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Banana Cultivation: विदेशों तक निर्यात हो सकता है आपके खेतों का केला, इस किस्म की बागवानी करें

Banana Farming: इस किस्म से आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बागवानी की जा रही है. उन्नत तकनीकों को अपनाकर इससे केलों का 50 से 70 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी ले सकते है.

Cavendish Banana Cultivation: केला एक ऐसा फल है, जिसकी खपत देश और दुनिया में बनी रहती है. बेहतर उत्पादन (Banana Production) और अच्छा मुनाफा कमाने के लिए किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ केले की बागवानी (Banana Cultivation) कर रहे हैं. वैसे तो बढ़ती खपत के कारण साधारण किस्मों की पांरपरिक खेती की जा रही, लेकिन देश-विदेश में बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुये कावेन्डीश समूह (Cavendish Banana) के केलों की व्यवसायिक खेती भी फायदे का सौदा साबित हो सकती है. बता दें कि केले के कुल उत्पादन का 60% हिस्सा कावेन्डीश समूह के केलों पर आधारित है. यही कारण है कि केले की खेती में भविष्य तलाशने वाले किसानों को कावेन्डीश समूह के केलों की बागवानी (Cavendish Banana Cultivation) शुरू कर देनी चाहिये.

कावेन्डीश समूह का केला
कावेन्डीश समूह के केलों की बागवानी करने का सबसे बड़ा फायदा है कि इस किस्म में पनामा विल्ट रोग की संभावनाएं काफी कम रहती हैं. वहीं साधारण किस्मों की तुलना में कावेन्डीश समूह के केलों का उत्पादन ज्यादा होता है. बता दें कि अलग-अलग मिट्टी, जलवायु, तकनीक और जोखिमों के बीच कावेन्डीश समूह के केलों की खेती 40 से 50 किलोग्राम प्रति समूह का उत्पादन ले सकते हैं. 

  • भारत में इसे बसराई, जहाजी, काबुली, पाचा वाज्हाई, मारीसस, मौरीस, कुज्ही, वाज्हाई, सिन्धुरनी एवं सिंगापुरी आदि नामों से भी जानते हैं.  
  • कावेन्डीश समूह के केले का पौधा लंबाई में काफी छोटा होता है, जिसकी लंबाई 1.5 से 1.8 मीटर तक ऊंची होती है.
  • इस किस्म के फल भी आकार में लंबे और झुके हुए होते हैं. हल्की पीली और हरे रंग की छाल कावेन्डीश समूह के केला का गूदा मुलायम और काफी मीठा होता है.
  • इसके एक ही फल का वजन 20 से 25 ग्राम तक होता है और एक समूह से 120 से 130 फलों का उत्पादन ले सकते हैं, 
  • बता दें कि कावेन्डीश समूह का फसल चक्र 10 से 12 महीने का होता है. इस बीच फसल प्रबंधन के उन्नत तरीकों को अपनाना चाहिये.

इन तकनीकों को अपनायें
बता दें कि कावेन्डीश समूह (Cavendish Banana) के केलों की बागवानी आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वी उत्तर प्रदेश में की जा रही है, जहां किसान कम संसाधनों में भी काफी अच्छा मुनाफा ले रहे हैं. किसान चाहें तो कावेन्डीश समूह किस्म से 50 से 70 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी ले सकते हैं. इतने अच्छे परिणामों के लिये कुछ सानधानियों को अमल में लाना चाहिये.

जाहिर है कि ज्यादातर किसान अपनी मेहनत के मुताबिक केला का अधिक उत्पादन नहीं ले पाते. अकसर कीट-रोगों का प्रकोप और मौसम की अनिश्चितताओं के कारण भी केला का उत्पादन काफी हद तक प्रभावित होता है. ऐसी स्थिति में बागवानी के उन्नत तरीकों को बदलना चाहिये. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, केला के नये बाग लगाने के लिये टिशू कल्चर से तैयार पौधों की रोपाई करनी चाहिये. इन पौधों की रोगप्रतिरोधी क्षमता मजबूत होती है, जिसके चलते नुकसान की संभावनायें काफी कम हो जाती है. 

वहीं खुली सिंचाई करने पर केला के बागों में पानी का जमाव होता है, जिससे फसल खराब हो जाती है. ऐसे में टपक सिंचाई का इस्तेमाल करना फायदेमंद और किफायती रहेगा. इस तरह पानी के साथ-साथ दूसरे पोषक तत्वों को फसल तक पहुंचाकर सिंचाई के साथ-साथ पोषण प्रबंधन का काम भी निपटा सकते हैं.

जाहिर है कि बागवानी फसलों के साथ-साथ मधुमक्खी पालन (Bee Farming in Banana Orchards) का चलन भी बढ़ता जा रहा है. केला की बागवानी के साथ भी मधुमक्खी पालन (Bee Keeping) करके ना सिर्फ फलों की क्वालिटी बेहतर रहेगी, बल्कि शहद (Honey Production) के जरिये अतिरिक्त आमदनी भी कमा सकते हैं.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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