सियासी जमीन की तलाश में नेता भी कर रहे पहाड़ों से पलायन
जिस पलायन के मुद्दे को नेता चुनाव को दौरान जोर-शोर से उठाते थे अब वहीं नेता भी पहाड़ से मैदान की तरफ पलायन कर रहे हैं।

देहरादून, एबीपी। उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड को 18 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी पहाड़ों में पलायन की समस्या जस की तस बनी हुई है। पलायन के बाद पहाड़ के लाखों गांव तो सूने हो गए जबकि कुछ में इक्का-दुक्का परिवार ही रह गए। गौर करने वाली बात यह है कि जिस पलायन के मुद्दे को नेता चुनाव को दौरान जोर-शोर से उठाते थे अब वहीं नेता भी पहाड़ से मैदान की तरफ पलायन कर रहे हैं। राज्य के कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत कई पूर्व मंत्री पहाड़ की सीटों के बजाय मैदानी सीटों पर अपनी सियासत चमका रहे हैं।
हरीश रावत ने की शुरुआत इन सब में पहला नाम आता है राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में नैनीताल-उधमसिंह नगर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार हरीश रावत का। अल्मोड़ा से तीन बार सांसद रहे हरीश रावत को सीट सुरक्षित होने के बाद मैदान की ओर जाना पड़ा था। धारचूला से विधायक रहे रावत ने 2017 के विधानसभा चुनाव में दो मैदानी सीटों से चुनाव लड़ा था।
निशंक ने भी पकड़ा मैदान का रास्ता उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक वैसे तो सभी विधानसभा चुनाव पहाड़ से लड़ते रहे हैं, लेकिन सांसद बनने के लिए उन्होंने मैदानी सीट चुनी। 2014 में उन्होंने हरिद्वार से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता। इस बार भी वह हरिद्वार से चुनावी मैदान में हैं।
पूर्व सीएम कोश्यारी ने भी बदली रणनीति राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने भी पहाड़ से मैदान की सियासी राह पकड़ी थी। बागेश्वर जिले के कपकोट से विधायक रहे कोश्यारी ने 2014 में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता। हालांकि इस बार उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है।
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