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कैसे बची कांग्रेस सरकार: सचिन पायलट से 20 साल पुरानी अदावत, जादूगर से 'दोस्ताना'?

पूर्व सीएम वसुंधरा राजे और सचिन पायलट के बीच 20 साल पुरानी अदावत है. साल 2018 के चुनाव में सचिन ने बीजेपी को हराने में बड़ी भूमिका निभाई थी.

राजस्थान में कुर्सी की खींचतान सिर्फ सीएम अशोक गहलोत या सचिन पायलट के ही बीच है तो ऐसा सोचना बिलकुल गलत है. दरअसल ये लड़ाई बीजेपी या कांग्रेस से इतर चार नेताओं के बीच ज्यादा लड़ी जा रही है. जिसमें सीएम अशोक गहलोत, पूर्व सीएम वसुंधरा राजे, सचिन पायलट और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत शामिल हैं. 

खास बात ये  है कि इन नेताओं के बीच आपस में ही चल रहे द्वंद से कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही परेशान हैं. सीएम अशोक गहलोत और सचिन पायलट को लेकर कांग्रेस जहां कोई फैसला नहीं कर पा रही है. बीजेपी इस लड़ाई का फायदा इसलिए नहीं उठा पा रही है क्योंकि वसुंधरा राजे और सचिन पायलट के बीच 20 साल पुरानी अदावत है. 

साल 2003 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में झालरपाटन सीट से वसुंधरा राजे बीजेपी की प्रत्याशी थीं. उनके सामने कांग्रेस ने राजेश पायलट की पत्नी और सचिन की मां रमा पायलट को मैदान में उतारा था. ये एक हाई-प्रोफाइल मुकाबला था. खास बात ये थी कि सचिन पायलट उस समय राजनीति में नहीं आए थे.

वसुंधरा राजे जीत गईं. राजस्थान की राजनीति में राजेश पायलट की विरासत को तगड़ा झटका लगा था. ये हार सचिन पायलट को भी कचोट गई. अगले ही साल यानी 2004 के लोकसभा चुनाव में सचिन पायलट दौसा सीट से कांग्रेस के टिकट से चुनावी मैदान में आ गए. सचिन सांसद चुन लिए गए. इसके बाद साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अजमेर लोकसभा सीट से भी चुनाव जीता और केंद्र में मंत्री बने.

लेकिन इस दौरान वह अपनी मां की हार को नहीं भूले थे. साल 2013 में उनको राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. पार्टी के इस फैसले को उन्होंने सही साबित किया और उन्होंने सड़क पर वसुंधरा सरकार के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया. इसके साथ ही राज्य में बीजेपी के बड़े वोट गुर्जर समुदाय को भी अपने पक्ष में मोड़ लिया. सचिन ने वसुंधरा राजे के प्रभाव वाली सीटों पर राजनीतिक यात्राएं कीं और किसानों के आत्महत्या और कर्जमाफी का भी मुद्दा उठाया.

राजस्थान में सचिन का संघर्ष रंग ला रहा था. वो राज्य में वसुंधरा सरकार के खिलाफ माहौल बना चुके थे. सामने साल 2018 का विधानसभा चुनाव आ चुका था. इस बीच सचिन ने बीजेपी को एक और बड़ा झटका दे दिया.

वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश मंत्री रहे जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह को सचिन ने बीजेपी से निकालकर वसुंधरा राजे के खिलाफ चुनावी मैदान में खड़ा कर दिया. इस वाकये से जुड़े 2 बातों को जानिए...

1. राजस्थान की राजनीति में जसवंत सिंह और वसुंधरा राजे के बीच हमेशा 36 का आंकड़ा रहा है. एक ही पार्टी में होते हुए भी दोनों एक दूसरे खिलाफ ही रहे.

2. विधानसभा चुनाव 2018 के नतीजे आने से पहले तक अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच कोई रस्साकसी नहीं थी. दोनों की एक ही मोटर साइकिल पर बैठकर तस्वीरें भी खूब चर्चा में थीं. सचिन पायलट और मानवेंद्र सिंह अच्छे दोस्त रहे हैं और टेरिटोरियल आर्मी में साथ काम किया है.

चुनाव के दौरान ही सचिन पायलट ने वसुंधरा राजे को घेरने के लिए ललित मोदी और खनन घोटाले का भी मुद्दा उठाया. लेकिन वसुंधरा राजे सचिन पायलट को कोई खास तवज्जो नहीं दे रही थीं. राजस्थान में लोगों का कहना था कि वसुंधरा राजे सचिन पायलट को इतना बड़ा नेता नहीं मानती थीं कि उनके आरोपों पर प्रतिक्रिया दें.

विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बीजेपी को तगड़ा झटका दे दिया. कांग्रेस को ज्यादा सीटें आईं. बड़ी संख्या में गुर्जर समुदाय का वोट कांग्रेस के खाते में चला गया. गुर्जरों ने सचिन पायलट को अपना नेता मान लिया. हालांकि मानवेंद्र सिंह को वसुंधरा राजे ने हरा दिया था. राजस्थान में बीजेपी को हराने का श्रेय सचिन पायलट को दिया जा रहा था. वसुंधरा राजे को उस नेता सत्ता से बाहर कर दिया था जिसको वो साल 2013 से लेकर 2018 तक तवज्जो भी नहीं दे रही थी. 

पूरे राजस्थान में सचिन पायलट का डंका बज रहा था. लेकिन दिल्ली में कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति में अशोक गहलोत का जादू (अशोक गहलोत को राजनीति में जादूगर के नाम से भी कहा जाता) अपना ही रंग दिखाने को तैयार था. फैसला हुआ की राजस्थान के नए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत होंगे. उधर मध्य प्रदेश में भी यही हुआ ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह कमलनाथ को सीएम बना दिया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस का क्या हाल हुआ ये आपको पता ही है.

लेकिन राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत ने बीजेपी के हाथ ये बाजी क्यों नहीं लगने दी इसके भी एक दिलचस्प कहानी है. राजनीति के इस दांवपेंच में वसुंधरा राजे का किरदार अहम है.
 
अब चलते हैं साल 2020 में घटनाक्रम की ओर. राजस्थान सरकार में डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने बगावत का झंडा उठा लिया था. कांग्रेस आलाकमान को संदेश दिया कि अगर उनको सीएम की कुर्सी नहीं दी गई तो वो अपने समर्थक विधायकों के साथ पार्टी तोड़ने में देर नहीं लगाएंगे. मामला फाइव स्टार होटलों में विधायकों को सहेजने से लेकर अदालतों की चौखट तक पहुंच गया था. 

दिल्ली से लेकर जयपुर की तपती गर्मी के बीच राजनीति का पारा भी सारे रिकॉर्ड तोड़ने को तैयार था. माना जा रहा था कि सचिन पायलट अब ज्योतिरादित्य सिंधिया के रास्ते पर चलकर किसी भी समय बीजेपी में जा सकते हैं.

लेकिन दूसरी ओर बीजेपी में वसुंधरा राजे ने कांग्रेस में जारी उठापटक पर एक रहस्यमयी चुप्पी साध रखी थी जो इस बीजेपी में भी जारी खींचतान की ओर इशारा कर रही थी. बीजेपी के दो वरिष्ठ विधायक कैलाश मेघवाल और प्रताप सिंह सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस में जारी बवाल पर तंज कसते हुए कहा कि 'हॉर्स ट्रेडिग' ठीक नहीं है. लेकिन वसुंधरा पूरे घटनाक्रम के बीच गायब रहीं.

दरअसल उनकी चुप्पी बीजेपी आलाकमान की ओर एक संदेश था जिसमें साफ था कि वो सचिन पायलट को किसी भी कीमत में बर्दाश्त नहीं करेंगी.

सचिन पायलट का दांव खाली चला गया. न तो वो विधायक तोड़ पाए और न ही बीजेपी में उनकी इंट्री हो पाई. लेकिन तब से लेकर आज तक सचिन पायलट और सीएम अशोक गहलोत के बीच जंग जारी है और हर बार सचिन पर गहलोत का 'जादू' इक्कीस साबित हुआ. साल 2020 में सचिन पायलट बगावत करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाए तो साल 2022 में अशोक गहलोत ने आलकमान के फरमान को खारिज कर इकबाल को चुनौती भी दी और कुर्सी भी बचाने में भी कामयाब रहे.

राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने में थोड़ा ही वक्त बचा है. सीएम अशोक गहलोत पूरी तैयारी से जुटे हैं, लोकलुभावन योजनाएं लागू कर रहे हैं. कांग्रेस आलाकमान कुछ भी फैसला न लेना पानी की स्थिति में है. सचिन पायलट दिल्ली में अपनी पार्टी को संदेश देने के लिए धरने पर बैठते हैं लेकिन घेरते हैं पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को और सीएम अशोक गहलोत पर मिलीभगत का आरोप लगाते हैं.

सवाल इस बात का है इस समय वसुंधरा राजे चुप क्यों हैं. सीएम अशोक गहलोत के साथ मिलीभगत के आरोप पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि दूध और नींबू कभी एक नहीं हो सकते हैं. उधर अशोक गहलोत ने वसुंधरा को जवाब देते हुए दूध और नींबू के बीच के फर्क भी समझा दिया है.

दरअसल राजस्थान बीजेपी में वसुंधरा राजे, गजेंद्र सिंह शेखावत, ओम माथुर और गुलाब चंद्र कटारिया बड़े नेता हैं. सबकी अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं भी हैं. बीजेपी से जुड़े सूत्रों की मानें तो साल 2020 से शुरू हुई कांग्रेस में बगावत में बीजेपी के दूसरे नेताओं की तरह वसुंधरा राजे ने कभी रुचि नहीं दिखाई है. 

कहना तो यह भी है कि बीजेपी के दूसरे नेता जहां अशोक गहलोत की सरकार को गिराने के लिए तैयार थे वहीं वसुंधरा राजे की चुप्पी ने इन नेताओं को कदम वापस खींचने के लिए मजबूर कर दिया. लेकिन सिर्फ यही नहीं हुआ. दरअसल 2 और अहम घटनाक्रम हुए.

- साल 2020 में सचिन पायलट की बगावत के बीच बीजेपी विधायकों की एक बैठक बुलाई गई. इसमें फैसला होना था कि क्या इस मौके का फायदा उठाया जाए. लेकिन इस मीटिंग को कैंसिल करना पड़ा क्योंकि वसुंधरा राजे सिंधिया ने आने से इनकार कर दिया.

- बीजेपी विधायक न टूट जाएं इसको देखते हुए सभी को गुजरात भेजने को प्लान बनाया गया. कहा जाता है कि वसुंधरा राजे इसमें भी सहमत नहीं हुई. कई विधायकों ने कोरोना की बात कहकर जाने से इनकार कर दिया. इसमें ज्यादातर झालावाड़ क्षेत्र के थे जहां वसुंधरा का प्रभाव है.

यहां ये जानना जरूरी है कि राजस्थान में बीजेपी के 73 विधायक हैं जिसमें 40 के करीब वसुंधरा के सीधे प्रभाव में हैं. ऐसे में अशोक गहलोत की सरकार बिना वसुंधरा के सहयोग से नहीं गिराई जा सकती है.

अब बीते 20 सालों के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो राजस्थान में बीजेपी-कांग्रेस को वहां के वोटर बारी-बारी से मौका देते रहे हैं. इस बार वसुंधरा राजे को उम्मीद है कि सत्ता उन्हीं के हाथ आएगी.  

तीसरी बार जब वह अपना कार्यकाल पूरा कर रही होंगी तो उनकी उम्र 75 के करीब हो जाएगी. लेकिन अगर सचिन पायलट बीजेपी में शामिल होते हैं तो ये उनके लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. वसुंधरा की ये आशंका मध्य प्रदेश में करवट लेती राजनीति को देखकर ही हुई होगी. 

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव बीजेपी में बढ़ रहा है और वो सीएम शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनौती बन रहे हैं. वहीं दूसरी ओर बीजेपी में मुश्किल होती इंट्री के बीच अब खबरें हैं कि सचिन पायलट अपनी नई पार्टी बना सकते हैं. इसका नाम भी चर्चा में है. 

सीएम अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के बीच एक आपसी समझ की भी बात कही जा रही है. दोनों नेता 20 सालों से बारी-बारी सत्ता में आए लेकिन शायद ही कभी एक-दूसरे के प्रति हमलावर रहे हों. सचिन पायलट ने अपने धरने के दौरान इसी ओर इशारा किया था कि आखिर क्यों सीएम अशोक गहलोत ने वसुंधरा पर लगे आरोपों पर कोई जांच नहीं करवाई. 

सचिन पायलट के आरोपों का समर्थन राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नेता और सांसद हनुमान बेनीवाल भी करते हैं. उन्होंने एक ट्वीट में कहा, ' पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपनी करीबी एक कांग्रेस के विधायकों को कहा है कि वो सभी अशोक गहलोत का समर्थन करें. उन्होंने सीकर और नागौर के सभी जाट विधायकों से कहा है कि वो सचिन पायलट से दूरी बनाए रखें.'

 

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