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MP: आपसी संघर्ष में हो रही बाघों की मौत से बढ़ी चिंता, क्या छिन जाएगा टाइगर स्टेट का दर्जा?

क्या मध्यप्रदेश की पहचान 'टाइगर स्टेट' के रूप में खत्म हो जाएगी? घटती बाघों की संख्या ने वन्यजीव प्रेमियों के बीच सवाल पैदा कर दिया है. 2022 तक देश में मरनेवााले 30 बाघों में से 8 मध्य प्रदेश से हैं.

MP News: भारत का हृदय प्रदेश कहलाने वाला मध्यप्रदेश "टाइगर स्टेट" के रूप में अलग ही पहचान रखता है. आजादी के बाद से लगातार कई बार मध्य प्रदेश टाइगर स्टेट रहा है. बीच में कर्नाटक टाइगर स्टेट बन गया था. मगर मध्यप्रदेश ने दोबारा वापसी करते हुए टाइगर स्टेट के आइकॉन को 4 वर्षों से संभाले रखा. लेकिन अब स्थितियां कुछ बदली सी नजर आ रही हैं. भारत में बाघों की संख्या को जानने के लिए समय-समय पर गणना की जाती है. इस वर्ष भी 11 मार्च से बाघों की गिनती का काम शुरू हो चुका है. 4 सालों से मध्यप्रदेश के पास टाइगर स्टेट का दर्जा है. लेकिन बाघों के बीच लगातार बढ़ते संघर्ष और अनुकूलन की समस्याओं के कारण टाइटगर स्टेट का दर्जा खतरे में है. आपसी संघर्ष में बाघों के मरने की बात निकल कर सामने आई है. बाघों की मौत से संख्या में कमी आने की आशंका जताई जा रही है. 

क्या छिन जाएगा 'टाइगर स्टेट' का दर्जा?

2008 की टाइगर गणना के अनुसार देशभर में 2967 बाघ हैं. 2967 में से 526 बाघ मध्यप्रदेश में है. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि 2022 तक देश भर में लगभग 30 बाघों की मौत हुई है और मरनेवालों में से 8 बाघ मध्य प्रदेश से हैं. आठ में सबसे ज्यादा बाघों की मौत पेंच टाइगर रिजर्व में हुई है. पेंच टाइगर रिजर्व में मृत बाघों की संख्या 3 है. बीते साल मध्यप्रदेश में लगभग 42 बाघों की मौत हुई थी. मरनेवाले बाघों में से 10 भाग बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के थे.

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एबीपी न्यूज की टीम ने मध्य प्रदेश के वाइल्डलाइफ विशेषज्ञों से चर्चा की. उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में बाघों के लिए अनुकूलित वातावरण है. अनुकूल वातावरण से मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या बढ़ती रही है लेकिन लगातार हो रही बाघों की मृत्यु का सबसे मुख्य कारण आपसी वर्ग संघर्ष है, क्योंकि बाघ की प्रवृत्ति दूसरे जानवरों से अलग होती है. एक बाघ को रहने के लिए लगभग 15 से 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की जरूरत पड़ती है. लेकिन मध्यप्रदेश में 526 बाघों के लिए सीमित टाइगर प्रोजेक्ट में 5142 वर्ग किलोमीटर जगह है. यानी हम अंदाजा लगाएं तो लगभग 1 बाघ के लिए 8 से 9 वर्ग किलोमीटर की जगह ही आती है.

ऐसे में बाघों के बीच आपसी संघर्ष होना वातावरणीय अनुकूलता हिसाब से देखा जा रहा है. अगर इस स्थिति को रोकना है तो कहीं ना कहीं टाइगर रिजर्व की संख्या को बढ़ाना पड़ेगा. वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसायटी ऑफ इंडिया के निदेशक नितिन देसाई ने मीडिया को बताया कि बाघों की संख्या बढ़ने के कारण टेरिटरी पर आपसी संघर्ष होता है. उस वजह से कई तरह की अंदरूनी समस्याएं पैदा होती हैं. जहां संघर्ष प्राकृतिक रूप से बाघों के लिए हितकर है वहीं जगह कम होने की स्थिति में दुष्कर भी हो जाता है.

टाइगर रिजर्व बढ़ाने के वादे हवा हवाई

वाइल्ड लाइफ से जुड़े संबंधित विभागों में पड़ताल करने पर खुलासा हुआ कि मध्यप्रदेश में लगातार टाइगर रिजर्व बढ़ाने की बातें की जाती रही हैं, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक मामलों के चलते संख्या बढ़ नहीं सकी. जब तक टाइगर रिजर्व  की संख्या में बढ़ोतरी नहीं होगी तब तक आपसी संघर्ष की घटनाओं को रोका नहीं जा सकेगा. अगर मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा बचाए रखना है, तो बाघों के संरक्षण पर विशेष जोर देने की जरूरत है और उसके लिए जल्द से जल्द नई टाइगर टेरिटरीयों का आरक्षण अनिवार्य है.

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