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उत्तर प्रदेश: ठेकेदार से माफिया बने मुख्तार अंसारी का क्या इन 10 हत्याओं से था कनेक्शन?

हाईकोर्ट में की गई अपील के मुताबिक कृष्णानंद राय की हत्या से पहले 9 लोगों की हत्या कर दी गई. साल 2006 में ही मुख्य गवाह शशिकांत राय की भी रहस्यमयी तरीके से मौत हो जाती है.

यूपी में अतीक अहमद के बाद मुख्तार अंसारी का परिवार सुर्खियों में है. उत्तर प्रदेश पुलिस ने पिछले 2 दिनों में मुख्तार की पत्नी अफशां पर 50 हजार का इनाम बढ़ा दिया है. इसी बीच बांदा जेल में गुरुवार को जिलाधिकारी और एसपी ने तलाशी अभियान चलाया है.

सूचना के मुताबिक बांदा के जिलाधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल और एसपी अभिनंदन ने जेल का औचक निरीक्षण किया. डीएम और एसपी ने मुख्तार के बैरक की भी तलाशी ली. इस दौरान जेल में लगे सीसीटीवी फुटेज को भी खंगाला गया.

मुख्तार अंसारी 2021 से ही बांदा जेल में बंद है. मुख्तार पर यूपी के अलावा पंजाब में भी केस दर्ज है. 1987 में ठेके को लेकर मुख्तार पर पहली बार हत्या का आरोप लगा था. जरायम की दुनिया में मुख्तार की यह पहली बड़ी एंट्री थी.

मुख्तार अंसारी पर अभी कुल 61 केस दर्ज हैं. मुख्तार के अलावा पत्नी अफशां और बेटे अब्बास पर भी क्रिमिनल केस दर्ज है. मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी पर भी गैंगस्टर का केस है. वर्तमान में मुख्तार परिवार के 3 लोग जेल में बंद हैं.

इस स्टोरी में विस्तार से जानते हैं कि ठेकेदारी से शुरू हुई लड़ाई में मुख्तार अंसारी कैसे माफिया बन गया?

1. पहली बार सच्चिदानंद राय की हत्या में नाम
पूर्वांचल में ठेके को लेकर चारों ओर मारकाट मची थी. मुख्तार ने भी इसका फायदा उठाना शुरू किया. पहली बार साल 1988 में मंडी परिषद के एक ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या होती है. हत्या का आरोप लगता है मुख्तार अंसारी पर.

अंसारी के खिलाफ यह केस अभी कोर्ट में ही चल रहा है. दरअसल, 1985 में गाजीपुर के सैदपुर में जमीन को लेकर मुख्तार और बृजेश सिंह गैंग के बीच झड़प हो गई थी. मुख्तार पर आरोप है कि खुन्नस निकालने के लिए उसने बृजेश के करीबी सच्चिदानंद राय की हत्या कर दी.

राय की हत्या के बाद मुख्तार ने अपना गैंग बनाना शुरू किया. उसने पुराने दोस्त साधु सिंह के साथ मिलकर गाजीपुर, मऊ और वाराणसी के आसपास में ठेका लेना शुरू कर दिया.

इसी बीच हत्या मुख्तार के करीबी साधु सिंह की हत्या हो जाती है. इसका आरोप लगता है, मुख्तार के विरोधी बृजेश पर. पूर्वांचल में इसके बाद शुरू होता है गैंगवार का दौर.

2. अवधेश राय की हत्या, बहस अब तक जारी
1990 के बाद यूपी की सियासत मंडल और कमंडल के ईर्द-गिर्द घुमने लगी. प्रशासन रोज-रोज के आंदोलन और आगजनी को संभालने में व्यस्त था. इसी बीच वाराणसी में कांग्रेस नेता अवधेश राय की हत्या हो जाती है. वो भी पुलिस थाने के करीब.

1991 में हुई इस हत्या ने यूपी में भूचाल ला दिया. अवधेश राय के भाई अजय राय ने हत्या का आरोप लगाया मुख्तार अंसारी पर. मुख्तार पर इसी केस को आधार बनाकर गैंगस्टर भी लगाया गया, जिसमें 10 साल की सजा भी सुनाई गई है.

अवधेश राय हत्याकांड केस की सुनवाई एमपी-एमएलए कोर्ट में चल रही है. केस में अंतिम बहस होना बाकी है. इस केस में मुख्तार ने सुप्रीम कोर्ट के वकील उतार दिए हैं.

3. नंद किशोर रूंगटा का अपहरण और फिर हत्या
1996 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर अफजाल अंसारी और बीएसपी के टिकट पर मऊ से मुख्तार अंसारी जीतने में सफल रहे. विधायक बनने के बाद मुख्तार का दबदबा बढ़ता गया. ठेका लेने से लेकर पुलिस को मैनेज करने तक में मुख्तार अपने विरोधियों में बहुत आगे हो गया. 

चूंकि 1996 में बीएसपी के मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं तो मुख्तार के लिए चीजें और आसान हो गई. इसी बीच 1997 में कोयला व्यापारी और विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष नंदकिशोर रूंगटा का पहले अपहरण और फिर हत्या हो जाती है.

इस कांड में आरोप लगता है कि मुख्तार और उसके शूटर सिकंदर पर. सिकंदर अब तक फरार है. हत्या में पुलिसिया कार्रवाई पर उस वक्त सवाल उठा, जब मायावती सरकार ने मुख्तार को गिरफ्तार करने पहुंची डीआईजी रंजना द्विवेदी को पद से हटा दिया था. 

इसके बाद मामला हाईकोर्ट गया और मुख्तार पर शिकंजा कसा गया. मुख्तार पर इस मामले में भी गैंगस्टर लगाया गया.

4. जेल अधीक्षक आरके तिवारी की हत्या
लखनऊ के जेल अधीक्षक थे आरके तिवारी. फरवरी 1999 में राजभवन के सामने शूटरों ने गोलियों से भून दिया. इस मामले ने यूपी पुलिस पर सवाल खड़े दिए. तिवारी अधीक्षक रहते हुए जेल में बंद बाहुबली माफियाओं पर नकेल कस दिया था. 

इस हत्या के बाद मुख्तार पर आरोप लगा. निचली अदालत ने मुख्तार इस केस में बरी हो गए थे. हालांकि, हाईकोर्ट ने मुख्तार को दोषी पाया और साल 2022 में 5 साल की सजा सुनाई. 

इस हत्याकांड के बाद यूपी में पुलिस अधिकारी भी मुख्तार से खौफ खाने लगे. 

5. कृष्णानंद राय की हत्या- साल 2005 की शुरुआत में मुख्तार के विधानसभा क्षेत्र मऊ में दंगा भड़क गया. पुलिस ने इस मामले में मुख्तार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसी बीच मोहम्मदाबाद से बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या हो जाती है.

कृष्णानंद राय की हत्या के बाद पूरा यूपी उबल पड़ता है. पुलिस हत्या की कड़ी जोड़ने में जुट जाती है. एलएमजी कांड से अदावत तक की फाइलें निकाली जाती है और मुख्तार और अफजाल को आरोपी बनाया जाता है.

मामले की जांच यूपी पुलिस के बदले सीबीआई करती है. केस को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया जाता है, लेकिन इसके बावजूद 2019 में मुख्तार और अफजाल बरी हो जाते हैं. 

साल 2006 में दिवंगत कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक अपील दाखिल करती है. अपील के मुताबिक राय की हत्या से पहले उनके 9 समर्थकों की हत्या कर दी गई है. 2006 में  ही  कृष्णानंद राय हत्याकांड के मुख्य गवाह शशिकांत राय की भी रहस्यमयी तरीके से मौत हो जाती है.

अलका राय ने हाईकोर्ट को एक लिस्ट सौंपी, जिसमें  9 हत्याओं का जिक्र था और आरोप मुख्तार अंसारी पर लगाया

- टुनटुन राय की हत्या रधुवारगंज में मुख्तार गैंग ने कर दी थी. टुनटुन बीजेपी का कार्यकर्ता था.

- गाजीपुर में झींकु गिहर की हत्या मुख्तार गैंग के लोगों ने लोकसभा चुनाव के दौरान कर दी.

- गाजीपुर में ही सोमानाथ राय की भी हत्या मुख्तार गैंग ने लोकसभा चुनाव के दौरान कर दी.

- मोहम्मदाबाद पुलिस चौकी के पास अखिलेश राय की हत्या हो गई. इस हत्या को भी मुख्तार गैंग ने अंजाम दिया.

- 8 जून 2005 को रामेंद्र राय नामक बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई. मुख्तार गैंग के इशारे पर ही हुआ. 

- बीजेपी के कार्यकर्ता कल्लू राय की हत्या गोली मारकर कर दी गई. 

- ब्लॉक प्रमुख रहे राजेंद्र राय की हत्या जुलाई 2005 में कर दी गई. राय कृष्णानंद के करीबी थे. 

- हरिहरपुर के ग्राम प्रधान रहे राजेश राय की हत्या कर दी गई. गोलीबारी में 2 अन्य लोग भी मारे गए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी हत्याओं की सूची सीबीआई को दे दी, लेकिन सबूत के अभाव में कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप मुख्तार पर ही साबित नहीं हो पाया. इसके बाद सीबीआई ने इसे आगे चुनौती देने की बात कही. 

मऊ में मिली राजनीतिक संजीवनी, वजह- 30 फीसदी मुस्लिम वोटर्स
मुख्तार अपराध से राजनीति में जब टर्न ले रहे थे, तो उन्होंने पारंपरिक मोहम्मदाबाद छोड़कर मऊ सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान किया. मऊ के सामाजिक कार्यकर्ता छोटेलाल गांधी ने इंडिया टुडे पत्रिका से मुख्तार को लेकर विस्तार से बात की है.

गांधी के मुताबिक मुख्तार का मुख्य तौर पर उदय 1996 में शुरू हुआ. मुख्तार ने मऊ सीट को इसलिए चुना क्योंकि यहां पर मुस्लिम वोटर्स करीब 30 फीसदी हैं. बीएसपी से टिकट मिलने की वजह से मुख्तार को दलितों का भी साथ मिला.

छोटेलाल गांधी आगे बताते हैं- जीत के बाद मुख्तार ने अपनी छवि रॉबिनहुड की बनानी शुरू की. सरकारी जो भी ठेका मिलता था, उसमें स्थानीय लोगों को जमकर काम देता था. इसके अलावा किसी का कोई भी विवाद होता था, तो उसे मुख्तार अपने घर पर सुलझाता था.

यानी मऊ और मोहम्मदाबाद के लोगों को किसी भी अपराध के लिए कोर्ट और पुलिस के पास जाने की जरूरत नहीं होती थी. मुख्तार ही कोर्ट और पुलिस का काम करता था. इस वजह से मुख्तार का दबदबा धीरे-धीरे बढ़ता गया. 

2022 में मुख्तार ने अपनी सीट बेटे अब्बास को दे दी. अब्बास सुभासप के टिकट पर यहां से चुनाव जीत गए. 

7 राज्यों में अपराध का साम्राज्य, 400 करोड़ पर चल चुका है बुल्डोजर
मुख्तार के अपराध का साम्राज्य यूपी, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान समेत 7 राज्यों में चलता है. यूपी में योगी सरकार आई तो मुख्तार को जेल में परेशानी होने लगा, जिसके बाद पंजाब पुलिस ने एक केस के सिलसिले में मुख्तार को अपने यहां ले आई.

पंजााब के जेल में मुख्तार अपनी पत्नी के साथ रहता था. मुख्तार को सेवा करने के एवज में पुलिस अधिकारी रिश्वत भी लेते थे. हाल ही में पंजाब सरकार ने अधिकारियों पर कार्रवाई करने की बात कही है.

यूपी में मुख्तार पर अब तक योगी सरकार और ईडी का शिकंजा कसा जा चुका है. जिला प्रशासन अब तक मुख्तार के करीब 400 करोड़ रुपए की संपत्ति पर बुल्डोजर चला चुका है. 

यूपी जेल में रहने के दौरान मुख्तार ने राष्ट्रपति से सुरक्षा की गुहार लगाई थी. 2022 तक विधायक रहे मुख्तार पर दर्ज कई केस अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है. 

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