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Tech Explained: क्यों हो रही है मेमोरी चिप्स की कमी और कहां से हुई इसकी शुरुआत?

इन दिनों मेमोरी चिप्स की डिमांड ज्यादा है, लेकिन सप्लाई कम होने के कारण इन दाम महंगे हो गए हैं. इसका असर स्मार्टफोन और लैपटॉप समेत कई डिवाइसेस पर पड़ रहा है और ये महंगे होते जा रहे हैं.

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Key points generated by AI, verified by newsroom
  • मेमोरी चिप्स की कमी से स्मार्टफोन-लैपटॉप होंगे महंगे, 26 साल में सबसे बड़ा प्राइस हाइक।
  • AI डेटा सेंटरों पर फोकस, Micron के फैसले से Samsung-SK Hynix पर बढ़ा दबाव।
  • AI की बढ़ती मांग, कंपनियों को मिल रहे बड़े कॉन्ट्रैक्ट, ग्राहकों पर असर।
  • 2-3 साल तक चिप की कमी जारी रहेगी, 2028 से पहले सामान्य होने की उम्मीद नहीं।

पिछले कुछ दिनों से रिपोर्ट्स आ रही हैं कि स्मार्टफोन और लैपटॉप समेत मेमोरी चिप्स यूज करने वाले सभी डिवाइसेस की कीमत बढ़ने वाली है. अब एक ताजा एनालिसिस में सामने आया है कि स्मार्टफोन और पीसी इंडस्ट्रीज में 26 साल बाद सबसे बड़ा प्राइस हाइक आने वाला है. यानी अगर आप 2026 में नया स्मार्टफोन या लैपटॉप खरीदना चाहते हैं तो आपकी जेब पर बोझ बढ़ने वाला है. इसके पीछे मेमोरी चिप्स की कमी सबसे बड़ा कारण है. बड़ी से बड़ी कंपनी इन दिनों चिप्स की कमी से जूझ रही है, जिसके चलते डिवाइसेस के दाम आसमान छूने को तैयार बैठे हैं. आज के एक्सप्लेनर में हम आपको बताने जा रहे हैं कि मेमोरी चिप्स की कमी की शुरुआत कैसे हुई और स्थिति यहां तक कैसे पहुंच गई.

क्यों महंगी होने लगी मेमोरी चिप्स?

इसी साल अगस्त में अमेरिका ने चीन पर टैरिफ लगा दिए थे. इससे अलग-अलग चीजों को इंपोर्ट महंगा हो गया और अनिश्चितताओं के चलते नए निवेश पर भी विराम लग गया. इसके बाद दिसंबर की शुरुआत में डेटा स्टोरेज और कंप्यूटर मेमोरी कंपोनेंट बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक माइक्रोन ने कहा कि वह कंज्यूमर मार्केट के लिए चिप्स नहीं बनाएगी और अपना पूरा फोकस एआई डेटा सेंटर के लिए चिप्स बनाने पर रखेगी. इसके बाद मार्केट में दो ही बड़ी कंपनियां सैमसंग और एसके हाइनिक्स रह गईं, जो कंज्यूमर मार्केट के साथ-साथ हाई-बैंडविड्थ मेमोरी (HBM) चिप बनाती हैं. इस फील्ड में किंगस्टन समेत दूसरी कंपनियां भी हैं, लेकिन ये भी सैमसंग और एसके हाइनिक्स जैसे सप्लायर्स पर निर्भर रहती हैं. 

पहली बार नहीं आई है कमी

मेमोरी चिप्स की कमी पहली बार महसूस नहीं की जा रही है. अगर बैकग्राउंड को देखें तो यह इंडस्ट्री उतार-चढ़ाव से भरी रही है. यहां ओवर सप्लाई के साथ-साथ सप्लाई की कमी भी आम है. चिप बनाने के लिए जरूरी वैफर ग्लास और डिमांड आदि के आधार पर यहां सप्लाई कम-ज्यादा होती रहती है. 2012-13 के दौरान मेमोरी चिप्स की कमी महसूस की गई और उसके बाद स्थिति सामान्य हुई. फिर 2018-19 में सप्लाई की कमी रही, जो 2021-22 में जाकर पूरी हुई. अब एक बार फिर मेमोरी चिप्स की डिमांड बढ़ रही है, लेकिन सप्लाई न होने के कारण दाम आसमान छू रहे हैं. 

एआई की इसमें कितनी भूमिका?

अधिकतर जानकारों का मानना है कि मेमोरी चिप्स के कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण एआई है. पिछले कुछ सालों से एआई का चलन बढ़ा है और एआई कंपनियां डेटा सेंटर बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. अक्टूबर में ओपनएआई ने डेटा सेंटर के HBM की सप्लाई के लिए सैमसंग और एसके हाइनिक्स से हाथ मिलाया था. इसे देखते हुए माइक्रोन ने भी कंज्यूमर RAM मार्केट से खुद को अलग कर पूरी तरह एआई डेटा सेंटर के लिए चिप्स बनाने का फैसला कर लिया. दरअसल, चिप मेकर को भी एआई कंपनियों से मोटा पैसा और लंबे कॉन्ट्रैक्ट मिल रहे हैं. इससे चिप बनाने वाली कंपनियों को भी अपनी झोली भरने का मौका दिख रहा है और वो एआई बबल की चिंताओं के बिना इस मौके को भुनाने में लगी हुई हैं.

इससे ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?

मेमोरी चिप्स की कमी का असर सिर्फ प्रीमियम फोन खरीदने वाले ग्राहकों पर नहीं पड़ेगा. इस कारण स्मार्टफोन, टैब्स, लैपटॉप, टीवी, गेमिंग कंसोल और दूसरे IoT डिवाइसेस पर भी पड़ेगा और ग्राहकों को इनके लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी. कई कंपनियों ने कीमत को बढ़ने से रोकने के लिए अपने फोन में RAM को कम करने का फैसला किया है. इसके अलावा सर्वर, क्लाउड सर्विस और डेटा प्रोसेसिंग पर डिपेंड बिजनेसेस को भी इसका असर झेलना पड़ेगा. अब कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी, जिससे सॉफ्टवेयर अपग्रेड, डिजिटल सर्विस और साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में चल रहे काम की रफ्तार धीमी होगी. 

इस समय मेमोरी चिप्स की सबसे ज्यादा डिमांड कहां?

एआई डेटा सेंटर इस समय सबसे ज्यादा रिसोर्सेस की खपत कर रहे हैं. एक हाईपावर GPU में 1TB हाई बैंड-विड्थ मेमोरी (HBM) की जरूरत होती है और हर डेटा सेंटर में हजारों GPUs होते हैं. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एआई कंपनियों को इस समय कितनी मेमोरी चिप्स की जरूरत पड़ रही है. साथ ही एआई कंपनियों को अपनी सर्विसेस के लिए बड़े सर्वर की जरूरत पड़ती है. इसके अलावा 5G/6G, एज कप्यूटिंग के लिए नए इक्विपमेंट, IoT डिवाइसेस, ऑटोनोमस व्हीकल और मेडिकल डिवाइसेस के साथ-साथ कंप्यूटर और स्मार्टफोन के लिए मेमोरी चिप्स की जरूरत है. 

कंपनियों इससे निपटने के लिए क्या कर रही हैं?

हाल में गूगल ने अपने एक अधिकारी को इसलिए नौकरी से निकाल दिया था क्योंकि वह चिप की सप्लाई सुनिश्चित नहीं कर पाया था. अब कंपनी ऐसे व्यक्ति को देख रही है, जो कोरिया में उसे चिप्स दिलवा सके. वहीं ताइवानी कंपनी आसुस खुद DRAM बनाने पर विचार कर रही है. कंपनी अगले साल अपना नया प्लांट शुरू कर सकती है. सैमसंग भी इस असर से खुद को दूर नहीं रख पाई है. कंपनी के लिए अपकमिंग गैलेक्सी S26 सीरीज की लागत बढ़ गई है और वह अपने फोन को महंगी कीमत पर लॉन्च करने से बचना चाहती है. कीमत कम रखने के लिए सैमसंग ने कुछ फीचर्स से भी समझौता किया है. शाओमी ने चिप के कारण बढ़ी कीमत के चलते अपने प्रोडक्ट्स महंगे करने शुरू कर दिए हैं. दूसरी कंपनियां भी ऐसे संकेत दे चुकी हैं कि उनके अपकमिंग प्रोडक्ट्स बढ़े हुए दामों के साथ लॉन्च होंगे. 

कब तक नॉर्मल हो जाएगी स्थिति?

अभी अगले 2-3 सालों तक यह स्थिति बनी रहेगी. कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि 2028 से पहले स्थिति सामान्य होने के आसार नहीं है. अब कुछ कंपनियों ने नए प्लांट लगाने की योजना बनाई है, लेकिन इनसे आउटपुट मिलने में अभी काफी समय लग सकता है. तब तक ग्राहकों के पास महंगे डिवाइसेस खरीदने के अलावा कोई और ऑप्शन नहीं रहेगा. 

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