अलीगढ़ में 1857 की जंग-ए-आजादी में शहीद 73 शहीदों को किया याद, पढ़ें जामा मस्जिद का किस्सा
Aligarh News: यूपी के अलीगढ़ में स्थित जामा मस्जिद में शहीद मौलाना अब्दुल जलील और उनके 72 साथियों की शहादत को सभी ने सलाम किया है.

अलीगढ़ की सरज़मीं हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई का वह गवाह है, जिसने अपने सीने पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठे नारे और तलवारों की खनक को महसूस किया. यह वही ज़मीन है, जहां 1857 की गदर में अलीगढ़ की शाही जामा मस्जिद से एक बुलंद आवाज़ उठी थी.
उस आवाज़ के मालिक थे मस्जिद के पेश इमाम मौलाना अब्दुल जलील, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ फतवा जारी किया और अपने साथियों के साथ आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े. आज 24 अगस्त उनकी और उनके 72 साथियों की शहादत का दिन है, जिसे अलीगढ़ शहर श्रद्धा और गर्व के साथ मनाकर उन अमर शहीदों को याद करता है.
जामा मस्जिद से गूंजी आजादी की पुकार
ये दौर है 20 जून 1857 का जब पूरे उत्तर भारत में गदर की चिंगारी भड़क रही थी, तब अलीगढ़ की जामा मस्जिद में मौलाना अब्दुल जलील ने अंग्रेजों के खिलाफ फतवा सुनाया. यह फतवा महज एक धार्मिक घोषणा नहीं थी, बल्कि आज़ादी की जंग का बिगुल था.
उनकी आवाज़ ने शहर के हर कोने में आज़ादी का जुनून भर दिया. हजारों लोग हथियार लेकर उनके साथ मैदान-ए-जंग में उतरने को तैयार हो गए. 24 अगस्त 1857 को अंग्रेजों ने हाथरस की ओर से हमला बोला. मौलाना अब्दुल जलील और उनके साथी उस वक्त जामा मस्जिद से निकलकर जंग-ए-मैदान में डटे थे.
वे तोपों पर काबिज हो गए और अंग्रेजी फौज को कड़ी चुनौती दी. जंग इतनी भीषण थी कि अंग्रेजी सेना के पसीने छूट गए. लेकिन अंततः आधुनिक हथियारों और बड़ी तादाद में फौज के आगे मौलाना और उनके साथी जाबांज डटकर लड़ते हुए शहीद हो गए.
73 शहीदों ने दी थी कुर्बानी
मौलाना अब्दुल जलील अपने 72 साथियों के साथ शहादत के मुकाम पर पहुंचे. उनकी कुर्बानी ने पूरे हिंदुस्तान के लोगों को यह संदेश दिया कि आज़ादी का रास्ता आसान नहीं है. इसके लिए जान की बाज़ी लगानी पड़ती है. उनकी लहूलुहान मिट्टी ने मुल्क की आज़ादी की नींव को और मजबूत किया.
अलीगढ़ की शाही जामा मस्जिद के साये में आज भी उनकी कब्रें मौजूद हैं. यह कब्रें उन बलिदानों की गवाही देती हैं, जिनके बिना हिंदुस्तान की आज़ादी की कल्पना भी अधूरी होती. मस्जिद में आने वाला हर शख्स इन कब्रों को देखकर उस दौर की कुर्बानियों को याद करता है.
श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन
उनकी पुण्यतिथि पर आज जामा मस्जिद में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस मौके पर बड़ी संख्या में शहरवासी, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हुए. कार्यक्रम में पूर्व मेयर मोहम्मद फुरकान, जामा मस्जिद के मौजूदा इमाम मौलाना महमूदुल हसन कासमी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शिक्षक डॉ. रेहान अख्तर कासमी मौजूद रहे. वक्ताओं ने शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए कहा कि आज़ादी का असली मूल्य समझने के लिए हमें उन बलिदानों को याद करना चाहिए.
वक्ताओं के विचार
मौलाना महमूदुल हसन कासमी ने कहा कि मौलाना अब्दुल जलील और उनके साथियों की शहादत हमें यह सिखाती है कि मुल्क के लिए जिंदगियाँ न्यौछावर करना सबसे बड़ा ईमान है. वहीं डॉ. रेहान अख्तर कासमी ने कहा कि इतिहास हमें बताता है कि आज़ादी अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके लिए लाखों लोगों ने खून बहाया.
पूर्व मेयर मोहम्मद फुरकान ने कहा कि हमें अपने बच्चों को इन शहीदों की कहानियाँ सुनानी चाहिए ताकि आने वाली नस्लें यह जान सकें कि उनके पूर्वजों ने आज़ादी की खातिर क्या कुछ खोया.
स्थानीय लोगों ने क्या कहा?
कार्यक्रम में शामिल स्थानीय लोगों ने भी अपने विचार रखे. मोहल्ले के बुजुर्ग हाजी अय्यूब ने कहा कि बचपन से हमने इन कब्रों को देखा है और इनके बारे में सुना है. हर बार जब मस्जिद में आते हैं तो सिर झुक जाता है. वहीं युवाओं का कहना था कि यह दिन हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की हिफाजत करना हमारा भी फर्ज है. 1857 की गदर भले ही तत्कालीन समय में अंग्रेजों को पूरी तरह बाहर न निकाल पाई हो, लेकिन इसने देश भर में आज़ादी की लहर पैदा कर दी.
मौलाना अब्दुल जलील और उनके साथियों की शहादत ने उस लहर को और तेज किया. उनकी कुर्बानी ने साबित किया कि हिंदुस्तान का आम इंसान भी अंग्रेजों की गुलामी को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं था.
इतिहासकारों के मुताबिक, अलीगढ़ की यह लड़ाई स्थानीय स्तर पर हुई सबसे बड़ी जंगों में से एक थी. इसमें आम लोगों से लेकर धार्मिक नेताओं तक ने हिस्सा लिया. अंग्रेजों ने इसे दबाने की हर कोशिश की, लेकिन यह विद्रोह उनके लिए सबक बन गया.






















