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हाथरस के हादसे पर राजनीति लेकिन बाबा का नाम नहीं ले रहे नेता, क्या हैं इसके सियासी मायने?

Bhole Baba News: हाथरस हादसे को लेकर सियासत भी तेज हो गई है. एक तरफ विपक्षी दलों ने प्रशासन को ज़िम्मेदारी बताया तो वहीं सीएम योगी ने साजिश का इशारा किया है लेकिन, कोई बाबा का नाम नहीं ले रहा.

हाथरस में 123 लोगों की मौत और 100 से ज्यादा लोगों को अस्पताल पहुंचाने का जिम्मेदार सूरजपाल उर्फ बाबा भोले उर्फ नारायण साकार हरि को यूपी की पुलिस खोज रही है. लेकिन क्या पुलिस सच में खोज भी रही है या खोजने का दिखावा भर कर रही है. क्योंकि बाबा भोले के वकील एपी सिंह का तो दावा है कि बाबा न तो छिपा है और न ही फरार है, बल्कि पुलिस जो कह रही है, बाबा वही कर रहा है.

लेकिन सवाल सिर्फ पुलिस का ही नहीं है. सवाल तो उन सभी राजनीतिक पार्टियों का है, जिन्होंने 123 लोगों की मौत के जिम्मेदार बाबा भोले को अपने बयानों में क्लिन चिट दे दी है और सारी जिम्मेदारी आयोजकों-सेवादारों पर डालकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है. तो क्या बाबा इतना ताकतवर है कि वो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर अखिलेश यादव, राहुल गांधी औऱ मायावती तक को चुप्पी साधने पर मज़बूर कर दे रहा है या फिर इसके पीछे खड़ी है श्रद्धालुओं की वो भीड़, जिसमें नेताओं को अपना वोट बैंक दिखता है और उस वोट बैंक को ये नेता भगवान की तरह पूजते हैं. आखिर क्या हैं राजनेताओं की चुप्पी के मायने, चलिए समझने की कोशिश करते हैं विस्तार से. 

5 जुलाई को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हाथरस पहुंचे, घायलों से मिले, मदद का भरोसा दिया और कहा कि हादसे के लिए प्रशासन जिम्मेदार है. हादसे वाले दिन ही अखिलेश यादव ने बयान दिया कि ये हादसा सरकार की लापरवाही का नतीजा है और प्रशासन चाहता तो हादसा बच सकता था.हादसे के अगले दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी हाथरस पहुंचे, जांच का आदेश दिया और कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. मायावती ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हादसे की जांच की मांग और मुआवजे की मांग की.

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किसी भी बयान में बाबा भोले नहीं 
अब ये चार प्रमुख लोग हैं उत्तर प्रदेश की सियासत के. पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति इन्हीं चार लोगों या कहिए कि इन चार लोगों से ताल्लुक रखने वाली चार पार्टियों के ईर्द-गिर्द चलती है. लेकिन इनके किसी भी बयान में बाबा भोले नहीं है. किसी ने बाबा भोले की गिरफ्तारी की बात नहीं की है, उसके खिलाफ ऐक्शन लेने की बात नहीं की है, एक सिपाही से इतने बड़े बाबा बनने तक के सफर की जांच करने की बात नहीं की है, बाबा के धन-संपत्ति, उसकी अपनी बनाई प्राइवेट आर्मी और उसके बनाए आलिशान आश्रमों के लिए आने वाले पैसे की जांच की बात नहीं की है. की है तो सिर्फ राजनीति जिसमें सत्ता पक्ष को साजिश नजर आती है और विपक्ष को सत्ता पक्ष और उसके अधीन आने वाले प्रशासन का नाकारापन.

अभी न तो कोई मुकम्मल जांच हुई है और न ही कोई रिपोर्ट सामने आई है, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर अखिलेश यादव, राहुल गांधी औऱ मायावती तक बाबा को क्लिन चिट देते नजर आ रहे हैं. और इसकी वजह है उस बाबा के श्रद्धालुओं की संख्या, जो बाबा के लिए तो श्रद्धालु हैं लेकिन नेताओं के लिए वोट बैंक. और ये वोट बैंक है कितना बड़ा. इतना कि किसी की भी सरकार बना दे, बिगाड़ दे.दरअसल बाबा भोले का नाम सूरजपाल जाटव है. तो जाहिर है कि वो जाटव समुदाय से ताल्लुक रखता है. और यूपी में जाटव वोटरों की संख्या करीब-करीब 11 फीसदी है. परंपरागत तौर पर ये वोट बैंक मायावती और बहुजन समाज पार्टी का माना जाता है. लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव की बदली हुई परिस्थियों में इस वोट बैंक में बिखराव हुआ है. ये वोट बैंक सपा-कांग्रेस गठबंधन के पाले में भी गया है और थोड़ा बहुत बीजेपी के भी. मायावती के पास तो एक हिस्सा अभी है ही.

मायावती को वोट बैंक को सहेजना है?
और मायावती को इस वोट बैंक को सहेजना है तो वो बाबा के खिलाफ नहीं बोल रही हैं. अखिलेश यादव को भी वोट मिले ही हैं, तो वो भी नहीं बोल पा रहे हैं. और वो कुछ बोलेंगे तो विवाद हो ही जाएगा, क्योंकि अभी तक इकलौते अखिलेश यादव ही ऐसे बड़े नेता हैं, जिनकी बाबा भोले के सत्संग में शामिल होने की तस्वीर सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है और खुद अखिलेश यादव एक्स पर बाबा की जयजयकार कर चुके हैं. राहुल गांधी भी बोलेंगे तो बात इंडिया एलायंस की आएगी और घूमफिरकर अखिलेश यादव को जवाब देना ही पड़ेगा. तो ये तीनों ही चुप हैं.

बाकी 2014 का लोकसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत में इस वोट बैंक का भी हिस्सा रहा है. हां ये बात और है कि 2024 में वो वोट बैंक छिटका है, लेकिन बाबा भोले जैसे बाबा तो इस वोट बैंक को कभी भी अपने सत्संगों के जरिए फिर से लामबंद कर सकते हैं और जिसके पाले में चाहे, उसके पाले में डाल सकते हैं. तो मुख्यमंत्री की भी खामोशी तो बनती है. क्योंकि जो आदमी 80 हजार की परमिशन लेता है और बिना किसी मीडिया, टीवी और सोशल साइट्स के उस कार्यक्रम में ढाई लाख लोगों को जुटा सकता है तो फिर ऐसे आदमी से कौन सा सियासी दल परहेज करना चाहेगा. वो आदमी चाहे जितना बड़ा गुनहगार हो, चाहे उसने जो भी किया हो, इंसान को वोट बैंक समझने वालों के लिए उसका सात खून माफ है. 

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