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मजबूर हैं क्योंकि....हम मजदूर है!
आक्रोश है...बवाल है...और हंगामा है...सबकुछ है कोरोना काल की इस अनंत कथा में...मजबूर है क्योंकि वो मजदूर है...उसे नहीं पता बस का टिकट कहां से लेना है...उसे नहीं पता कि ऑन लाइन रिजर्वेशन कैसे मिलेगा...सरकारी वेबसाइट पर निकले फॉर्म की भी उसे कोई जानकारी नहीं शायद...सड़क पर पलायन करते उस मजदूर को किसी आदेश की खबर मिले भी तो कैसे...वो तो रुकता भी है तो रोटी की जुगाड़ के लिए...मजबूरी की ये अनंत कथा अब शहर शहर कहर बरपा रही है...सब्र का बांध टूट चुका है शायद...
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