बीमार हुए तो भी कटेगी सैलरी, सिक लीव पर नए नियम जारी, मजदूरों का शोषण करने पर अड़ा ये देश
Sick Leave Policy: यूरोप में कर्मचारी सबसे ज्यादा सिक लीव लेते हैं, इसी दर को देखते हुए एक नया फैसला किया गया है. इस फैसले से उत्पादकता बढ़ेगी और काम में सुधार होगा.

Sick Leave News: सिक लीव कर्मचारियों का हक है, जो एचआर पॉलिसीज के तहत दिया जाता है. इसके बदले में अब तक तो सैलरी कटने का कोई प्रावधान नहीं था. श्रम कानून भी कर्मचारियों और मजदूरों को बीमार होने पर छुट्टी देता है. लेकिन हाल ही में यूरोप में सिक लीव को लेकर एक ऐसा बदलाव किया गया है, जिससे कर्मचारियों और मजदूरों के बीच आक्रोश देखा जा रहा है.
सिक लीव लेने पर कटेगी सैलरी
हाल ही में जर्मनी में कर्मचारियों की सिक लीव को लेकर एक नया प्रस्ताव सामने आया है. फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इस नए प्रस्ताव के तहत अब कर्मचारियों की सिक लीव लेने पर सैलरी काटी जाएगी. ये सुझाव कुछ आर्थिक विशेषज्ञों और नियोक्ता संगठनों ने दिया है. ये फैसला बार-बार सिक लीव लेने वाले कर्मचारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए लिया गया है. इस प्रस्ताव का उद्देश्य कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव को कम करना है.
अब तक क्या थे नियम?
अभी तक जो नियम थे उनके मुताबिक कर्मचारियों को 6 हफ्ते तक सिक लीव लेने पर भी अपना पूरा वेतन दिया जाता था. इसके बाद हेल्थ इंस्योरेंस कंपनियां भुगतान की जिम्मेदारी संभालती थीं. लेकिन पिछले कुछ सालों में बढ़ती सिक लीव की वजह से कंपनियों का खर्च बढ़ गया है. नियोक्ता संगठनों का कहना है कि कुछ मामलों में सिक लीव का दुरुपयोग भी होता है, जिससे उत्पादकता प्रभावित होती है. इसी वजह से सख्त नियम लागू करने की मांग की जा रही है. प्रस्ताव में ये भी शामिल है कि शुरुआती दिनों में सैलरी का कुछ हिस्सा रोका जा सकता है, ताकि कर्मचारी बिना किसी ठोस कारण के छुट्टी ना लें.
मजदूरों में बढ़ रहा आक्रोश
हालांकि इस खबर के सामने आने के बाद, ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है. उनका कहना है कि इससे कर्मचारियों पर बिना वजह ही दबाव पड़ेगा. वो बीमारी की हालत में भी काम करने को मजबूर होंगे. जो उनकी हेल्थ के लिए ठीक नहीं है. बता दें कि सरकार की तरफ से अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस मुद्दे पर संतुलन बनाना जरूरी होगा, ताकि कर्मचारियों के अधिकारों और कंपनियों की आर्थिक स्थिति दोनों का ध्यान रखा जा सके.
Source: IOCL


























