सूरदास की तपोस्थली से बेनूर आंखों के सपनों को उड़ान दे रहा आगरा का ये संस्थान
आगरा का महाकवि सूरदास शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान बेनूर आंखों को राह दिखाकर उनके सभी सपनों को पूरा कर रहा है. यहां के बच्चे शिक्षा पाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं.

आगरा: महाकवि सूरदास जो भक्तिकाल के महान कवि रहे हैं उनकी तपोस्थली आगरा के रूनकता में है. ऐसे में कीठम पक्षी विहार में उनकी तपोस्थली पर बने महाकवि सूरदास नेत्रहीन शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान नेत्रों से दिव्यांग बच्चों को 45 साल से राह दिखा रहा है. विद्यालय की स्थापना वर्ष 1976 में हुई थी.
ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि उनकी बेनूर आंखों का अंधेरा जिंदगी में हमेशा के लिए बसने को तैयार बैठा था. मगर, नेत्रों से दिव्यांग बच्चों ने हार नहीं मानी, अंधेरे से बाहर निकलने की चुनौती को स्वीकार किया. आंखों की जगह उंगलियों से अक्षरों को पहचाना. ब्रेल लिपि की मदद से खुद को शिक्षित करके आत्मनिर्भर बनने की डगर पर चल पड़े.
70 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं
यहां पर ब्रेल लिपि की मदद से वर्तमान में करीब 70 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. विद्यालय में आठ शिक्षक हैं वो भी पूरी तरह दृष्टिहीन हैं. बच्चे यहां पर पढ़ाई के साथ ही आत्मनिर्भर बनने के लिए रोजगार परक प्रशिक्षण भी हासिल करते हैं. ज्यादातर बच्चे कम्प्यूटर के ज्ञान से पारंगत हैं. विद्यालय में ब्रेल लिपि का समृद्ध पुस्तकालय है. इसमें पहली कक्षा से लेकर इंटर तक पुस्तकों के अलावा रामयाण, श्रीमद भगवद् गीता और साहित्यकारों के उपन्यास हैं.

विद्यालय परिसर में नेत्रों से दिव्यांग छात्र वहां के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं. अपने हास्टल, कक्षा, मेस, शौचालय, खेल के मैदान समेत अन्य स्थानों से पूरी तरह वाकिफ होते हैं. विद्यालय के दिव्यांग बच्चे सूरदास के काव्यों को इतना लयबद्ध तरीके से गाते हैं, कि सुनने वाला बस उन्हें सुनना ही चाहता है.
बाखूबी खेलते हैं क्रिकेट
एबीपी गंगा की टीम जब विद्यालय पहुंची, तब स्कूली बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे, चूंकि बच्चे नेत्रों से दिव्यांग हैं, ऐसे में उनकी बॉल में बजने वाला पदार्थ अंदर होता है, ऐसे में जब बैट्समैन के पास बॉल आती है, तो बॉल के साउंड से अंदाजा लगाकर बैट चलाने लगते हैं.
गाते हैं सूरदास के पद
विद्यालय के दिव्यांग छात्र सभी तरह के वाद्य यन्त्र बजाते हैं. सूरदास के पद से लेकर फिल्मी दुनिया के गीतों पर संगीत की ऐसे सुर बिखेरते हैं, कि जो भी देखता है, देखता ही रह जाता है.
इस विद्यालय के प्रिंसिपल महेश कुमार, वाइस प्रिंसिपल आरके वर्मा समेत सभी शिक्षक भी नेत्रों से दिव्यांग हैं, ऐसे में शिक्षक और विद्यार्थियों में आंखों से भाव नहीं मिलते, बल्कि दिल की तरंगे एक दूसरे को जोड़े रखती हैं.
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