता के लिए ताकत दिखाने का नहीं, भरोसा बचाने का है. भारत की कुंडली की बनावट ही यही कहती है, जिस कुंडली में सत्ता जनता के घर में बैठी हो, वहां जनता से दूरी सत्ता की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है. अगर आम लोगों और खासकर युवाओं के सवाल समय रहते सुने गए, संवाद का रास्ता खुला रखा गया, तो जानकारों के मुताबिक यही ग्रह-स्थिति बड़े सुधारों की भूमिका भी बन सकती है.

भारत की कुंडली में बैठा द्वितीय भाव का मंगल सरकार को अपनी भाषा यानी बयान पर ध्यान देने के लिए भी कहता है, क्योंकि कई बार वाणी दोष के कारण न चाहते हुए भी ऐसी प्रतिक्रिया हो जाती है जिसे शांत करना एक चुनौती बन जाता है.

कुल मिलाकर ये समय सरकार के लिए चिंतन और कोर टीम को रिव्यू (Reviews) और 'रिस्ट्रक्चर' (Restructuring) करने का है, यदि ऐसा नहीं करते हैं तो भविष्य के बदलाव एक बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़े हो सकते हैं. ध्यान रहे ये समय गलतियां करने का नहीं है.

FAQ 

Q1. क्या 12 अगस्त 2026 का सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई देगा?
नहीं. यह पूर्ण सूर्य ग्रहण ग्रीनलैंड, आइसलैंड और स्पेन में दिखेगा. भारत में उस समय रात होने के कारण यह दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा.

Q2. क्या 28 अगस्त 2026 का चंद्र ग्रहण रक्षाबंधन पर असर डालेगा?
नहीं. यह आंशिक चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए सूतक मान्य नहीं होगा. राखी बांधने के मुहूर्त या पूजा-पाठ पर कोई रोक नहीं है.

Q3. जब ग्रहण भारत में दिखेगा ही नहीं, तो इसका ज्योतिषीय महत्व क्यों बताया जा रहा है?
मेदिनी ज्योतिष (राष्ट्रों की ज्योतिष) की परंपरा में देखा जाता है कि ग्रहण राशि चक्र के किस बिंदु पर लग रहा है. 12 अगस्त का ग्रहण आश्लेषा नक्षत्र में लगेगा, जहां भारत की स्वतंत्रता कुंडली का सूर्य स्थित है. इसी संपर्क के कारण ज्योतिषी इसे अहम मान रहे हैं.

Q4. क्या पहले भी ऐसा संयोग बना है?
हां. 11 अगस्त 1999 का सूर्य ग्रहण भी आश्लेषा नक्षत्र में लगा था, उस साल सरकार गिरी, करगिल युद्ध हुआ और मध्यावधि चुनाव हुए. हालांकि हर ऐसा ग्रहण उथल-पुथल नहीं लाया है, इसलिए इसे संकेत की तरह देखा जाता है, भविष्यवाणी की तरह नहीं.

Q5. भारत की वर्ष कुंडली 2026-27 क्या कहती है?
15 अगस्त 2026 से शुरू हो रही वार्षिक कुंडली सिंह लग्न की है. ज्योतिषियों के अनुसार इस साल सत्ता के फैसले, युवाओं से जुड़े मुद्दे और जनभावना राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं.

यह भी पढ़ें- ग्रहण भारत में न दिखे तो भी क्या लगता है सूतक? जानिए क्या है नियम

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

हृदेश कुमार सिंह । Hirdesh Kumar Singh 

Senior Vedic Astrologer । Head – Religion & Astrology, ABP Live । Lead – ABP Dharma LIVE

हृदेश कुमार सिंह वरिष्ठ वैदिक ज्योतिषाचार्य और मीडिया पेशेवर हैं. उन्हें ज्योतिष, धर्म और मीडिया के क्षेत्र में 17 साल से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे ABP Live में Religion & Astrology वर्टिकल का नेतृत्व करते हैं. साथ ही ABP Dharma LIVE की कंटेंट और डिजिटल रणनीति की जिम्मेदारी संभालते हैं.

उनके काम में ज्योतिषीय लेखन, संपादन, वेबसाइट और वीडियो के लिए विषय चयन तथा संपादकीय योजना शामिल है. वे Search, Google Discover और सोशल मीडिया पर पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर धर्म और ज्योतिष की कवरेज तय करते हैं.

पंचांग, राशिफल, ग्रह गोचर, व्रत-त्योहार और धार्मिक परंपराएं उनके लेखन के प्रमुख विषय हैं. वे करियर, विवाह, शिक्षा और व्यापार से जुड़े सवालों पर भी लिखते हैं. राजनीति और सामाजिक घटनाओं पर उनके ज्योतिषीय विश्लेषण वैदिक गणना, गोचर और मेदिनी ज्योतिष पर आधारित होते हैं. इनमें ग्रह स्थितियों को संभावित संकेतों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

उन्होंने Indian Institute of Mass Communication (IIMC), नई दिल्ली से पत्रकारिता और IIMT University, मेरठ से ज्योतिष शास्त्र एवं वास्तु शास्त्र की शिक्षा ग्रहण की है. वे AstroSage और Astrotalk जैसे प्लेटफॉर्म के साथ भी काम कर चुके हैं. उन्होंने Semrush Academy से 'Content Marketing Essentials for SEO and AI Search with Semrush' सर्टिफिकेशन प्राप्त किया है.

नई पीढ़ी के पाठकों के लिए उन्होंने 'Gen-Z Horoscope' जैसे प्रारूप पर काम किया है. इसमें पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और रोजमर्रा के फैसलों से जुड़े सवालों को राशिफल में जगह दी गई है. उनके लेख धार्मिक परंपराओं से जुड़े उन प्रश्नों पर भी केंद्रित होते हैं, जो बदलती जीवनशैली में सामने आते हैं.

वैदिक ज्योतिष, होरा शास्त्र, संहिता, मेदिनी ज्योतिष, अंक ज्योतिष, शकुन शास्त्र और वास्तु उनके अध्ययन एवं लेखन के विषय हैं. उनका मानना है, 'ज्योतिष केवल भविष्य बताने की विद्या नहीं, बल्कि समय को समझने की कला है.'

ज्योतिष और मीडिया के अलावा उन्हें सिनेमा, संगीत, साहित्य, राजनीति, पर्यावरण, ग्रामीण जीवन और यात्राओं में विशेष रुचि है.

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