टॉयलेट की मांग पर सजा गलत, जामिया यूनिवर्सिटी को दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार, प्रोफेसर को राहत
Delhi News In Hindi: कोर्ट ने साफ कहा कि साफ-सुथरे और सम्मानजनक शौचालय की सुविधा किसी भी कर्मचारी के लिए बुनियादी कार्य परिस्थितियों का हिस्सा है. यूनिवर्सिटी के आदेश को रद्द कर दिया.

- कोर्ट ने चार हफ्ते में समाधान का निर्देश दिया.
दिल्ली में जामिया यूनिवर्सिटी में एक महिला प्रोफेसर को स्वच्छ टॉयलेट की सुविधा को लेकर आवाज उठाने पर दी गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि साफ-सुथरे और सम्मानजनक शौचालय की सुविधा किसी भी कर्मचारी के लिए बुनियादी कार्य परिस्थितियों का हिस्सा है. जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि कर्मचारियों को साफ, इस्तेमाल योग्य और सम्मानजनक टॉयलेट मुहैया कराना किसी भी संस्थान की मूल जिम्मेदारी है. कोर्ट ने यह भी माना कि प्रोफेसर की शिकायत पर यूनिवर्सिटी की प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा सख्त और असंगत थी.
दरअसल जामिया की एक वरिष्ठ महिला प्रोफेसर ने दिसंबर 2024 में वेस्ट एशियन स्टडीज सेंटर में टॉयलेट सुविधाओं को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी. उन्होंने मांग की थी कि वहां महिलाओं के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था की जाए क्योंकि अन्य विभागों में ऐसी व्यवस्था पहले से मौजूद है.
प्रोफेसर ने यह भी बताया था कि उन्हें घुटनों की समस्या है, जिसकी वजह से भारतीय शैली वाले शौचालय का उपयोग करना मुश्किल होता है. इसलिए उन्होंने वेस्टर्न-स्टाइल कमोड की सुविधा की मांग की थी. उनके मुताबिक जिस टॉयलेट का वह उपयोग कर रही थीं। उसे बाद में बंद कर दिया गया और फिर उसे सभी के लिए खोल दिया गया, जिससे साफ-सफाई और हाइजीन को लेकर परेशानी बढ़ गई.
शिकायत पर कार्रवाई की जगह नोटिस
दिल्ली हाई कोर्ट के सामने यह भी आया कि यूनिवर्सिटी ने समस्या का समाधान करने की बजाय शिकायत करने के तरीके पर आपत्ति जताई. जामिया प्रशासन का कहना था कि प्रोफेसर ने शिकायत उचित चैनल के जरिए नहीं की. इसके बाद अगस्त 2025 में उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. आंतरिक जांच के बाद जनवरी 2026 में यूनिवर्सिटी ने उन्हें लिखित माफी देने का आदेश दिया और उनके व्यवहार को दुर्व्यवहार और आदेश न मानना बताया.
दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले में जताई नाराजगी
कोर्ट ने इस पूरे रवैये पर सख्त टिप्पणी की. जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि इस तरह की शिकायतों को प्रक्रियागत तकनीकीताओं में उलझाकर दंडात्मक कार्रवाई करना उचित नहीं है. कोर्ट ने कहा कि किसी महिला कर्मचारी द्वारा स्वच्छता और गरिमा से जुड़ी समस्या उठाना बिल्कुल जायज है और इसे सिर्फ प्रक्रिया की गलती बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा का मतलब सिर्फ शारीरिक सुरक्षा नहीं है. बल्कि ऐसा माहौल भी है जहां वे सम्मान, गरिमा और साफ-सफाई के साथ काम कर सकें. शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा भी उसी का अहम हिस्सा है.
माफी जबरन नहीं करवाई जा सकती-कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालय द्वारा प्रोफेसर से माफी मांगने की मांग को भी गलत बताया. अदालत ने स्पष्ट कहा कि माफी तभी मायने रखती है जब वह स्वेच्छा से दी जाए न कि किसी आदेश के जरिए मजबूर करके ली जाए. अदालत के मुताबिक किसी कर्मचारी से इस तरह माफी मांगने को कहना यह संदेश देता है कि शिकायत उठाना ही गलत था जो कि बिल्कुल अनुचित है.
यूनिवर्सिटी द्वारा दिए निर्देश अदालत ने जामिया प्रशासन की कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए माफी मांगने वाले आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि वह प्रोफेसर की शिकायत पर प्रशासनिक स्तर पर दोबारा विचार करे. कोर्ट ने कहा कि इस दौरान स्वच्छता, गोपनीयता, गरिमा और प्रोफेसर की स्वास्थ्य संबंधी स्थिति को ध्यान में रखा जाए. यूनिवर्सिटी को चार हफ्ते के भीतर इस मामले का समाधान करने को कहा गया है. तब तक के लिए कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि प्रोफेसर को एक साफ-सुथरा और उपयुक्त टॉयलेट उपलब्ध कराया जाए.






















