J&K: राज्य के दर्जे पर फंसा 'प्रशासनिक पेच', जानें क्यों घिरी उमर सरकार?
J&K सरकार की मुश्किलें पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग पर बढ़ गई है. एक तरफ राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए पहली बार प्रस्ताव पेश हुआ और पारित भी हो गया, लेकिन विपक्ष इसे कमजोर बता रहा है.

उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए मुश्किलें अभी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. भले ही उसने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाला एक और प्रस्ताव सफलतापूर्वक पास कर लिया हो, लेकिन विपक्ष इस प्रस्ताव के कमजोर होने का आरोप लगा रहा है. वहीं, उपराज्यपाल के नेतृत्व वाले प्रशासन ने सोमवार को चर्चा से पहले इस प्रक्रिया को रोकने की कोशिश की. इसकी जानकारी जब उमर अब्दुल्ला को हुई तो उन्होंने इसपर नाराजगी जताई है.
हालांकि, इसपर विधानसभा अध्यक्ष ने चर्चा को जारी रखने का फैसला सुनाया और ये पास भी हो गया, लेकिन अब विपक्ष के निशाने पर सरकार आ गई है. विपक्ष अब नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व पर न केवल भारत सरकार को प्रस्ताव के बारे में बताने के लिए कमजोर पत्र लिखने का आरोप लगा रहा है, बल्कि इसे 'आत्मसमर्पण' भी कह रहा है.
मामला क्या है?
दरअसल, उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में 25 सितंबर को राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए पहली बार प्रस्ताव पेश किया था. इसपर हंगामे के कारण विधानसभा अध्यक्ष ने प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा के लिए 28 सितंबर का दिन तय कर दिया था. सोमवार (28 सितंबर) की सुबह ही सदन के शुरू होने से पहले उपराज्यपाल के नेतृत्व वाले प्रशासन की तरफ से एक हरकत हुई जिससे एक बड़े प्रशासनिक टकराव की स्थिति बन गई. J&K के मुख्य सचिव अटल डुल्लू और कानून सचिव अचल सेठी ने स्पीकर को औपचारिक पत्र भेजकर राज्य का दर्जा बहाल करने वाले प्रस्ताव को नामंजूर करने को कहा और तर्क दिया कि ये मामला कोर्ट में है इसलिए इसपर चर्चा न की जाए.
सत्र शुरू होने पर सीएम उमर अब्दुल्ला को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने इसपर आपत्ति जताई. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार को विधानसभा में अपने भाषण में इस पत्र को इस बात का बड़ा उदाहरण बताया कि राज्य का दर्जा क्यों जरूरी था. उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव और कानून सचिव ने स्पीकर अब्दुल रहीम राथर को लिखा था कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने की मांग करने वाले किसी भी प्रस्ताव को विधानसभा में चर्चा या पारित करने के लिए स्वीकार न किया जाए, क्योंकि उनके अनुसार यह मामला 'न्यायाधीन' (sub judice) था.
आपत्ति के बावजूद पारित हुआ प्रस्ताव
इन आपत्तियों के बावजूद, जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 28 सितंबर को प्रस्ताव सफलतापूर्वक पारित कर दिया. BJP को छोड़कर सभी दलों ने न केवल प्रस्ताव का समर्थन किया, बल्कि मुख्यमंत्री और स्पीकर के अनुरोध पर आसानी से पारित कराने के लिए सभी संशोधनों को भी वापस ले लिया. हालांकि, विधानसभा सचिवालय द्वारा मुख्य सचिव को 'राज्य का दर्जा बहाल करने' के प्रस्ताव के पारित होने की घोषणा करने वाला अंतिम पत्र सामने आने के बाद एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है.
विपक्ष ने प्रस्ताव को कमजोर क्यों कहा?
विधानसभा सचिव मनोज पंडित ने मुख्य सचिव को प्रस्ताव भेजते समय बहुत ही दब्बू भाषा का इस्तेमाल किया- "कृपया जानकारी और आवश्यक कार्रवाई के लिए". सचिव मनोज पंडित ने इस तरह कोई निर्देश या आदेश लिखने से परहेज किया, जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया हो कि इसे (पारित प्रस्ताव को) आगे की आवश्यक कार्रवाई के लिए भारत सरकार को भेजा जाना चाहिए.
इस दस्तावेज की विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों दोनों ने कड़ी आलोचना की है. उन्होंने इसमें महत्वपूर्ण राजनीतिक बातों को शामिल न करने के कारण इसे 'कमजोर' और 'समझौता' करार दिया है. अब जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने न केवल यह प्रस्ताव पास करवा लिया है, बल्कि कानून मंत्री (CM) की जानकारी और मंजूरी के बिना लॉ सेक्रेटरी के पत्र भेजे जाने पर सवाल भी उठाए हैं, तो सबकी नजरें इस बात पर हैं कि क्या मुख्य सचिव अटल डुल्लू इस प्रस्ताव को भारत सरकार को भेजेंगे या रोक लेंगे.
अंतिम प्रस्ताव में क्या है?
नई दिल्ली भेजे गए अंतिम प्रस्ताव में क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांगों और राज्य का दर्जा बहाल करने की स्पष्ट अपील के बीच संतुलन बनाया गया है. इसमें कहा गया है, "इस सदन द्वारा 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को पारित प्रस्तावों के अलावा, सदन भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा तुरंत और तत्काल बहाल करने का आग्रह करता है और संकल्प लेता है कि इस प्रस्ताव को भारत सरकार को भेजा जाए. "
विपक्षी दलों को अंतिम प्रस्ताव पर क्या आपत्ति है?
जहां सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस का कहना है कि यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर की खास पहचान को वापस पाने की दिशा में एक मजबूत कदम है. वहीं, आलोचक प्रस्ताव में 5 अगस्त 2019 के उस केंद्रीय फैसले (आर्टिकल 370) का जिक्र न करने और केंद्र शासित प्रदेश के ही शीर्ष नौकरशाहों के आंतरिक विरोध को कमजोर राजनीतिक रुख का संकेत मान रहे हैं.
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) जैसे विपक्षी दल, सरकार का समर्थन करने वाले कई निर्दलीय सदस्य और राजनीतिक विश्लेषक तर्क देते हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने नई दिल्ली की नजर में अच्छा बने रहने के लिए अपने वैचारिक रुख से समझौता किया है.
चूंकि केंद्र सरकार को भेजे गए अंतिम प्रस्ताव में जानबूझकर अनुच्छेद 370 या अनुच्छेद 35A का कोई सीधा जिक्र नहीं किया गया है, इसलिए आलोचक इसे पार्टी के उन ऐतिहासिक चुनावी वादों से साफ पीछे हटना मानते हैं, जिनमें 2019 के केंद्रीय बदलावों का पुरजोर विरोध करने की बात कही गई थी.
पार्टी के अंदर से भी दबाव
दबाव केवल बाहर से ही नहीं है, दस विधायकों से भी है, जिनमें सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस खेमे के आठ विधायक शामिल थे. सभी ने अनुच्छेद 370 और उसके बाद के बदलावों को वापस लेने की स्पष्ट मांगों को ज़ोर-शोर से शामिल करने के लिए औपचारिक संशोधन पेश किए. हालांकि, अंतिम 'वॉयस वोट' (मौखिक मतदान) से पहले इस कदम को क्षेत्रीय गठबंधन के कुछ हिस्सों ने जम्मू-कश्मीर के मुख्य नैरेटिव (मूल मुद्दे) को कमजोर करने वाला मानते हुए गहरी निराशा जताई.
उमर ने इसपर क्या सफाई दी?
वहीं, प्रस्ताव के अंतिम ड्राफ्ट का बचाव करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि आर्टिकल 370 को शामिल करने से बीजेपी को इस प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज करने और पटरी से उतारने का एक बढ़िया बहाना मिल जाता. NC का तर्क है कि वो सबसे जरूरी और हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्य, यानी विधानसभा के लिए पूरे कार्यकारी अधिकार वापस पाने के लिए जोर-शोर से काम कर रही है.
हालांकि, इस प्रस्ताव में जानबूझकर साल 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव और नवंबर 2024 के विशेष दर्जे की घोषणा का जिक्र किया गया है, ताकि J&K के अलग राजनीतिक इतिहास को इस मांग से जोड़ा जा सके. इसके बावजूद विरोधी अब मुख्यमंत्री पर 'दबाव में झुकने' का आरोप लगाकर उन्हें घेरने की कोशिश करेंगे. उन्हें 28 सितंबर को पारित राज्य के दर्जे वाले प्रस्ताव के फाइनल टेक्स्ट को लेकर दोनों तरफ से तीखी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है.
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