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गोमांस से जुड़े केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला, सरकार की कार्रवाई को बताया दोषपूर्ण

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोमांस से जुड़े केस की सुनवाई करते हुए कहा कि बिना वैज्ञानिक पुष्टि के केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति की आजीविका के साधन को नहीं छीना जा सकता है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट का गो मांस से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला आया है. कोर्ट ने कहा है कि जब तक वैज्ञानिक रूप से यह साबित न हो जाए कि बरामद किया गया मांस वास्तव में गोमांस ही है, तब तक वाहन को जब्त करना पूरी तरह अवैध और मनमाना कदम है. हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यवाही को दोषपूर्ण माना है.

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोवध प्रतिषेध अधिनियम से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया है. इसके साथ ही याचिकाकर्ता को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए सरकार पर 2 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है. जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि बिना किसी अधिकृत प्रयोगशाला की पुष्टि के केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति की आजीविका के साधन को छीनना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है.

जानें- क्या है पूरा मामला?

दरअसल यह मामला बागपत जिले का है. जहां 18 अक्टूबर 2024 को पुलिस ने एक बोलेरो वाहन को इस संदेह में पकड़ा था कि उसमें पांच गायों का मांस ले जाया जा रहा है. इस आधार पर जिला मजिस्ट्रेट, बागपत ने 16 जून 2025 को वाहन को जब्त करने का आदेश दिया, जिसे बाद में मंडलायुक्त मेरठ ने भी बरकरार रखा.

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गोमांस होने की वैज्ञानिक प्रमाणिकता जरूरी

याचिकाकर्ता मोहम्मद चांद ने इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. उन्होंने दलील दी कि पशु चिकित्सक की रिपोर्ट में मांस के गोमांस होने की कोई निश्चित पुष्टि नहीं की गई थी बल्कि उसे केवल 'संदिग्ध' बताया गया था. सुनवाई के दौरान राज्य के अपर शासकीय अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करे कि बरामद मांस गोमांस ही था.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 की धारा 5-ए(6) का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए अधिकृत प्रयोगशाला की रिपोर्ट अनिवार्य है. चूंकि इस मामले में प्रयोगशाला की कोई पुख्ता रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी इसलिए जब्त की पूरी प्रक्रिया को अवैध करार दिया गया.

मंडलायुक्त के आदेश को किया रद्द

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का वाहन उसकी आजीविका का एकमात्र स्रोत था और पिछले 18 महीनों से वाहन के अवैध रूप से बंद रहने के कारण उसे भारी आर्थिक क्षति हुई है.हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए जिला मजिस्ट्रेट और मंडलायुक्त के आदेशों को रद्द कर दिया. कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह सात दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को 2 लाख रुपये का मुआवजा दे.

इसके साथ ही, न्यायालय ने सरकार को यह छूट भी दी है कि वह मुआवजे की यह राशि संबंधित उत्तरदायी अधिकारियों से वसूल सकती है. कोर्ट ने प्रशासन को निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ता के वाहन को तीन दिनों के भीतर तत्काल रिहा किया जाये.

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सौरभ मिश्रा प्रयागराज के निवासी हैं. वह पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अपने करियर की शुरुआत सौरभ ने 2020 में इंडिया अहेड से की, इसके बाद रिपब्लिक भारत में 2 महीने कार्य किया. सौरभ, वर्ष 2023 से अप्रैल 2025 तक मैं हिंदी खबर में एसोसिएट रिपोर्टर रहे. इन्होंने कई बड़े स्तरीय इवेंट और जन-सरोकार की खबरें कवर किए हैं. निष्पक्ष और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग इनकी प्राथमिकता है.सौरभ ने पत्रकारिता जगत में पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया है उन्हें हर दिन कुछ नया सीखना, लोगों से संवाद करना और समाज से जुड़े मुद्दों पर काम करना पसंद है. सौरभ ने स्नातक की पढ़ाई कानपुर यूनिवर्सिटी से की है और वर्तमान में भी पत्रकारिता से जुड़े हैं.
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