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उत्तर प्रदेश में गठबंधन की महापराजय, आखिर इसके क्या है मायने

उत्तर प्रदेश में सपा बसपा गठबंधन भाजपा को किसी भी तरह की चुनौती पेश नहीं कर पाया। इसके पीछे कई वजहें रहीं। काडर वोट का ट्रांसफर न हो पाना बड़े नुकसान का कारण बना।

लखनऊ,एबीपी गंगा। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत ने विपक्ष को सोचने पर मजबूर कर दिया है। 2019 के आम चुनाव में पार्टी ने पिछले चुनाव से भी बेहतर प्रदर्शन कर 300 से ज्यादा सीटें हासिल कीं। देश के सबसे अहम सूबे उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को सारे अनुमानों के विपरीत मजबूत जीत मिली। राज्य में भाजपा को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने राष्ट्रीय लोकदल के साथ मिलकर गठबंधन बनाया लेकिन, मोदी-शाह की जोड़ी के आगे जातिगत समीकरण फीके रहे। हालांकि नतीजों से पहले कहा जा रहा था कि ये गठबंधन पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचायेगा।

यूपी की 80 सीटों में से भाजपा ने 62 सीटें जीतीं। दूसरी तरफ गठबंधन के हिस्से मात्र 15 सीटें ही आईं। इनमें सपा को 5 और बसपा को 10 सीटें मिलीं। 19 मई को जिस तरह एग्जिट पोल आये उनके मुताबिक ये गठजोड़ कोई कमाल नहीं कर सका। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सपा-बसपा का वोट एक दूसरे को नहीं हो सका, जिसके कारण गठबंधन कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर सका।

हालांकि यह लड़ाई अस्तित्व के लिए भी थी। क्योंकि लोकसभा चुनाव 2014 में सपा को 5 सीटें मिली थीं। वो भी तब जब राज्य में सपा की सरकार थी। वहीं बसपा को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी। दिलचस्प बात यह भी थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में एनडीए 42.30 फीसदी वोटों के साथ 73 सीटें जीतने में सफल हुई। वहीं सपा 22.20 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 5 सीटें जीत पाई।

बसपा को 19.60 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन सीट एक भी नहीं मिली थी। कांग्रेस को 7.50 प्रतिशत वोट मिले थे। जिसमें उसने 2 सीटों पर जीत हासिल की थी। अगर पूछा जाए कि इसमें असली नुकसान किसका हुआ, तो किसी का नहीं, सिवाय बीजेपी के। क्योंकि 2014 में बीजेपी ने गठबंधन के साथ 73 सीटों पर जीत हासिल की थी।

गठबंधन के लिये वोटकटवा बनी कांग्रेस

जानकारों के मुताबिक उत्‍तर प्रदेश के चुनाव में कांग्रेस के उम्‍मीदवारों ने गठबंधन उम्‍मीदवारों हराने में बड़ा काम किया है। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस ने गठबंधन में शामिल न होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। उसके कैंडीडेट हर सीट पर पीछे रहे उन्‍होंने गठबंधन का ही वोट काटने का काम किया। अगर कांग्रेस गठबंधन के साथ आती तो वोट बंट नहीं पाते और भाजपा को पसंद न करने वाले मतदाता गठबंधन के पाले में आ जाते। लेकिन अकेले अकेले चुनाव लड़ने से मतदाता छिटक गया।

काडर वोट नहीं हुआ ट्रांसफर  बसपा का वोट सपा के कैंडीडेट के लिए ट्रांसफर न होना मुख्‍य वजह मानी जा रही है। बसपा ने दस सीटों पर जीत हासिल की है। जबकि, सपा को पांच सीटें मिली हैं। दोनों के बीच लंबी चली सियासी दूरी के बाद सपा बसपा के गठबंधन को बूथ स्‍तर पर कार्यकर्ता हजम नहीं कर सके। यही वजह है कि बसपा का काडर वोट सपा में ट्रांसफर नहीं हो सका है। जबकि सपा का वोट बसपा में ट्रांसफर होने की बात कही जा रही है।

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