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राज्यसभा सांसद बलूनी ने लिखी सियासत की नई इबारत, कहा- 'कभी नहीं करेंगे शिलान्यास, उद्धाटन'

राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने सियासी दांव पेंच को दरकिनार कर बड़ी अहम बात की. उन्होंने कहा कि जनता के बीच का आदमी अब विकास कार्यों का उद्धाटन करेगा.

देहरादून: उत्तराखंड में पिछले एक वर्ष में ऐसे दर्जनों अवसर आये हैं, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस बात को लेकर बहस होती दिखी कि हमारा पत्थर उखाड़ कर सरकार ने अपना पत्थर लगा दिया, हमारी योजना को अपनी योजना बताकर श्रेय लूट लिया. टिहरी के डोबरा चांठी पुल को लेकर भी राजनीति हो रही है, कांग्रेस का कहना है कि यह शुरुआत हमने की और भाजपा उद्घाटन कर रही है. खास तौर पर चुनाव से पहले ऐसे झगडे उत्तराखंड में ही नहीं देश भर में होते हैं. लेकिन इस मिथ्या बहस के सिलसिले के बीच यदि सक्षम राजनीतिक व्यक्ति ये कहे कि मैं कभी भी न अपने नाम का शिलान्यास का पत्थर लगाऊंगा और न उद्घाटन का। मसलन उद्घाटन और शिलान्यास करूँगा ही नहीं, तो यकीन करना मुश्किल है. लेकिन राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी ने ये बात कही है.

आम आदमी करे इसका उद्धाटन

सड़क राजमार्ग मंत्रालय के माध्यम से चौदह करोड़ की लागत से बनने वाले इस पुल का रविवार को शिलान्यास होना था. चूंकि इस पुल की स्वीकृति अनिल बलूनी ने कराइ थी, जब उनसे वर्चयुली शिलान्यास का आग्रह किया गया तो उन्होंने न केवल मना कर दिया, बल्कि यह भी कहा कि यह जनता का पैसा है और जनता के ही किसी व्यक्ति से इसका शिलान्यास कराया जाय. फिर एक नई इबारत लिखी गयी और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से करोड़ों की इस योजना का शिलान्यास करवाया गया. राजनीतिक क्षेत्र में यह पहला उदहारण था जब कोई नेता पत्थर पर नाम लिखवाने से पीछे हट गया और अपना अधिकार किसी निचले स्तर के व्यक्ति के सुपुर्द कर दिया. बलूनी ने यह भी कहा कि वह कभी भी कोई उद्घाटन या शिलान्यास नहीं करेंगे सब कुछ आम आदमी के हाथों होगा.

धनगढ़ी नाले का यह पुल केवल एक योजना नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतिबिंम्ब है जो कि यहां पर हर बरसात में होने वाले जानमाल के नुकसान को रोकेगा और कई जिंदगियों को सुरक्षित करने का काम करेगा. यह मात्र एक पुल नहीं है बल्कि उन लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने का काम है, जिन्होंने अपनों को धनगढ़ी नाले में बरसात के दिनों में खो दिया है. यह मात्र कुछ करोड़ की एक योजना नहीं है बल्कि बेशकीमती जिंदगी को बचाने और यात्रा को सुगम करने का प्रयास है.

हादसों का सबब बन गया था ये नाला

हर साल बरसात में इस राजमार्ग पर धनगढ़ी और पनौद नालों पर जल का बहाव विकराल रूप ले लेता है, जिस कारण रामनगर से गढ़वाल के पौड़ी, चमोली तथा कुमाऊं के अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों को जोड़ने वाला यह मार्ग अवरुद्ध हो जाता है. हर साल वाहनों के बहाने और जान माल की हानि के समाचार मिलते हैं. संवेदनशील राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने इस समस्या को हाथ में लिया और निराकरण के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग के मंत्री नितिन गडकरी को इस महत्वपूर्ण मार्ग की उपयोगिता बताई और हर वर्ष बरसात में होने वाले नुकसान और अवरोध से अवगत कराया.

बलूनी ने दी बड़ी सौगातें

बताते चलें कि सांसद बलूनी बहुत सक्रिय और प्रभावी राज्यसभा सांसद हैं. उत्तराखंड के हित में उन्होंने अपने लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में अनेक बड़ी सौगातें दी हैं. काठगोदाम से देहरादून को चलने वाली नैनी-दून जनशताब्दी एक्सप्रेस का संचालन, पैरामिलिट्री के अस्पतालों में उत्तराखंड की सीमांत जनता को ओपीडी की सुविधा का शुभारंभ, नैनीताल और मसूरी जैसे मुख्य पर्यटक केंद्रों में पेयजल की भीषण समस्या के निदान का ठोस प्रयास जिसमें मसूरी पेयजल योजना पर कार्य जारी है. अपनी सांसद निधि से कोटद्वार, उत्तरकाशी और रामनगर में आईसीयू केंद्रों का निर्माण. बलूनी के प्रयासों से काशीपुर-धामपुर रेल मार्ग का सर्वे रेल मंत्रालय द्वारा सिद्धांतिक तौर पर सहमत होकर जारी है. हाल ही में उन्होंने दो जन-शताब्दी ट्रेनों का टनकपुर से दिल्ली और कोटद्वार से दिल्ली के संचालन के प्रयासों से अवगत कराया है. मंत्रालय द्वारा शीघ्र ही उनके टाइम टेबल की घोषणा बाकी है.

जनता तय करे

सांसद बलूनी ने अपने मनोनयन के समय अपने पहले संबोधन में ही सार्वजनिक घोषणा व अनुरोध किया था कि उनके स्वागत में कहीं भी होल्डिंग, बैनर पोस्टर ना लगाये जायं और ना ही स्वागत अभिनंदन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएं. वह निष्ठा से 6 वर्ष अपने कार्यकाल के हर क्षण का उपयोग उत्तराखंड के लिए करेंगे. 6 वर्ष बाद जनता तय करेगी कि उन्होंने अपने दायित्व का निर्वहन किस तरह किया.

प्रमाणिक रूप से कार्य करना और दायित्व शीलता के बोध के साथ स्वयं को कसौटी में कसने के मानक तैयार करना आसान काम नहीं है, लेकिन सांसद बलूनी ने स्वयं के लिए आचार संहिता नियत करके बताया कि आज की चमक-दमक की राजनीति में चुपचाप भी बड़े काम समर्पण के साथ किए जा सकते हैं. जब जनता के कार्य के समाधान में आत्मसंतोष और संतुष्टि का भाव खोजने की भूख हो जाए तो स्वागत, अभिनंदन, मंच, माला और माइक के विषय गौण हो जाते हैं.

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