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चहेतों को झकझोर गया राजनीति के रॉबिन हुड अखिलेश सिंह का जाना

रायबरेली के दिग्गज नेता अखिलेश सिंह नहीं रहे। उत्तर प्रदेश में उनका राजनीतिक कद काफी बड़ा था। उन्हें राबिनहुड कहा जाता था। यही नहीं वे सभी की मदद के लिये तैयार रहते थे।

रायबरेली, एबीपी गंगा। उत्तरप्रदेश की राजनीति में अखिलेश सिंह रॉबिनहुड के नाम से मशहूर थे। उनकी तीखी वाकपटुता व कुशल रणनीति ने उन्हें राजनीति में कभी पराभव का सामना नहीं होने दिया। उन पर आपराधिक आरोप के बावजूद जनता का एक बड़ा वर्ग उनमें अपने मसीहा की छवि देखता था, अपने रणनीतिक कौशल से जनपद की राजनीति में वह सदर विधानसभा सीट पर गांधी नेहरू परिवार पर भी भारी पड़े। सोनिया गांधी व प्रियंका वाड्रा ने मिलकर चुनाव में घेरने की पुरजोर कोशिश की बावजूद इसके वे दोनों अपने कांग्रेसी उम्मीदवारों की जमानत तक नहीं बचा पाई। जनपद में उनके चाहने वालों का बड़ा वर्ग उनके पीछे उनकी निंदा भर्त्सना बर्दाश्त नहीं करता था। लोग उन्हें बेइंतहा प्यार करते थे। चर्चित सैयद मोदी हत्याकांड में भी अखिलेश सिंह का नाम आया बाद में वह न्यायालय से बरी कर दिये गए। उनके निधन से शहर हो या ग्रामीण इलाके के हर वर्ग में उदासी, एक अपने के चले जाने का दर्द आंखों से बह रहे आंसुओं से महसूस किया गया। अखिलेश सिंह ने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस से प्रारम्भ किया, वे पहला चुनाव कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर जीते। ठेकेदारी व रंगदारी के विवाद में चर्चित राकेश पांडेय हत्याकांड के आरोप उन पर लगने के बाद उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। उसके बाद लगातार दो चुनावो में अखिलेश सिंह को हराने के लिए कांग्रेस व सोनिया परिवार ने खूब जोर लगाया। सोनिया गांधी और प्रियंका ने घर-घर घूम घूमकर वोट मांगे, लेकिन अखिलेश सिंह की जीत का अंतर भी वे सब मिलकर नहीं घटा सकी।

चहेतों को झकझोर गया राजनीति के रॉबिन हुड अखिलेश सिंह का जाना

2007 में विधानसभा चुनाव में रायबरेली की पांच में से चार सीट कांग्रेस ले गई, लेकिन रायबरेली सदर में अखिलेश सिंह की जड़े इतनी मजबूत थी कि वह बड़े अंतर से निर्दलीय चुनाव जीते। अखिलेश सिंह ने कभी अपने राजनैतिक वसूलों से समझौता नही किया जबकि उनको राजनीति के शिखर पर पहुंचने का न्यौता कई बार मिला लेकिन उन्हें पद नहीं रायबरेली की जनता चाहिए थी। काफी ऊहापोह के बाद उनकी बेटी आदिति सिंह कांग्रेस में शामिल होकर कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़कर अपने पिता की सीट से ही विधायक बनी, जिसके बाद अखिलेश सिंह की राजनीतिक विरासत बेटी के हाथों में आ गयी।

चहेतों को झकझोर गया राजनीति के रॉबिन हुड अखिलेश सिंह का जाना सदर विधायक अखिलेश सिंह का हर गली मोहल्ले में व्यक्तिगत नेटवर्क के साथ जनता से सीधा संपर्क और संवाद था। वह समय समय पर हर तरह से मदद के लिये तैयार रहते थे , जिसके बल पर उन्हें राजनीति में कभी पराजय का सामना नही करना पड़ा। सच में वह राजनीति के अपराजेय योद्धा थे। जिन्हें हराने की हसरत उनके चिरविरोधियो के दिलो में रह गयी, जनपद की राजनीति का अदभुत सितारा अपने शत्रुओं ,राजनीतिक विरोधियों से अकेले लड़ता और जनता की पीड़ा हरता रहा जबकि कांग्रेस, सपा, भाजपा व बसपा के कद्दावर नेता एक साथ समूह बनाकर उनकी राजनीति को खत्म करने का षड्यंत्र लगातार रचते रहे । उन्होंने किसी की परवाह किये बिना जनता की सेवा में निरंतर लगे रहे और उसी पूंजी के बल पर लोगो के बीच नित नए आयाम स्थापित करते रहे।

नेता जी के निधन के बाद उमड़ा जन सैलाब

पूर्व सदर विधायक अखिलेश सिंह की मृत्यु की खबर मिलने के बाद लाखों का जनसैलाब उनके निज निवास पूरे लालूपुर चौहान सुबह से ही पहुंचने लगा। जनपद के कोने कोने से अखिलेश के चाहने वाले उनके अंतिम दर्शन हेतु पहुंचने लगे।

सुबह सबसे पहले अखिलेश का पार्थिव देह उनके गांव पहुंचा। जहां लगभग 25 हजार लोग लाइन में लगकर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की। उसके बाद दोपहर को उनको तकिया चौराहा होते हुए, रतापुर, त्रिपुला चौराहा, धुन्नी सिंह नगर, जहानाबाद चौकी, खोया मंडी, कैपर गंज, घंटाघर, सुपर मार्केट, अस्पताल चौराहा, डिग्री कालेज चौराहा , सिविल लाइंस होते हुए डलमऊ गंगा घाट ले जाया गया। जहा उनका अंतिम संस्कार किया गया।

370 हटाने का किया था समर्थन

अपनी मृत्यु से 15 दिन पूर्व अखिलेश सिंह ने कहा था कि उन्होंने बचपन में सपना देखा था कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटे। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है। अनुच्छेद 370 पंडित जवाहरलाल नेहरू की जानबूझकर की गई ऐतिहासिक भूल थी। यह एक गलत फैसला था, महाराजा हरी सिंह ने जम्मू कश्मीर राज्य का भारत में पूर्ण विलय किया था। अनुच्छेद 370 व 35 ए हटने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह को बधाई देकर कहा था देश को विभाजित करने वाले अनुच्छेद को हटाकर देश को एक कर दिया है। उन्होंने इस मुद्दे पर कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि देश पहले है, उसे देशद्रोह की भाषा नहीं बोलनी चाहिए कांग्रेस ने देश को बंटवाया। कांग्रेस की भाषा पाकिस्तान की भाषा है।

चहेतों को झकझोर गया राजनीति के रॉबिन हुड अखिलेश सिंह का जाना

आज पूरे देश में जश्न है, इस जश्न को कांग्रेस किरकिरा करने के पाप से बचे, अपने विचार, अपने कहे और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले योद्धा ने मील के पत्थर स्थापित किये। अब उनकी राजनीतिक वारिस उनकी पुत्री अदिति सिंह के कंधे पर अपने पिता की स्वर्णिम विरासत को आगे बढ़ाने का बड़ा दारोमदार आ गया है।

रायबरेली में 'विधायक जी' के नाम से मशहूर अखिलेश सिंह नहीं रहे, लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया है। रायबरेली सदर विधानसभा सीट से उनकी बेटी अदिति सिंह कांग्रेस की विधायक हैं। पिछले लंबे वक्त से अखिलेश बीमार चल रहे थे और यही कारण था कि उन्होंने अपनी बेटी को राजनीति के मैदान में उतारा था।

लंबी व जानलेवा बीमारी के बावजूद भी अखिलेश सिंह लगातार रायबरेली की जनता के बीच रहे उनकी समस्याओं को सर आंखों पर रखकर सुलझाया। कोई भी फरियादी उनके चौखट पर अगर आया तो निराश होकर नहीं लौटा।

राजनैतिक योद्धा का सफर हुआ खत्म

रायबरेली वैसे तो कांग्रेस और गांधी नेहरू परिवार के राजनैतिक विरासत के रूप में जाना पहचाना जाता है लेकिन जब बात रायबरेली सदर की हो तो यहां केवल और केवल अखिलेश सिंह का ही सिक्का चलता रहा है।

1990 से उनके गोलोकवासी होने तक उन्हें सदर सीट से शिकस्त देने वाला कोई पैदा नहीं हुआ। तभी तो कांग्रेस से निष्कासन के बाद अखिलेश सदर सीट से निर्दलीय विधायक के रूप में चुनाव जीतते रहे।

उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन हेतु पहुंची हस्तियां, मुख्यमंत्री योगी ने भी प्रकट की शोक संवेदना उनके गोलोकवासी होने की सूचना मिलते ही जनपद व उनके चाहने वालो को जैसे सांप सूंघ गया हो। राजधानी लखनऊ से भी लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने अखिलेश के निज निवास लालूपुर चौहान पहुंचे। सूबे के कैबिनेट मंत्री महेंद्र सिंह के साथ लगभग सभी दलों के नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शोक संवेदना प्रकट की।

लखनऊ से आये भाजपा नेता व एम एल सी विधायक यशवंत सिंह ने आंखों में आंसू लिये बताया कि जब मायावती ने हम लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया था तब हम लोग लगभग 15 दिन एक सुरक्षित स्थान पर एक साथ रहे। उनकी दिलेरी के सभी कायल थे। हम सभी के दिलों में बसते थे। बस इतना ही कह पाए यशवंत। उसके बाद उनके आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

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