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दिवाली पर 'भूतों' की एंट्री! Gen-Z का नया Diwaloween ट्रेंड

Diwaloween 2026: दिल्ली-NCR में दिवाली से पहले हैलोवीन थीम की चर्चा क्यों है? जानें Gen-Z के बीच दीये, कद्दू और भूतिया सजावट का नया ट्रेंड.

Diwaloween 2026: दिवाली से पहले दिल्ली-NCR में दीयों और रंगोली के साथ भूतिया सजावट की भी चर्चा है. कहीं डरावने मुखौटे तो कहीं कद्दू पर बने अजीबोगरीब चेहरे. Gen-Z के बीच दिवाली और हैलोवीन को मिलाकर जश्न मनाने का यह अंदाज आखिर क्यों पसंद किया जा रहा है?

दिवाली पर घरों में दीये जलते हैं, रंगोली सजती है और हर तरफ रोशनी नजर आती है. लेकिन सोचिए, इन्हीं दीयों के बीच अचानक भूतिया चेहरे, कंकाल और मकड़ी के जाले दिखाई देने लगें तो कैसा लगेगा? दिल्ली-NCR में त्योहारों की थीम पार्टियों के बीच कुछ ऐसा ही प्रयोग चर्चा में है. इसे नाम दिया गया है Diwaloween.

इस बार 31 अक्टूबर को हैलोवीन है और 8 नवंबर को दिवाली मनाई जाएगी. दोनों त्योहारों के बीच महज आठ दिनों का अंतर है. ऐसे में कुछ युवा दिवाली की पारंपरिक सजावट को हैलोवीन के डरावने अंदाज के साथ मिलाकर जश्न मनाने का प्रयोग कर रहे हैं.

आखिर क्या है Diwaloween, क्यों चर्चा में आया यह नाम?

Diwaloween दो शब्दों Diwali और Halloween को मिलाकर बना है. इसमें दिवाली के दीये, रंगोली और पारंपरिक कपड़ों के साथ हैलोवीन के कद्दू, डरावने मुखौटे और भूतिया सजावट शामिल की जाती है.

इस थीम की सबसे दिलचस्प बात दोनों त्योहारों का विरोधाभास है. एक तरफ अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश है, तो दूसरी तरफ डरावने चेहरों और रहस्यमयी सजावट का आकर्षण. इसी मेल को पार्टी और सोशल मीडिया के लिए अलग अंदाज में पेश किया जा रहा है.

दिल्ली-NCR में Gen-Z क्यों कर रहा ऐसा प्रयोग?

नोएडा, गुरुग्राम और दिल्ली में थीम पार्टियों का चलन नया नहीं है. लेकिन Diwaloween में भारतीय त्योहार और पश्चिमी पॉप कल्चर को एक साथ पेश किया जा रहा है.

इसकी एक वजह सोशल मीडिया भी है. युवाओं के बीच ऐसी सजावट और पोशाकों का आकर्षण रहता है, जो तस्वीरों और रील्स में अलग दिखाई दें. पारंपरिक कुर्ते के साथ डरावना मेकअप, दीयों के बीच कद्दू और रंगोली के आसपास नकली मकड़ी के जाले इसी प्रयोग का हिस्सा हैं.

हालांकि इसे पूरे दिल्ली-NCR में व्यापक स्तर पर अपनाया जा रहा ट्रेंड कहना अभी जल्दबाजी होगी.

क्या दिवाली पर भूतिया सजावट करना धार्मिक परंपरा का हिस्सा है?

नहीं. हिंदू धार्मिक परंपराओं में Diwaloween नाम का कोई पर्व नहीं मिलता. दिवाली का संबंध भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा, दीपदान और सुख-समृद्धि की कामना से है.

दूसरी ओर हैलोवीन की जड़ें पश्चिमी सांस्कृतिक परंपराओं में हैं. आज इसे मुख्य रूप से डरावनी वेशभूषा, कद्दू की सजावट और पार्टियों के लिए जाना जाता है.

इसलिए Diwaloween को किसी धार्मिक अनुष्ठान के बजाय मनोरंजन और सजावट की फ्यूजन थीम के रूप में देखना अधिक उचित है.

क्या अब दिवाली मनाने का तरीका बदल रहा है?

Diwaloween की चर्चा से यह सवाल जरूर उठता है कि क्या नई पीढ़ी त्योहारों को मनाने का तरीका बदल रही है. हालांकि किसी पार्टी की थीम बदलने का मतलब धार्मिक परंपराओं का बदलना नहीं है.

दिवाली पर लक्ष्मी पूजा, दीप जलाने और परिवार के साथ उत्सव मनाने की अपनी जगह है. Diwaloween फिलहाल इसके आसपास जुड़ा एक मनोरंजक प्रयोग है.

दिलचस्प बात यह है कि जिस दिवाली पर घर से अंधकार दूर करने के लिए दीप जलाए जाते हैं, उसी की सजावट में डरावने चेहरों को जगह दी जा रही है. यही वजह है कि Diwaloween का नाम सुनकर लोग हैरान भी हो रहे हैं और इसके बारे में जानना भी चाहते हैं. अब देखना होगा कि यह प्रयोग केवल इस साल की पार्टियों तक सीमित रहता है या अगले साल भी दिवाली से पहले इसकी चर्चा सुनाई देगी.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

हर्षिका मिश्रा । धर्म और ज्योतिष पत्रकार

हर्षिका मिश्रा ABP Live में धर्म और ज्योतिष से जुड़े विषयों पर लिखती हैं. उन्हें ज्योतिष के क्षेत्र में तीन वर्षों का अनुभव है. पिछले एक वर्ष से वे धर्म और ज्योतिष की डिजिटल कवरेज पर काम कर रही हैं. उनके लेखन के प्रमुख विषय ग्रह गोचर, राशिफल, व्रत-त्योहार और धार्मिक परंपराएं हैं.

उन्होंने नई दिल्ली स्थित AIMC से टेलीविजन और रेडियो प्रोडक्शन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उनकी पढ़ाई में स्क्रिप्ट लेखन और वीडियो प्रोडक्शन शामिल रहे हैं. वे लेख और वीडियो स्क्रिप्ट के जरिए धर्म व ज्योतिष से जुड़े सवालों को सरल भाषा में समझाती हैं.

वैदिक ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु और शकुन शास्त्र उनके अध्ययन एवं लेखन के विषय हैं. वे नई पीढ़ी के पाठकों के लिए करियर, पढ़ाई और रिश्तों से जुड़े प्रश्नों पर भी लिखती हैं. उनका ध्यान ज्योतिषीय शब्दों का अर्थ और किसी व्याख्या का आधार स्पष्ट करने पर रहता है.

उनका मानना है कि ज्योतिष से जुड़ी जानकारी डर पैदा करने के बजाय सोचने और अपनी परिस्थितियों को समझने में मदद करनी चाहिए. वे ज्योतिषीय आकलनों को संभावित संकेतों के रूप में देखती हैं और व्यक्तिगत प्रयास व जिम्मेदारी को महत्व देती हैं.

श्रीमद्भगवद्गीता का कर्म सिद्धांत उनकी सोच को प्रभावित करता है. पत्रकारिता और ज्योतिष के अलावा उन्हें संगीत, साहित्य और यात्राओं में रुचि है.

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