वो हत्या जिसने शिबू सोरेन को बना दिया दिशोम गुरु!
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने सोमवार (4 अगस्त) को अंतिम सांस ली. वो अपने पीछे राजनीतिक विरासत छोड़ गए हैं. उनके बेटे हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री हैं.

एक लड़का, जिसके माता-पिता ने बचपन में उसके दो-दो नाम रखे, लेकिन स्कूल में उसे तीसरा नाम मिला और दुनिया ने उसे चौथे नाम से जाना, एक लड़का, जिसने जंगल में हुई एक हत्या के बाद पढ़ाई-लिखाई छोड़कर तीर-कमान उठा लिया और आदिवासियों का मसीहा बन गया, एक लड़का, जिसकी हत्या के लिए भीड़ दौड़ी तो उसने उफनाई नदी में बाइक समेत छलांग लगा दी और नदी पार कर गया, एक लड़का जिसने राजनीति में कदम रखा तो उसे अपने पहले छोटे चुनाव और पहले बड़े चुनाव, दोनों में मात मिली, एक नेता जिसने पार्टी बनाई तो अध्यक्ष कोई और बन गया.
एक नेता, जिसकी एक आवाज पर हजारों आदिवासी तीर-कमान के साथ कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे, वो नेता, जिसकी जिद के आगे केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और नया राज्य बनाना पड़ा लेकिन सत्ता उसे नहीं मिल पाई, वो मंत्री जो प्रधानमंत्री से मिलकर बाहर आया तो कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया, वो मुख्यमंत्री जिसने तीन बार राज्य की कमान संभाली लेकिन एक बार भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया और वो पिता जिसने अपने बेटे को इतना काबिल बनाया कि जो सपना वो खुद पूरा नहीं कर पाया, उसे उसके बेटे ने पूरा कर दिखाया. ये कहानी है देश के मशहूर आदिवासी नेता, अलग झारखंड राज्य के आंदोलन के अगुवा, झारखंड के तीन बार के मुख्यमंत्री और देश के पूर्व कोयला मंत्री शिबू सोरेन की, जिन्हें दुनिया दिशोम गुरु के नाम से जानती है.

दिशोम गुरु नहीं रहे. 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. और उनके निधन के साथ ही न सिर्फ झारखंड बल्कि आदिवासी समुदाय के राजनीतिक दखल के एक युग का भी अंत हो गया. लेकिन ये सब एक दिन में नहीं शुरू हुआ था. शिबू सोरेन के गुरुजी और फिर दिशोम गुरु बनने की कहानी शुरू होती है अविभाजित बिहार के जंगल में हुए उस हत्याकांड से, जिसने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति कुछ यूं बदल दी कि सियासत में एक आदिवासी नेता की आमद हो गई और फिर उसने जो आंदोलन शुरू किया उसकी परिणति अलग झारखंड राज्य के तौर पर हुई.
तारीख थी 27 नवंबर 1957. रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड के नेमरा गांव के रहने वाले एक मास्टर साहब सोबरन सोरेन अपने घर से ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन जा रहे थे. रास्ता जंगल से होकर गुजरता था. बीच रास्ते में ही किसी ने मास्टर सोबरन सोरेन की हत्या कर दी और फरार हो गए. पता चला कि हत्या गांव के उन लोगों ने की है, जो आदिवासियों को ब्याज पर अनाज देते थे और शराब का कारोबार करते थे. मास्टर साहब इसके खिलाफ थे तो माफिया ने उनकी हत्या कर दी.
तब उनका बेटा महज 13 साल का था. गोला के ही एक स्कूल में पढ़ता था. उसका नाम था शिवचरण. लोग उसे शिवलाल भी कहते थे. पिता की हत्या ने उसे इतना उद्वेलित किया कि उसने सूदखोरों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. तब वो सूदखोर पैसे नहीं बल्कि ब्याज पर अनाज देते थे. और खास तौर से धान, जिसके एवज में पांच गुना तक वसूल करते थे. ऐसे में आदिवासी किसान फसल पैदा करने के बाद भी कंगाल ही रहते थे, क्योंकि उनका ज्यादातर अनाज यही महाजन लेकर चले जाते थे.
शिवचरण को पिता की हत्या की वजह पता थी. तो उसने इन महाजनों या सूदखोरों के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ दिया. इस आंदोलन को नाम दिया गया धनकटनी आंदोलन, जिसका मकसद धान पर उगाने वाले का अधिकार दिलाना था. पढ़ाई-लिखाई छोड़ ही दी थी और अब उनका नाम भी हो गया था शिबू सोरेन. तो सोरेन ने आदिवासियों को जागरूक करना शुरू किया. एक संगठन बनाया और नाम दिया संथाल नवयुवक संघ.

एक बाइक खरीद ली और बाइक से ही गांव-गांव-घर-घर जाकर आदिवासियों को महाजनों के खिलाफ भड़काने लगे. महाजनों ने शिबू को धमकी दी कि जो हाल उनके पिता का हुआ था, शिबू का भी वही हाल होगा. लेकिन शिबू डरे नहीं. वो अपना काम करते रहे. एक दिन महाजनों के गुंडों ने शिबू को अकेला पाकर घेर लिया. शिबू ने जान बचाने के लिए बाइक समेत बराकर नदी में छलांग लगा दी. बाइक तो डूब गई लेकिन शिबू उफनाई नदी पार कर गए. गांववालों ने इसे एक चमत्कार माना और उन्हें नाम दे दिया दिशोम गुरु. यानी कि देश का गुरु.
इस वाकये के बाद शिबू सोरेन की लोगों में इज्जत बढ़ती गई और शिबू सोरेन अब आदिवासियों को तीर-कमान उठाने और महाजनों का धान काटने के लिए उकसाने लगे. आंदोलन बढ़ता गया. आदिवासी अपने खेतों पर काबिज होते गए और महाजन किनारे लगते गए. जिस खेत का धान काटना होता था, शिबू सोरेन अपने आदमियों के साथ उस खेत को चारों तरफ से घेर लेते थे. सबके हाथ में तीर-कमान होता था और महिलाएं धान काटती थीं. कटी हुई फसल पूरे गांव में बांट दी जाती थी. इस पहल की वजह से शिबू सोरेन को आदिवासियों ने अपना नेता मान लिया.
और नेता बने शिबू सोरेन चुनाव लड़ गए. पहला चुनाव पंचायत का लड़ा. लेकिन हार गए. उन दिनों आदिवासियों के एक और बड़े नेता हुआ करते थे बिनोद बिहारी महतो. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता थे. लेकिन 70 का दशक आते-आते वो पार्टी छोड़ चुके थे. शिबू सोरेन के रूप में उन्हें एक नया नेतृत्व नजर आ रहा था. तो उन्होंने ही सलाह दी कि एक नई पार्टी बनाई जाए जो आदिवासियों के हित में काम करे. आइडिया शिबू सोरेन को भी अच्छा लगा. ये वो दौर था, जब बांग्लादेश एक नया देश बन चुका था और उसे बनाने वाली सेना मुक्ति वाहिनी की चर्चा देश-विदेश तक फैल गई थी.

तो 4 फरवरी, 1972 को बिनोद बिहारी महतो के घर एक बैठक हुई. बिनोद बाबू तो थे ही शिबू सोरेन भी थे. इसके अलावा कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ चुके एक और नेता कॉमरेड एके राय भी बैठक में थे. और वहीं पर तय हुआ कि एक नई पार्टी बनेगी, जिसका नाम होगा झारखंड मुक्ति मोर्चा. इसमें झारखंड बिहार से अलग आदिवासियों के राज्य का नाम था, मुक्ति बांग्लादेश बनाने वाली मुक्ति वाहिनी से लिया गया था और मोर्चा था ही. तो बन गई नई पार्टी. बिनोद बिहारी महतो बने पार्टी के अध्यक्ष, शिबू सोरेन बने महासचिव और फिर तो धनकटनी आंदोलन या धान काटो आंदोलन और भी व्यापक हो गया. इसी वजह से शिबू सोरेन पर मुकदने भी लदते चले गए और पुलिस भी शिबू सोरेन की तलाश में जुट गई.
फिर आया इमरजेंसी कौ दौर. इमरजेंसी के दौर में जब पूरा विपक्ष जेल में था तो शिबू सोरेन फरार थे. लेकिन पुलिस अधिकारियों ने समझा-बुझाकर उन्हें सरेंडर के लिए राजी करवाया. शिबू सोरेन ने थाने में सरेंडर किया और साल 1976 में पहली बार शिबू सोरेन को जेल हो गई. इमरजेंसी खत्म हुई और सोरेन रिहा हो गए तो 1977 के आम चुनाव में वो अपना पहला लोकसभा चुनाव भी लड़ गए. सीट चुनी दुमका. लेकिन वो लोकदल के नेता बटेश्वर हेंब्रम के हाथ चुनाव हार गए. 1980 के मध्यावधि चुनाव में शिबू सोरेन की जीत हुई और उसके बाद तो वो लोकसभा पहुंच गए. 1989, 1991 और 1996 में भी वो लोकसभा पहुंचे. शिबू सोरेने के केंद्र की राजनीति में दखल देने के बाद झारखंड राज्य की मांग ने इतना जोर पकड़ा कि वाजपेयी सरकार को झुकना ही पड़ा. जुलाई 2000 में मॉनसून सत्र के दौरान शिबू सोरेन ने साफ कर दिया कि अगर अलग झारखंड राज्य नहीं बनता है तो उनकी पार्टी झारखंड से निकलने वाले कोयले की सप्लाई नहीं होने देगी. ये वो वक्त था जब शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा वाजपेयी सरकार को समर्थन दे रही थी.
अपनी बात पर और जोर डालने के लिए शिबू सोरेने के नेतृत्व में 25 जुलाई 2000 को एक रैली निकली जो शिबू सोरेन के दिल्ली वाले घर से जंतर-मंतर होते हुए संसद भवन की ओर जा रही थी. पुलिस ने रोका तो लोग सड़क पर बैठ गए. शिबू सोरेने ने दोहराया कि अगर झारखंड राज्य नहीं बनता है तो कोयला हो या खनिज न तो वो खदान से बाहर आएगा और न ही देश के किसी हिस्से में उसकी सप्लाई होगी. नतीजा ये हुआ कि वाजपेयी को झुकना पड़ा. शिबू सोरेन की चेतावनी के कुछ ही घंटे बाद सदन में अलग झारखंड राज्य का बिल पेश किया गया. 2 अगस्त को बिल पास हो गया और इस तरह से जिस झारखंड के लिए दशकों से लड़ाई चल रही थी, उसका सपना पूरा हो गया.
झारखंड राज्य भले ही शिबू सोरेन की कोशिशों से बना था, लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बने बाबू लाल मरांडी, क्योंकि अलग झारखंड के बाद विधानसभा की सीटों की संख्या के लिहाज से बहुमत बीजेपी के ही पास था. तो शिबू सोरेन की पार्टी के हाथ कुछ भी नहीं लगा. शिबू सोरेन के सामने असली मुसीबत आई साल 2004 में. तब जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और शिबू सोरेन मनमोहन सरकार में कोयला मंत्री थे. झारखंड में सरकार बीजेपी की थी और केंद्र में बीजेपी विपक्ष में थी. तो शिबू सोरेन के खिलाफ 29 साल पुराने एक मामले में गैरजमानती वॉरंट जारी हो गया. ये केस था 23 जनवरी, 1975 का, जिसमें आदिवासियों और महाजनों के बीच हुए एक संघर्ष में 11 लोगों की मौत हो गई थी. आरोप था कि आदिवासियों को शिबू सोरेन ने ही भड़काया था, जिसकी वजह से हिंसा हुई थी. तब शिबू सोरेन के खिलाफ साल 1986 में जामताड़ा की एक अदालत ने शिबू सोरेन को सरेंडर करने का आदेश दिया था. हालांकि उन्होंने तब सरेंडर नहीं किया था.
लेकिन 2004 में कोर्ट ने कहा कि 1986 में जो वॉरंट जारी हुआ था, उसपर अमल नहीं हुआ. लिहाजा फिर से गैरजमानती वॉरंट जारी किया जाता है. 17 जुलाई को वॉरंट जारी होने के साथ ही शिबू सोरेन की मुश्किलें शुरू हो गईं, क्योंकि उनके ऊपर इस्तीफे का दबाव बढ़ने लगा. 18 जुलाई को पीएम मनमोहन सिंह की शिबू सोरेने से मुलाकात हुई और प्रधानमंत्री ने उन्हें इस्तीफा देने को कहा. लेकिन 20 जुलाई को कोर्ट ने शिबू सोरेन को भगोड़ा घोषित कर दिया गया, जबकि वो उस वक्त भी मंत्री थे. सदन में खूब हंगामा हुआ, और फिर शिबू सोरेन ने बेटे हेमंत सोरेन के हाथ इस्तीफा भिजवाया, कोर्ट में सरेंडर किया और जेल चले गए. एक महीने बाद वो जमानत पर रिहा हो गए. केंद्र में उन्हें फिर से जगह मिली औऱ फिर से वो कोयला मंत्री बन गए. लेकिन कहानी यही खत्म नहीं हुई थी और न ही खत्म हुए थे मुकदमे.
चिरूडीह नरसंहार में शिबू सोरेन को जमानत मिली तो एक और पुराना केस खुल गया. ये केस था शिबू सोरेन के सचिव रहे शशिनाथ झा की हत्या का, जिसमें शिबू सोरेन मुख्य आरोपी थे. 28 नवंबर 2006 को इस केस में शिबू सोरेन को उम्र कैद हुई थी. हालांकि साल 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें इस केस में बरी कर दिया और साल 2008 में शिबू सोरेन चिरूडीह केस में भी बरी हो गए. बहरहाल लौटते हैं राजनीति पर. साल 2005 में झारखंड राज्य का पहला विधानसभा चुनाव था. कांग्रेस का शिबू सोरेन को समर्थन था.
2005 के चुनाव में जीतकर शिबू सोरेन पहली बार मुख्यमंत्री बने. लेकिन 9 दिनों में ही इस्तीफा देना पड़ गया, क्योंकि बहुमत साबित नहीं कर पाए. दूसरी बार 2008 में वो फिर से मुख्यमंत्री बने. लेकिन तब वो विधायक नहीं थे. तो उन्हें मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के अंदर विधानसभा का चुनाव जीतना था. लेकिन उनका कोई भी विधायक सीट छोड़ने को तैयार नहीं था. आखिर में मुंडा बहुल तमाड़ सीट पर उपचुनाव करवाया गया. लेकिन शिबू सोरेन करीब 9 हजार वोट से वो चुनाव हार गए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में वो दुमका से फिर से सांसद बन गए. तीसरी बार वो 30 दिसंबर 2009 को फिर से मुख्यमंत्री बने, लेकिन तब भी वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. और 1 जून 2010 को उनके इस्तीफे के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया.
लेकिन इसके बाद से ही शिबू सोरेन राजनीति के नेपथ्य में ही रहे. 2014 में दुमका से जीतने के बाद 2019 में भी वो चुनाव जीते थे. लेकिन उनका शरीर उन्हें सक्रिय रहने की इजाजत नहीं देता था. राजनीतिक विरासत उनके बेटे हेमंत सोरेन ने बखूबी संभाल रखी है और अब वही मुख्यमंत्री हैं.

पहले भी मुख्यमंत्री रहे हैं. लेकिन पिता के निधन ने उनके जीवन में एक शून्य पैदा कर दिया है, जिसकी भरपाई अब हेमंत के जीवन में तो नहीं हो पाएगी. लेकिन एक शून्य झारखंड में भी पैदा हुआ है, जिसकी भरपाई करना बेहद-बेहद मुश्किल है.
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