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Barley Cultivation: सही समय पर जौ की करेंगे बुवाई तो होगी बंपर कमाई, कम लागत में अच्छी पैदावार के लिये लगायें ये किस्में

Barley Farming: दिसंबर तक 100 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीजों से जौ की बुवाई का कम कर सकते हैं. इसके बाद करीब 35 से 40 क्विंटल तक दाने और 20 से 75 क्विंटल तक पशु चारे की पैदावार मिल जाती है.

Top Varieties of Barley: जौ एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जो गेहूं के मुकाबले कम संसाधनों में ही पककर तैयार हो जाती है. आजकल सेहत के प्रति जागरुक हेल्थ फ्रीक लोग भी गेहूं की जगह जौ से बने उत्पादों का सेवन कर रहे हैं, जिसके चलते जौ की डिमांड (Barley Demand) देश दुनिया में बढ़ती जा रही है. दुनियाभर जौ की खेती (Jau Ki Kheti) बड़े पैमाने पर की जाती है. रूस, यूक्रेन, अमरीका, जर्मनी, कनाडा और भारत भी इसके प्रमुख उत्पादक देशों में शामिल है.

बता दें कि भारत में जौ को पोषक अनाज के साथ-साथ संस्कृति और धर्म से भी जोड़ा जाता है. तभी तो हर शुभ काम की शुरूआत जौ के साथ ही होती है. इसकी खेती के लिये रबी सीजन (Rabi Season 2022) में बुवाई की जाती है. इस समय ना सिर्फ बीजों का अच्छा जमाव होता है, बल्कि पौधों के विकास में भी मदद मिलती है. यही कारण है कि अब देश में गेहूं की जगह जौ की व्यावसायिक खेती (Barley Cultivation) को बढ़ावा दिया जा रहा है. 

जौ का इस्तेमाल
जौ का इस्तेमाल (Barley Foods) कई प्रकार के खाद्य पदार्थों में किया जाता है. यहां आटे से लेकर, बेकरी उत्पाद, हेल्दी ड्रिंक्स और दवाईयां बनाने तक में जौ का प्रयोग होता है. यह सिर्फ इसानों के लिये ही नहीं, बल्कि दुधारु पशुओं के लिये भी पोषण का काम करती है, इसलिये इसका हरा चारा, सूखी भूसी, साइलेज और फीड के रूप में पशुओं को खिलाया जाता है.

जौ की उन्नत किस्में (Top Varieties of Barley)
जौ सिर्फ एक खाद्यान्न फसल ही नहीं है, बल्कि इसके अपने औषधी महत्व भी है. इसके सेवन से स्वास्थ्य बेहतर रहता ही है, साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता भी मजबूत रहती है, इसलिये किसानों को इसकी उन्नत किस्मों से ही बुवाई करनी चाहिये, ताकि इसकी उपज से भरपूर पोषण मिल सके. वैज्ञानिकों ने सिंचित, असिंचित, क्षारीय और लवणीय भूमि के लिये अलग-अलग किस्में बताई है, जिनसे खेती करके काफी अच्छा उत्पादन ले सकते हैं. 

सिंचित इलाकों के लिये किस्में
डी डब्लू आर बी- 52, डी डब्लू आर- 28, आर डी- 2552, आर डी- 2668, आर डी- 2503, आर डी- 2592 (राजस्थान)  डी एल- 83, बी एच- 902, पी एल- 426 (पंजाब) आदि किस्में सिंचित इलाकों में अगेती खेती करने पर काफी अच्छी पैदावार देती हैं.

  • वहीं जौ की पछेती खेती के लिये आर डी- 2508, डी एल- 88 आदि किस्मों से बुवाई करना फायदेमंद साबित होता है.
  • असिंचित या कम पानी इलाकों में भी जौ का बंपर उत्पादन ले सकते हैं. इस काम में जौ की आर डी- 2508, आर डी- 2624, आर डी- 2660, पी एल- 419 (पंजाब) आदि किस्मों से बुवाई करनी चाहिये.

क्षारीय एवं लवणीय भूमि की किस्में
अकसर कई इलाकों की मिट्टी क्षारीय और लवणीय होती है, जिसके चलते जमीन पर किसी भी तरह की फसल का उत्पादन लेना लगभग नामुमकिन ही होता है, लेकिन हमारे वैज्ञानिकों ने इन इलाकों के लिये भी उन्नत किस्में विकसित की है. इसमें आर डी- 2552, डी एल- 88, एन डी बी- 1173 आदि किस्में प्रमुख है. 

  • इसके अलावा माल्ट जौ के लिये बी सी यु- 73 अल्फा- 93, डी डब्लू आर यु बी- 52 आदि किस्मों से भी बुवाई कर सकते हैं.
  • पशु चारे के लिहाज से जौ की खेती के लिये आर डी- 2715, आर डी- 2552 आदि किस्में काफी अच्छा उत्पादन देती है.

मिट्टी और जलवायु
जौ की खेती (Barley Cultivation) के लिये हर तरह की मिट्टी, सीमित संसाधन और कम पानी में भी बंपर पैदावार देती है. इसकी व्यावसायिक खेती (Commercial farming of Barley) करने के लिये दोमट मिट्टी को सबसे बेहतर मानते हैं. वहीं हल्की नम और ठंडी जलवायु ही जौ की बुवाई के लिये सबसे उपयुक्त रहती है. किसान चाहें तो जौ की जैविक खेती करके काफी अच्छा उत्पादन (Barley Production) ले सकते हैं. कृषि विशेषज्ञों की मानें तो अक्टूबर से लेकर दिसंबर तक का समय तक 100 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीजों से जौ की बुवाई (Top Barley Seeds) का कम कर सकते हैं. जिसके बाद करीब 35 से 40 क्विंटल तक दाने और 20 से 75 क्विंटल तक पशु चारे (Barley Animal Fodder) की पैदावार मिल जाती है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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