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Indian Agriculture After Independence: आजादी के बाद भारतीय खेती कितनी बदली? देखें पूरा सफर

Indian Agriculture After Independence: खेतों में बैल और पारंपरिक औजारों की जगह ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनें पहुंच चुकी हैं, सिंचाई के साधन बढ़े हैं और किसान मोबाइल से मौसम और मंडी की जानकारी ले रहे हैं.

Indian Agriculture After Independence : आजादी के समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देश की बड़ी आबादी का पेट भरने की भी चुनौती थी. उस समय खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर थी, पैदावार कम थी और देश को खाने के लिए दूसरे देशों से मदद लेनी पड़ती थी. वहीं आज तस्वीर काफी बदल चुकी है. खेतों में बैल और पारंपरिक औजारों की जगह ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनें पहुंच चुकी हैं, सिंचाई के साधन बढ़े हैं और किसान मोबाइल से मौसम और मंडी की जानकारी हासिल कर रहे हैं. अब खेती ड्रोन और AI जैसी तकनीकों तक पहुंच गई है. ऐसे में आइए जानते हैं कि आजादी के बाद भारतीय खेती कितनी बदली है. 

1947 बनाम आज की खेती

1947 में आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था में खेती की बहुत बड़ी भूमिका थी. उस समय करीब 72 प्रतिशत कामगार खेती से जुड़े हुए थे और देश की GDP में कृषि का योगदान लगभग आधा था. तब भारत में करीब 5 करोड़ टन खाद्यान्न पैदा होता था. ज्यादातर किसान बारिश के भरोसे खेती करते थे और हल-बैल जैसे पारंपरिक साधनों का इस्तेमाल करते थे. अच्छे बीज, खाद और आधुनिक तकनीक की सुविधा बहुत कम थी, इसलिए फसलों की पैदावार भी कम होती थी और देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे देशों से अनाज और मदद लेनी पड़ती थी. इसके अलावा खेती की जमीन का बंटवारा भी बराबर नहीं था. जमींदारी, रैयतवारी और महलवारी जैसी पुरानी व्यवस्थाओं के कारण बड़ी मात्रा में जमीन जमींदारों और बिचौलियों के पास थी.

भूमि सुधार से खेती 

आजादी के बाद सरकार ने कृषि व्यवस्था में बदलाव के लिए भूमि सुधारों पर जोर दिया. जे.सी. कुमारप्पा की अध्यक्षता वाली कृषि सुधार समिति ने राज्य और किसान के बीच बिचौलियों को हटाने की सिफारिश की. 1951 से जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू हुई. इससे करीब 2 करोड़ किसानों का राज्य के साथ सीधा संबंध बना. इसके साथ किरायेदारी सुधार, भूमि सीमा कानून और बिखरी हुई जोतों के समेकन जैसे कदम भी उठाए गए. हालांकि इन सुधारों को सभी राज्यों में एक जैसी सफलता नहीं मिली. 

हरित क्रांति बनी बड़ा टर्निंग पॉइंट

1960 के दशक में लगातार खाद्य संकट और सूखे के बीच भारत ने खेती को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया. इसी दौर में हरित क्रांति की शुरुआत हुई. इसमें HYV यानी अधिक पैदावार देने वाले बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक, सिंचाई और कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा दिया गया.  एम.एस. स्वामीनाथन ने भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल गेहूं की नई किस्मों को बढ़ावा देने में जरूरी भूमिका निभाई. नतीजा यह हुआ कि गेहूं का उत्पादन 1965 में करीब 1.2 करोड़ टन से बढ़कर 1970 तक 2 करोड़ टन हो गया. 1950-51 में करीब 5 करोड़ टन का खाद्यान्न उत्पादन आज 31.4 करोड़ टन से ज्यादा पहुंच चुका है. 

सिंचाई और MSP

हरित क्रांति के साथ सिंचाई का विस्तार हुआ. नहरों और ट्यूबवेल के बढ़ते नेटवर्क ने किसानों की मानसून पर निर्भरता कम की, भाखड़ा-नांगल और दामोदर घाटी जैसी परियोजनाओं ने भी सिंचाई व्यवस्था को मजबूत किया.  किसानों को बाजार में सुरक्षा देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP और सरकारी खरीद व्यवस्था को भी बढ़ावा मिला. इससे आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन मिला. 

ड्रोन का भारतीय खेती बदलाव में सफर 

पहले किसान खेतों में कीटनाशक और खाद का छिड़काव हाथ से करते थे, जिसमें ज्यादा समय और मेहनत लगती थी. अब कृषि ड्रोन कम समय में बड़े खेतों में समान रूप से छिड़काव करने में मदद कर रहे हैं. एक कृषि ड्रोन करीब एक घंटे में 10-15 एकड़ तक क्षेत्र कवर कर सकता है, जबकि मैनुअल छिड़काव में एक कर्मचारी दिनभर में लगभग 1-2 एकड़ ही कर पाता है. ड्रोन की मदद से फसलों में कीट और बीमारियों की जल्दी पहचान भी हो सकती है, जिससे समय पर सही जगह उपचार किया जा सके. 

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AI और डिजिटल एग्रीकल्चर 

अब खेती में AI और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है. डिजिटल एग्रीकल्चर ने भारतीय खेती को पारंपरिक तरीकों से निकालकर डिजिटल और डेटा आधारित खेती की ओर बढ़ाया है.  आज किसान मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए मौसम, फसल, कीट, बीमा और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकते हैं. डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत अब तक 7.63 करोड़ किसानों की डिजिटल ID बन चुकी है, जिनमें 1.93 करोड़ महिला किसान भी शामिल हैं. 

किसान ई-मित्र चैटबॉट रोजाना 8,000 से ज्यादा सवालों के जवाब दे रहा है और 11 क्षेत्रीय भाषाओं में काम करता है. AI का इस्तेमाल फसल निगरानी में भी हो रहा है. वहीं भारत-विस्तार जैसे AI टूल के जरिए किसानों को उनकी अपनी भाषा में मौसम, मिट्टी, फसल और सरकारी योजनाओं से जुड़ी सलाह देने की तैयारी है.
 
आजादी के बाद भारतीय खेती उत्पादन में बदलाव

आजादी के बाद भारतीय खेती में सबसे बड़ा बदलाव फसल उत्पादन के स्तर पर देखने को मिला है. 1950-51 में देश का खाद्यान्न उत्पादन करीब 5 करोड़ टन था. गेहूं का उत्पादन 1965 में करीब 1.2 करोड़ टन से बढ़कर 1970 तक करीब 2 करोड़ टन हो गया. आज भारत का खाद्यान्न उत्पादन 31.4 करोड़ टन से ज्यादा पहुंच चुका है.

यह भी पढ़ें - कृषि छात्रों के सीधे खाते में आएगा पैसा, सरकार ने कर दिया बड़ा ऐलान

मानसी उपाध्याय करीब दो साल से डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ी मानसी ने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी की. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की और वर्तमान में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म कर रही हैं. पत्रकारिता में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अक्टूबर 2024 में एबीपी नेटवर्क से की. अब वह डिजिटल कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें फीचर और इंफॉर्मेटिव स्टोरीज लिखने के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटिंग, सोशल मीडिया और रिसर्च आधारित कंटेंट तैयार करने में रुचि है. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली मानसी ऐसी स्टोरीज लिखना पसंद करती हैं, जो पाठकों को नई और जरूरी जानकारी आसान भाषा में दें. उनकी कोशिश रहती है कि कंटेंट सिर्फ जानकारी देने वाला ही नहीं, बल्कि पढ़ने में दिलचस्प और पाठकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ भी हो.

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