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बीज बोने का झंझट हमेशा के लिए खत्म, इस नई प्रो-ट्रे तकनीक से किसान बचा रहे हैं कीमती समय

Pro-Tray Technology For Farming: प्रो-ट्रे तकनीक से किसानों को अब खेतों में बीज बोने की जरूरत नहीं है. कोकोपीट और ऑर्गेनिक खाद की मदद से पॉलीहाउस में महज 21 दिनों में पौधे तैयार हो जाते हैं.

Pro-Tray Technology For Farming: खेती में अब धीरे-धीरे पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक तकनीक ले रही है. पहले जहां बीज बोकर लंबे समय तक फसल के अंकुरण और बढ़वार का इंतजार करना पड़ता था. वहीं अब प्रो-ट्रे तकनीक किसानों के लिए फायदे वाली साबित हो रही है. इस तकनीक से किसान सीधे तैयार पौधे खेत में लगा रहे हैं. 

जिससे न सिर्फ समय बच रहा है बल्कि उत्पादन की क्वालिटी भी बेहतर हो रही है. इस तकनीक को अपनाकर सब्जी उत्पादन का पूरा तरीका ही बदल दिया है. इससे कम समय में ज्यादा और बेहतर फसल ली जा सकती है. जान लीजिए कैसे इस्तेमाल होती है यह तकनीक.

प्रो-ट्रे तकनीक से कैसे तैयार होते हैं मजबूत पौधे?

प्रो-ट्रे तकनीक में बीज को सीधे खेत में बोने के बजाय छोटे-छोटे ट्रे में तैयार किया जाता है. इसमें नारियल के बुरादे यानी कोकोपीट और जैविक खाद का इस्तेमाल किया जाता है. जिससे पौधों को शुरुआती पोषण आसानी से मिल जाता है.

करीब 21 दिनों के अंदर ही पूरी तरह स्वस्थ और वायरस मुक्त पौधे तैयार हो जाते हैं. खास बात यह है कि पॉलीहाउस में तैयार होने के कारण इन पौधों पर मौसम, तेज बारिश या कीटों का कोई खास असर नहीं पड़ता.

इन सब्जियों में होता है फायदा

इस तकनीक से शिमला मिर्च, बैंगन और टमाटर जैसी सब्जियां बहुत तेजी से तैयार होती हैं. जबकि खीरा और करेला जैसे पौधे भी सिर्फ तीन हफ्तों में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इससे किसानों को मजबूत शुरुआत मिलती है और फसल की सफलता की संभावना बढ़ जाती है.

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समय और लागत दोनों में बड़ी बचत

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है. जहां पारंपरिक खेती में फसल को तैयार होने में लगभग तीन महीने लग जाते हैं, वहीं प्रो-ट्रे तकनीक से यही फसल करीब दो महीने में ही उत्पादन देने लगती है. इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है. क्योंकि जल्दी फसल आने से बाजार में जल्दी बिक्री शुरू हो जाती है. 

मुनाफा भी तेजी से बढ़ता है

इस तकनीक से खेती की लागत लगभग आधी हो जाती है. क्योंकि बीज की बर्बादी कम होती है और देखभाल भी नियंत्रित माहौल में होती है. इसके अलावा पौधों की गुणवत्ता बेहतर होने से नुकसान की संभावना भी घट जाती है. यही वजह है कि अब धीरे-धीरे किसान इस आधुनिक तरीके की ओर बढ़ रहे हैं और इसे खेती का भविष्य माना जा रहा है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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