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बागेश्वर में गुलदार की दहशत, दिन में भी घर से निकलने में डर रहे ग्रामीण

बागेश्वर जिले में हर साल सर्दियों में गुलदार की दहशत से लोग परेशान रहते हैं। ग्रामीणों इस कदर दहशत में हैं कि अब वो दिन में भी घर से निकलने में डर रहे हैं।

बागेश्वर, एबीपी गंगा। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में सर्दियां आते ही गुलदार की दहशत अचानक से बढ़ जाती है। सितंबर से लेकर जनवरी तक के बीच गुलदारों का आतंक इलाके में इस कदर बढ़ जाता है कि लोग दिन में भी घर से निकलने में कतराने लगते हैं। इस साल भी गुलदारों के आतंक से यहां के लोग पीड़ित है। बागेश्वर जिले में गुलदार की संख्या लगातार बढ़ने से वन्यजीव प्रेमी भले ही खुश हों, लेकिन गुलदारों ने ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा दी है। जानकार बताते हैं कि सितंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर जनवरी के अंत तक गुलदार और आम जन के बीच अधिक संघर्ष की घटनाएं होती हैं।
पिछले साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो ये बात सच भी साबित हो रही हैं। पिछले साल जिले में आठ घटनाओं में गुलदार ने आबादी वाले क्षेत्रों में अपनी खूंखार दस्तक से लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था। गुलदार के इस हमले में छह बच्चों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। 2018 में रामलीला मंचन के दौरान नुमाइसखेत में हुए गुलदार के हमले में एक सात साल का बच्चा गंभीर रूप से घायल हो गया, तो वहीं गुलदार के रेस्क्यू के दौरान एक बुजर्ग भी गंभीर  रूप से घायल हो गया था। इसके अलावा पिछले साल बच्चों को निवाला बनाने की जितनी भी घटनायें हुई, वे सभी घर के आंगन में हुईं। जिससे लोग आज भी डरे हुए हैं।
इन तमाम घटनाओं के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का साफ तौर पर कहना है कि अब वे दिन में भी डरने लगे हैं। स्कूलों और खेतों के बीच जंगल पड़ता है। अब घर से निकलने में भी भय लगता है।
2008 के वन्य जीव गणना के आंकड़े पर गौर करें, तो बागेश्वर जिले में गुलदारों की संख्या 350 के करीब है। हालांकि, मौजूदा समय में यह आंकड़ा 600 के पार पहुंच चुका है। वन्यजीव-मानव संघर्ष को लेकर भी अपने अपने तर्क हैं। दरअसल, जानवरों की आबादी बढ़ने और ग्रामीणों के पलायन के कारण रहन-सहन की आदतों में काफी बदलाव आया है। गुलदार और जंगली सुअर जैसे जानवर गुफाओं से निकलकर आसानी से भोजन की उपलब्धता की तलाश में गांवों में घुसने लगे हैं। खाली और उजड़े घरों में उन्हें गुफाओं का एहसास होता है। जिस कारण ये वहीं रहने लगे हैं। रही बात हमले की तो, विशेषज्ञों के मुताबिक, ये हमले पहले से तय नहीं होते। अधिक उम्र या अधिक भूख लगने पर गुलदार बच्चों पर ही हमला करते हैं। विशेषज्ञों की मानें, तो ये बच्चों को जानवर समझकर हमला करते हैं। वहीं, गुलदार के आतंक को वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि ये अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है।
बागेश्वर में बढ़ते गुलदार के हमले को लेकर जिला प्रशासन भी चिंता में है। अधिकारियोें का तर्क है कि जब शासन से समय पर धनराशि नहीं मिलती, तो डीएम स्तर पर विवेकाधीन कोष का इस्तेमाल किया जाता है। डीएम के मुताबिक, कुछ निर्णय शासन स्तर पर लिए जाते हैं। जिला स्तर पर जितना संभव होता है, वे सारे प्रयास किये जाते हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में उन्होंने 10 लाख की धनराशि वन विभाग को पिंजरे, लाइन और अन्य उपकरणों के लिए जारी की। इसके बाद भी जरूरत पड़ेगी तो वे देंगे।
गौरतलब है कि बागेश्वर में गुलदारों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे पारिस्थितिक संतुलन के लिहाज से अच्छा माना जा सकता है, लेकिन बच्चों की असमय मौत जरूर माथे पर चिंता की लकीरें खींचती हैं। साल के अंतिम चार महीने पिछले साल बच्चों के लिये बेहद भारी साबित हुये। उम्मीद की जा रही है कि इस साल सबकुछ ठीक रहे।
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