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भारत में फेसबुक और गूगल को न्यूज़ कंटेट के लिए क्यों करना चाहिए भुगतान? जानिए

पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में मीडिया हाउस को पेमेंट करने के कानून के बाद अब भारत में भी इसकी मांग उठने लगी है. आइए जानते हैं भारत में फेसबुक और गूगल को कंटेंट के लिए क्यों भुगतान करना चाहिए.

ऑस्ट्रेलिया में पिछले हफ्ते बड़ी टेक फर्मों को अपने द्वारा उत्पादित न्यूज कंटेंट के लिए मीडिया हाउसों को भुगतान करने के लिए अनिवार्य करने का कानून बनाकर एक बड़ी मिसाल कायम की. भारतीय प्रकाशकों ने Google और फेसबुक को भारतीय प्रकाशकों को सामग्री के लिए भुगतान करने के लिए बाध्य किया जा रहा है. भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, लेकिन इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) के अध्यक्ष, एल अदमिलम ने पिछले हफ्ते, Google इंडिया के कंट्री मैनेजर संजय गुप्ता को लिखा कि वे भारतीय अखबारों को उनके कंटेंट का उपयोग करने के लिए मुआवजा दें और अपने विज्ञापन को ठीक से शेयर करें.

रेवेन्यू रिपोर्ट में ट्रांसपेरेंसी की मांग INS ने Google को विज्ञापन राजस्व के प्रकाशक हिस्से को 85 फीसदी तक बढ़ाने और टेक जाएंट्स द्वारा प्रकाशकों को प्रदान की जाने वाली रेवेन्यू रिपोर्ट में अधिक ट्रांसपेरेंसी लाने की मांग की. आईएनएस डिजिटल समिति के अध्यक्ष जयंत मैथ्यू ने विकास की पुष्टि करते हुए एबीपी न्यूज़ को बताया कि हमने Google को अपने कंटेंट के लिए भुगतान करने के लिए लिखा है और अब उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं. उत्तर के आधार पर हम इसी तरह के कानून बनाने के लिए CCI और सरकार से संपर्क करेंगे. उन्होंने कहा मुझे बताया गया है कि सरकार इसे बहुत गंभीरता से देख रही है. लगभग 80 फीसदी डिजिटल एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू टेक प्लेटफॉर्म पर जाते हैं और पब्लिशर्स को कम से कम राशि मिलती है. मुझे लगता है कि Google इसे देखेगा और पब्लिशर्स को भुगतान करना शुरू कर देगा.

'म्यूजिक इंडस्ट्री को पैसा तो न्यूज को क्यों नहीं' मैथ्यू ने कहा, "समाचार एक कमोडिटी नहीं है और इसमें पैसा खर्च होता है. बिना समाचार के Google काम नहीं कर सकता क्योंकि यह सिर्फ बी 2 बी लिस्टिंग साइट होगी. विश्वसनीय सामग्री के लिए बहुत सारे पैसे चाहिए और आप जानते हैं कि गलत सूचना फैलने पर क्या होता है. म्यूजिक इंडस्ट्री को जब Google भुगतान कर रहा है फिर हमें क्यों नहीं? "

आगे क्या है रास्ता? अब से भारतीय प्रकाशकों को अपने प्लेटफार्मों पर टेक जाएंट्स द्वारा उपयोग की जाने वाली विश्वसनीय सामग्री के लिए उचित मुआवजे के लिए Google और फेसबुक के साथ बातचीत करनी होगी. अंतर्राष्ट्रीय कानून विदेश नीति थिंक-टैंक गेटवे हाउस की सीनियर रिसर्चर अंबिका खन्ना ने ने एबीपी न्यूज को बताया, "टेक दिग्गजों को समाचार के प्रकाशन के लिए प्रकाशकों के साथ अनुबंध में प्रवेश करने के लिए माना जाता है. ऑस्ट्रेलिया अब इसे कानून द्वारा अनिवार्य करता है. भारत में हमारे पास कानूनी प्रावधान नहीं हैं जो इसे मेंडेटरी करता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि टेक जाएंट्स व्यवसाय के अलग-अलग मॉडल अपनाते हैं और समाचारों का प्रकाशन एक से बढ़कर एक कंपनियों के लिए मुख्य हो सकता है जो अंततः बाजार के खिलाड़ियों के बीच अनुबंध के तरीके को प्रभावित करता है.

प्रेस क्लब मुंबई के चेयरमैन गुरबीर सिंह ने मीडिया हाउसों को भुगतान करने के लिए बड़ी टेक कंपनियों को अनिवार्य करने वाले एक कानून को लागू करने के ऑस्ट्रेलिया के फैसले के बारे में पूछे जाने पर एबीपी न्यूज़ से कहा, "यह एक मिसाल बन गया है, अगले चरण में बड़ी तकनीक कंपनियों और पब्लिशर्स के बीच सौदेबाजी होगी." आप खबर को मुफ्त नहीं कर सकते क्योंकि इसमें पैसा लगता है. भारत के लिए ऐसे कानूनों को लागू करने का समय आ गया है.

टेक जाएंट्स का रेवेन्यू बढ़ा वित्त वर्ष 2020 में भारत में डिजिटल विज्ञापनों से होने वाली कमाई 19,900 करोड़ रुपये आंकी गई थी, जबकि भारत का कुल विज्ञापन राजस्व 70,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिससे यह विज्ञापन खर्च के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा विज्ञापन बाजार बन गया. इन विज्ञापनों में से अधिकांश राजस्व तकनीक बड़ी कंपनियों गूगल और फेसबुक के पास चला गया. इसके साथ ही भारतीय प्रकाशकों को कोरोना वायरस महामारी के दौरान विज्ञापन राजस्व पर भारी प्रहार करना पड़ा, जिनमें से कइयों को बंद करना पड़ा.

गूगल-फेसबुक की बढ़ी कमाई रेगूलेटरी फाइलिंग के अनुसार Google का भारत का राजस्व पिछले वित्त वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष 2015 में 35% बढ़कर 5,593.8 करोड़ रुपये हो गया, जो मुख्य रूप से विज्ञापनों द्वारा संचालित है. Google AdWords के बावजूद कंपनी की सबसे बड़ी कैश काऊ है. पिछले साल Google के पेरेंट कंपनी अल्फाबेट इंक ने राजस्व में 13% की वृद्धि के साथ 181 बिलियन डॉलर की कमाई की. जबकि फेसबुक ने राजस्व में 20% की वृद्धि को 86 बिलियन डॉलर की कमाई की, जो मुख्य रूप से विज्ञापन राजस्व द्वारा हुई थी. अनुमान के मुताबिक ऑनलाइन विज्ञापन पर खर्च किए गए प्रत्येक 100 डॉलर के लिए 53 डॉलर Google पर जाता है और 28 डॉलर फेसबुक पर जाता है, जबकि शेष 19 डॉलर को शेष के बीच साझा किया जाता है.

अन्य देशों के उदाहरण यूके सरकार Google और फेसबुक जैसी कंपनियों के लिए नई आचार संहिता लागू करने के लिए प्रतिस्पर्धा और बाजार प्राधिकरण (CMA) के हिस्से के रूप में एक डिजिटल मार्केट यूनिट (DMU) विकसित कर रही है. डीएमयू से उम्मीद की जा रही है कि अगले महीने में कुछ टेक कंपनियों के बीच पावर की एकाग्रता के बारे में चिंताओं को हल करने के लिए काम करना शुरू कर देगा.

UK में होगी शुरुआत पिछले महीने Google ने खुलासा किया कि वह यूनाइटेड किंगडम में न्यू पब्लिशर्स को अपनी साइट्स में से एक पर कहानियों की सुविधा देने के लिए भुगतान करना शुरू कर देगा. इसी तरह, जनवरी में Google फ्रेंच मीडिया फर्मों के साथ एक लाइसेंसिंग डील पर पहुंच गया है जिसमें कंपनी पब्लिशर्स को सर्च रिजल्ट्स में उनके न्यूज कंटेंट की विशेषता के लिए भुगतान करेगी.

न्यूज इंडस्ट्री में निवेश करेगी फेसबुक अपने मीडिया कानून को लेकर ऑस्ट्रेलियाई सरकार के साथ विवादों में रहने वाली फेसबुक ने पिछले महीने न्यूज इंडस्ट्री में अगले तीन सालों में एक बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की थी. अगले तीन सालों में Google की मूल कंपनी एल्फाबेट अपने कंटेंट का उपयोग करने के लिए दुनिया भर के पब्लिशर्स को 2020 के राजस्व में एक बिलियन डॉलर या 0.55 फीसदी का भुगतान करने की योजना बना रही है. Google के सीईओ सुंदर पिचाई के अनुसार Google News Showcase के नाम से नया प्रोडक्ट सबसे पहले जर्मनी में लॉन्च किया जाएगा और बेल्जियम, भारत, नीदरलैंड और कई अन्य देशों में चलाया जाएगा. अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ब्राजील, कनाडा और जर्मनी के लगभग 200 पब्लिशर्स ने प्रोडक्ट के लिए साइन किए हैं.

4 आर्टिकल के पैसे देगा गूगल भारतीय प्रकाशकों को दुनिया भर के पब्लिशर्स के लिए अगले तीन सालों के लिए Google द्वारा आवंटित एक बिलियन डॉलर की ऋण राशि प्राप्त होने की संभावना है. मैथ्यू ने कहा, "Google News Showcase एक प्रोडक्ट है. यह कंटेंट के लिए भुगतान नहीं है. यह ऐसा है कि Google एक दिन में चार आर्टिकल लेगा और आपको इसके लिए भुगतान करेगा. हमें उचित मूल्य पर बातचीत करनी होगी."

फेसबुक-गूगल के खिलाफ बढ़ रहे विद्रोह के मामले बुधवार को ये आर्टिकल लिखे जाने तक एक डिटेल क्वेरी का गूगल द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया. भारत में टेक जाएंट्स के खिलाफ विद्रोह के मामले बढ़ रहे हैं. टेक जाएंट्स को न केवल विश्व स्तर पर बल्कि भारत में भी अविश्वास के मामलों का सामना करना पड़ रहा है. पिछले साल स्मार्ट टेलीविजन बाजार में अपने एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम की स्थिति का कथित रूप से दुरुपयोग करने के लिए Google के खिलाफ भारत में एक चौथा एंटीट्रस्ट मामला दर्ज किया गया था.

भारत में हैं ज्यादातर एंडॉयड यूजर्स अक्टूबर 2020 में भारत में कई टेक्नोलॉजी स्टार्टअप फर्मों ने अमेरिकी टेक जाएंट्स के खिलाफ सरकार और अदालतों के साथ शिकायत दर्ज करने के बड़े अनुप्रयोगों और तरीकों पर Google के वर्चस्व पर बहस की. भारत में लगभग 99 फीसदी स्मार्टफोन यूजर्स Google के एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम का यूज करते हैं, जिससे Google को मोबाइल ऐप्स पर अधिक मात्रा में पावर मिलती है.

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