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सोशल मीडिया से पहले ही बच्चों की दुनिया पर कब्जा कर चुकीं Screens! रिसर्च में हुआ खुलासा

Effect of Screens on Children: दुनियाभर में बच्चों के लिए बनाए गए वीडियो इंटरनेट पर रिकॉर्ड तोड़ व्यूज हासिल कर रहे हैं.

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  • बच्चों के लिए बने ऑनलाइन कंटेंट को रिकॉर्ड व्यूज मिल रहे हैं।
  • स्क्रीन का बच्चों पर गहरा प्रभाव, तनाव व डिप्रेशन बढ़ रहा है।
  • WHO की गाइडलाइन से अधिक बच्चे स्क्रीन पर समय बिता रहे हैं।
  • बच्चों का विकास बातचीत, खेल से होता है, स्क्रीन देखने से नहीं।

Effect of Screens on Children: आज के दौर में बच्चों का बचपन पहले जैसा नहीं रहा. अब खिलौनों की आवाज़ से ज्यादा मोबाइल और टैबलेट की चमक बच्चों को आकर्षित करती है. अक्सर देखने को मिलता है कि छोटे बच्चे खाना खाते समय फोन पर कार्टून देख रहे होते हैं या फिर रोने पर उन्हें मोबाइल थमा दिया जाता है. धीरे-धीरे स्क्रीन बच्चों के लिए सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि उनका साथी और डिजिटल बेबीसिटर बनती जा रही है.

छोटे बच्चों के कंटेंट ने YouTube पर मचाया धमाल

दुनियाभर में बच्चों के लिए बनाए गए वीडियो इंटरनेट पर रिकॉर्ड तोड़ व्यूज हासिल कर रहे हैं. YouTube के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले वीडियो में कई ऐसे वीडियो शामिल हैं जो खास तौर पर छोटे बच्चों के लिए बनाए गए हैं. इनमें रंग-बिरंगे कार्टून, नर्सरी राइम्स और बार-बार दोहराए जाने वाले गाने शामिल होते हैं जो बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं. यह दिखाता है कि आज की नई पीढ़ी बहुत कम उम्र से ही स्क्रीन के बीच बड़ी हो रही है.

बदल रहा है बचपन का तरीका

तकनीक और बच्चों के रिश्ते को लेकर चिंता नई नहीं है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अब स्क्रीन का प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा गहरा हो चुका है. कई देशों में बच्चों और किशोरों में तनाव, चिंता और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ने लगी हैं. इसी वजह से दुनिया के कई देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन पर रोक तक लगा दी है.

हालांकि अब रिसर्च का फोकस सिर्फ किशोरों पर नही बल्कि 0 से 5 साल तक के बच्चों पर भी है. ऐसे बच्चे जो बोलना या पढ़ना सीखने से पहले ही घंटों मोबाइल और टैबलेट पर वीडियो देखने लगते हैं.

WHO की गाइडलाइन से ज्यादा स्क्रीन टाइम

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मुताबिक 2 से 5 साल तक के बच्चों के लिए दिनभर में एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम सही नहीं माना जाता. लेकिन कई देशों में ज्यादातर बच्चे इस सीमा से काफी आगे निकल चुके हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार मलेशिया में लगभग 91 प्रतिशत प्रीस्कूल बच्चे तय सीमा से ज्यादा स्क्रीन देखते हैं. वहीं ब्राजील, चीन और कोलंबिया जैसे देशों में भी बड़ी संख्या में बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन पर समय बिता रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि जीवन के शुरुआती पांच साल बच्चों के दिमाग के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. इसी दौरान बच्चे तेजी से नई चीजें सीखते हैं और उनका दिमाग लाखों नए कनेक्शन बनाता है. यह विकास बातचीत, खेलकूद, छूने और आसपास की दुनिया को समझने से होता है सिर्फ स्क्रीन देखने से नहीं.

क्यों बन गया मोबाइल बच्चों का नया बेबीसिटर?

आज के समय में व्यस्त जीवनशैली भी इसकी एक बड़ी वजह बन चुकी है. लंबे ऑफिस घंटे, ट्रैफिक और बच्चों की देखभाल की कमी के कारण कई माता-पिता बच्चों को शांत रखने के लिए मोबाइल का सहारा लेने लगे हैं.

इसके अलावा टेक कंपनियां भी ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार कर रही हैं जो बच्चों को लंबे समय तक बांधे रखें. ऑटो-प्ले फीचर, चमकदार रंग और लगातार आने वाले सुझाव बच्चों का ध्यान आसानी से खींच लेते हैं यही कारण है कि बच्चे स्क्रीन से जल्दी जुड़ जाते हैं.

स्क्रीन टाइम से जुड़ी समस्याएं

कई रिसर्च में सामने आया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की गति धीमी हो सकती है. कुछ अध्ययनों के अनुसार रोजाना दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की समस्या भी ज्यादा देखी गई.

इसके अलावा मोबाइल और टैबलेट से निकलने वाली ब्लू लाइट बच्चों की नींद पर भी असर डाल सकती है. इससे उनका सोने का समय बिगड़ सकता है और नींद की गुणवत्ता कम हो सकती है.

पूरी तरह स्क्रीन बंद करना नहीं है समाधान

विशेषज्ञ मानते हैं कि स्क्रीन को पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है बल्कि सही संतुलन बनाना ज्यादा जरूरी है. माता-पिता बच्चों के साथ किताबें पढ़ सकते हैं, खेलने के लिए समय निकाल सकते हैं और खाने के दौरान नो स्क्रीन नियम अपना सकते हैं. बच्चों से बातचीत करना, कहानियां सुनाना और उनके सवालों का जवाब देना उनके मानसिक विकास के लिए बेहद जरूरी माना जाता है.

बच्चों को चाहिए इंसानों का साथ, सिर्फ स्क्रीन नहीं

तकनीक आज की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है और इससे पूरी तरह दूरी बनाना मुश्किल है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन बच्चों के जीवन में इंसानी रिश्तों और असली अनुभवों की जगह नहीं लेनी चाहिए. कार्टून और वीडियो बच्चों का मनोरंजन कर सकते हैं लेकिन असली बचपन वही है जिसमें खेल, बातचीत, हंसी और परिवार का साथ शामिल हो.

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