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100 बार गैर जमानती वारंट जारी होने के भी नहीं पेश हुए सपा विधायक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

UP News: मेरठ से सपा विधायक रफीक अंसारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिल सकी है. हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी भी की  है. सौ से अधिक गैर जमानती वारंट जारी किये गए.

Meerut News: मेरठ से समाजवादी पार्टी के विधायक रफीक अंसारी (Rafiq Ansari) की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट से उन्हें फिलहाल कोई राहत नहीं मिल सकी है. हाईकोर्ट ने रफीक अंसारी को कोई राहत देने से इंकार करते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया है. सपा विधायक ने कोर्ट से जारी गैर जमानती वारंट को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने रफीक अंसारी के मामले में तल्ख टिप्पणी भी की है. 

कोर्ट ने कहा है कि सपा विधायक के खिलाफ 1997 से 2015 के बीच 100 से अधिक गैर-जमानती वारंट जारी किए गए, लेकिन वह कभी भी अदालत में पेश नहीं हुए और हाईकोर्ट में वारंट आदेश रद्द कराने आ गए. कोर्ट ने कहा है कि मौजूदा विधायक के खिलाफ गैर-जमानती वारंट का निष्पादन न करना और उन्हें विधानसभा सत्र में भाग लेने की अनुमति देना एक खतरनाक और गंभीर मिसाल कायम करता है. कोर्ट ने कहा कि गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों को कानूनी जवाबदेही से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ऐसा कर हम "कानून के शासन के प्रति दंडमुक्ति और अनादर की संस्कृति को कायम रखने का जोखिम उठाते हैं.

वारंट जारी होने पर भी अदालत में नहीं हुए पेश
अदालत ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, एमपी/एमएलए, मेरठ की अदालत में  आईपीसी की धारा 147, 436 और 427 के तहत विचाराधीन आपराधिक केस में  जारी वारंट की चुनौती याचिका पर यह  टिप्पणी की है. इस मामले में  35-40 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ सितंबर 1995 में एफआईआर दर्ज की गई थी. जांच पूरी होने के बाद 22 आरोपियों के खिलाफ पहला आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया. उसके बाद आवेदक रफीक अंसारी के खिलाफ एक और पूरक आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया, जिस पर संबंधित अदालत ने अगस्त 1997 में संज्ञान लिया. अंसारी अदालत के सामने पेश नहीं हुए, इसलिए 12 दिसंबर 1997 को गैर-जमानती वारंट जारी किया गया. बाद में बार-बार गैर-जमानती वारंट ( जिसकी संख्या 101) और धारा 82 सीआरपीसी के तहत कुर्की प्रक्रिया के बावजूद, आवेदक अदालत के सामने पेश नहीं हुआ.

याची ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां उनके वकील ने तर्क दिया कि मामले में मूल रूप से आरोपित 22 आरोपियों को 15 मई 1997 के फैसले में बरी कर दिया गया, इसलिए उनके खिलाफ केस की कार्यवाही रद्द की जानी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे में दर्ज किए गए सबूत केवल उस आरोपी की दोषिता तक ही सीमित है. इसका सह-आरोपी पर कोई असर नहीं पड़ता है.

हाईकोर्ट ने की तल्ख टिप्पणी
अदालत ने कहा कि वह अपनी आंखें बंद कर मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती है. कोर्ट ने कहा “मौजूदा विधायक के खिलाफ गैर-जमानती वारंट का निष्पादन न करना और उन्हें विधानसभा सत्र में भाग लेने की अनुमति देना खतरनाक और गंभीर मिसाल कायम करता है. हाईकोर्ट ने यूपी के पुलिस महानिदेशक को यह निर्देश दिया है कि वह अंसारी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट द्वारा पहले ही जारी किए गए गैर-जमानती वारंट की तामील सुनिश्चित करें. यदि वह अभी तक तामील नहीं हुआ है और अगली तारीख पर अनुपालन हलफनामा दायर किया जाएगा. अनुपालन हलफनामा दाखिल करने के सीमित उद्देश्य के लिए मामले को 22 जुलाई को पेश किया जाए. मामले की सुनवाई जस्टिस संजय कुमार सिंह की सिंगल बेंच में हुई.

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मोहम्मद मोईन को पत्रकारिता का करीब तीन दशक का अनुभव है. वह प्रिंट - इलेक्ट्रानिक और डिजिटल तीनों ही माध्यमों में सालों तक काम कर चुके हैं. ABP नेटवर्क से वह पिछले करीब 18 सालों, स्टार न्यूज़ के समय से ही जुड़े हुए हैं. राजनीति - धर्म और लीगल टापिक के साथ सम सामयिक विषयों के एक्सपर्ट हैं. पत्रकार होने के साथ ही राजनीतिक विश्लेषक, एक्सपर्ट पैनलिस्ट, आलोचक और टिप्पणीकार भी हैं. इनकी चुनावी भविष्यवाणी ज्यादातर मौकों पर सटीक साबित हुई है. 8 लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनाव कवर कर चुके हैं. 7 कुंभ और महाकुंभ की कवरेज कर अपनी अलग पहचान बनाई है. यह अपनी बेबाक- निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. मोहम्मद मोईन ने चार विषयों पत्रकारिता एवं जनसंचार, राजनीति विज्ञान, हिंदी और मध्यकालीन व आधुनिक इतिहास विषयों में मास्टर डिग्री यानी स्नातकोत्तर किया हुआ है. लॉ ग्रेजुएट भी हैं. देश के कई राज्यों में काम करने का अनुभव रखते हैं. देश की तमाम नामचीन हस्तियों का इंटरव्यू ले चुके हैं और कई चर्चित घटनाओं को कवर चुके हैं. 

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