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दिल्ली EV पॉलिसी से ऑटो चालक नाराज, 15 नवंबर से आंदोलन की चेतावनी

दिल्ली EV पॉलिसी 2026 के तहत 1 जनवरी 2027 से नए इलेक्ट्रिक L5 ऑटो के पंजीकरण से जुड़े प्रावधानों पर ऑटो-टैक्सी चालकों ने सवाल उठाए हैं.

दिल्ली EV पॉलिसी 2026 के तहत 1 जनवरी 2027 से नए इलेक्ट्रिक L5 ऑटो के पंजीकरण और पुराने CNG ऑटो के प्रतिस्थापन से जुड़े प्रावधानों पर ऑटो-टैक्सी चालकों ने सवाल उठाए हैं. ऑल दिल्ली ऑटो टैक्सी ट्रांसपोर्ट कांग्रेस यूनियन ने उपराज्यपाल को अंतिम निवेदन भेजकर नीति की समीक्षा, चालकों के संगठनों के साथ बैठक और पुराने CNG ऑटो की जगह नया CNG ऑटो खरीदने का विकल्प बनाए रखने पर पुनर्विचार की मांग की है. 

ऑल दिल्ली ऑटो टैक्सी ट्रांसपोर्ट कांग्रेस यूनियन (रजि) का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण जरूरी हैं, लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उन चालकों की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, जिन्होंने वर्षों की मेहनत की कमाई लगाकर CNG ऑटो खरीदे हैं.

यूनियन अध्यक्ष किशन वर्मा के मुताबिक, संगठन इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास का विरोध नहीं कर रहा है. बल्कि उनकी आपत्ति ऐसे प्रावधानों से है, जिनसे पुराने CNG ऑटो को बदलने वाले चालकों के सामने नया CNG वाहन खरीदने का विकल्प सीमित हो सकता है. संगठन ने सवाल उठाया है कि क्या नीति तैयार करते समय चालकों की रोजाना की कमाई, परिवार का खर्च और नए इलेक्ट्रिक ऑटो के लिए अतिरिक्त कर्ज लेने की उनकी क्षमता का पर्याप्त आंकलन किया गया है.

'इलेक्ट्रिक ऑटो का फैसला केवल कीमत देखकर नहीं'

यूनियन का कहना है कि इलेक्ट्रिक ऑटो अपनाने का फैसला केवल वाहन की खरीद कीमत देखकर नहीं किया जा सकता. बैंक ऋण की किस्तें, ब्याज, चार्जिंग में लगने वाला समय, बैटरी बदलने का खर्च, मरम्मत और चार्जिंग सुविधाओं की उपलब्धता भी चालक की कमाई और कामकाज को सीधे प्रभावित करते हैं. किशन वर्मा ने सरकार से इन सभी पहलुओं पर पारदर्शी अध्ययन कराकर उसे सार्वजनिक करने की मांग की है.

उनका कहना है कि जो चालक अपनी इच्छा से इलेक्ट्रिक वाहन खरीदना चाहते हैं, उन्हें सस्ता ऋण, पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन, बैटरी वारंटी और मरम्मत संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए. इसके साथ ही पुराने CNG ऑटो के प्रतिस्थापन पर नया CNG ऑटो खरीदने के विकल्प की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए. यूनियन के मुताबिक, तकनीक में बदलाव का फैसला ऐसा हो, जिसे चालक अपनी आर्थिक स्थिति और व्यावहारिक जरूरतों के हिसाब से अपना सकें.

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मुख्यमंत्री और परिवहन मंत्री पंकज सिंह से सवाल

यूनियन अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और परिवहन मंत्री पंकज सिंह से पूछा है कि ऑटो-रिक्शा एवं टैक्सी चालकों की आजीविका पर असर डालने वाली नीति के संबंध में उनके प्रतिनिधि संगठनों के साथ सार्थक संवाद क्यों नहीं किया गया. परिवहन आयुक्त निहारिका राय से भी संगठन ने सवाल किया है कि CNG ऑटो के प्रतिस्थापन, नए पंजीकरण, परमिट व्यवस्था और इलेक्ट्रिक वाहन नीति के प्रभावों पर चर्चा के लिए संबंधित संगठनों की औपचारिक बैठक कब आयोजित की गई.

यूनियन ने मांग की है कि यदि ऐसी बैठकें हुई हैं, तो उनकी तारीख, आमंत्रित संगठनों के नाम, कार्यवाही का विवरण और लिए गए फैसले सार्वजनिक किए जाएं. यदि बैठक नहीं हुई, तो सरकार इसका कारण स्पष्ट करे. किशन वर्मा ने कहा, 'ऑटो-टैक्सी चालक केवल सरकारी नियमों का पालन करने के लिए नहीं हैं. उनकी आजीविका को प्रभावित करने वाले फैसलों में उनकी बात सुनना भी सरकार की जिम्मेदारी है.' उनके मुताबिक, नीति बनाने वालों को उन परिवारों की आर्थिक वास्तविकता समझनी चाहिए, जिनकी रोजी-रोटी उनके वाहन पर निर्भर है.

पत्र और ईमेल के बाद भी जवाब नहीं मिलने का दावा

यूनियन ने उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री, परिवहन मंत्री, परिवहन आयुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों को पहले भी पत्र एवं अनुस्मारक भेजने की बात कही है. संगठन के अनुसार, परिवहन विभाग की ओर से ईमेल के जरिए सुझाव मांगे जाने पर उसने अपनी आपत्तियां और प्रस्ताव भी भेजे थे. इसके बावजूद, यूनियन का दावा है कि उसे अब तक कोई संतोषजनक लिखित जवाब, ठोस आश्वासन या प्रतिनिधिमंडल के साथ औपचारिक बैठक का अवसर नहीं मिला है. संगठन चाहता है कि उसके पुराने पत्रों, रिमाइंडरों और ईमेल पर हुई कार्रवाई का पूरा विवरण लिखित रूप में दिया जाए.

साथ ही यह भी बताया जाए कि उसके सुझावों की जांच किस स्तर पर हुई, किन प्रस्तावों को स्वीकार किया गया, किन्हें खारिज किया गया और अस्वीकृति के पीछे क्या कारण रहे. किशन वर्मा के अनुसार, सुझाव मांगने की प्रक्रिया तभी सार्थक होगी, जब सरकार प्रभावित लोगों की आपत्तियों पर विचार करने और उन पर की गई कार्रवाई का जवाब देने की जिम्मेदारी भी निभाए.

इलेक्ट्रिक L5 ऑटो की परमिट पर स्पष्टता की मांग 

यूनियन ने इलेक्ट्रिक L5 ऑटो-रिक्शा के परमिट संबंधी प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं. संगठन का कहना है कि CNG ऑटो चालकों को लागू नियमों के तहत परमिट, फिटनेस, बीमा और दूसरी वैधानिक शर्तों का पालन करना पड़ता है. ऐसे में यदि इलेक्ट्रिक L5 ऑटो के लिए अलग परमिट व्यवस्था या किसी तरह की छूट लागू की जा रही है, तो उसका कानूनी आधार स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए. संगठन ने मोटर व्हीकल एक्ट, 1988, केंद्रीय मोटर वाहन नियमों, दिल्ली मोटर वाहन नियमों, संबंधित अधिसूचनाओं और लागू न्यायिक आदेशों के संदर्भ में स्वतंत्र कानूनी परीक्षण कराने की मांग की है.

उनका कहना है कि एक ही परिवहन क्षेत्र में परमिट नियमों का पालन करने वाले CNG ऑटो चालकों और परमिट संबंधी अलग व्यवस्था वाले इलेक्ट्रिक ऑटो के बीच असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति नहीं बननी चाहिए. सभी व्यावसायिक ऑटो-रिक्शा के लिए कानूनसम्मत, पारदर्शी और सार्वजनिक हित पर आधारित व्यवस्था होनी चाहिए.

यूनियन ने नीति से जुड़ी विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट, पर्यावरणीय आकलन, उद्योग संगठनों के साथ हुई चर्चा और प्राप्त सुझावों के उपलब्ध रिकॉर्ड भी सार्वजनिक करने की मांग की है. संगठन ने स्पष्ट किया कि वह बिना प्रमाण किसी अधिकारी, कंपनी या व्यक्ति पर आरोप नहीं लगा रहा है. हालांकि, उसका कहना है कि नीति निर्माण में पारदर्शिता और संभावित हितों के टकराव की निष्पक्ष समीक्षा जनहित के लिए जरूरी है.

पांच से दस साल की लागत का तुलनात्मक अध्ययन हो 

यूनियन ने सरकार से CNG और इलेक्ट्रिक L5 ऑटो-रिक्शा की खरीद तथा परिचालन लागत का पांच से दस वर्ष की अवधि के लिए स्वतंत्र और पारदर्शी तुलनात्मक अध्ययन कराने को कहा है. इसमें केवल वाहन की कीमत नहीं, बल्कि ऋण और ब्याज, रोजाना का परिचालन खर्च, बैटरी प्रतिस्थापन, मरम्मत, चार्जिंग में लगने वाला समय, वाहन के काम बंद रहने से होने वाली आय की हानि और पर्यावरणीय प्रभाव भी शामिल किए जाने चाहिए. संगठन ने CNG पंपों पर लगने वाली कतारों और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए उपलब्ध चार्जिंग सुविधाओं की वास्तविक स्थिति का तथ्यात्मक आकलन करने की मांग भी की है.

यूनियन का तर्क है कि स्वच्छ परिवहन की ओर बदलाव तभी प्रभावी और न्यायसंगत होगा, जब उसके लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं और आर्थिक सहायता उपलब्ध हों. चालकों को ऐसा विकल्प भी मिलना चाहिए, जिसे वे अपनी जरूरतों के मुताबिक अपना सकें. इस बदलाव का असर केवल वाहन मालिकों तक सीमित नहीं रहेगा. संगठन ने CNG ऑटो व्यवस्था से जुड़े मैकेनिकों, गैराज संचालकों और दूसरे श्रमिकों के रोजगार पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आंकलन करने की भी मांग की है.

यूनियन ने अपने अंतिम निवेदन में उपराज्यपाल से दिल्ली सरकार और परिवहन विभाग को आवश्यक निर्देश देने की अपील की है. संगठन चाहता है कि इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2026 के विवादित प्रावधानों की समीक्षा कराई जाए और समीक्षा तथा सार्थक परामर्श पूरा होने तक उनके क्रियान्वयन को स्थगित रखने के लिए नियमानुसार कदम उठाए जाएं.

यूनियन की सात प्रमुख मांगें-

  • पुराने CNG ऑटो को बदलने पर नया CNG या इलेक्ट्रिक ऑटो चुनने के विकल्प की दोबारा समीक्षा की जाए.
  • 1 जनवरी 2027 से संबंधित प्रावधान लागू होने से पहले प्रभावित संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक बैठक की जाए.
  • CNG और इलेक्ट्रिक ऑटो की खरीद लागत, परिचालन खर्च और पर्यावरणीय प्रभावों का तुलनात्मक अध्ययन सार्वजनिक किया जाए.
  • इलेक्ट्रिक L5 ऑटो की परमिट व्यवस्था का स्वतंत्र कानूनी परीक्षण कर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं.
  • संगठन के पुराने पत्रों, अनुस्मारकों और ईमेल पर हुई कार्रवाई का लिखित विवरण दिया जाए.
  • चालकों, वाहन मालिकों, मैकेनिकों, गैराज संचालकों और CNG ऑटो व्यवस्था से जुड़े दूसरे श्रमिकों की आजीविका की सुरक्षा के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाई जाए.
  • अंतिम निवेदन का लिखित जवाब देकर यूनियन के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात का समय तय किया जाए.

15 नवंबर से धरना-प्रदर्शन और हड़ताल की चेतावनी

किशन वर्मा ने कहा है कि यूनियन अब तक बातचीत और संवैधानिक माध्यमों से समाधान निकालने की कोशिश करती रही है. लेकिन यदि सरकार नीति की समीक्षा नहीं करती, पुराने CNG ऑटो के बदले नया CNG ऑटो खरीदने के विकल्प पर पुनर्विचार नहीं होता और प्रभावित संगठनों के साथ बैठक नहीं बुलाई जाती, तो संगठन 15 नवंबर 2026 से आंदोलन शुरू करने के लिए बाध्य होगा. उन्होंने कहा कि दिल्ली के ऑटो-रिक्शा एवं टैक्सी चालकों के साथ धरना-प्रदर्शन, विरोध कार्यक्रम और जरूरत पड़ने पर हड़ताल भी की जा सकती है. आंदोलन का विस्तृत कार्यक्रम प्रभावित चालकों से विचार-विमर्श के बाद घोषित किया जाएगा. 

यूनियन अध्यक्ष ने कहा कि संगठन की प्राथमिकता टकराव नहीं, बल्कि न्यायसंगत समाधान है. हालांकि, चालकों की आजीविका, आर्थिक सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए वह लोकतांत्रिक संघर्ष से पीछे नहीं हटेगा. किशन वर्मा ने कहा, 'पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन पर्यावरण के नाम पर मेहनतकश परिवारों की आर्थिक सुरक्षा की अनदेखी नहीं होनी चाहिए. सरकार को तकनीक के बदलाव के साथ इंसाफ, संवाद और आजीविका की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी.' 

उपराज्यपाल को भेजे गए अंतिम निवेदन में यूनियन ने 1 जनवरी 2027 से संबंधित प्रावधान प्रभावी होने से पहले हस्तक्षेप करने और दिल्ली सरकार तथा परिवहन विभाग को जरूरी निर्देश देने की अपील की है. अब संगठन की मांग है कि उसके सवालों का लिखित जवाब दिया जाए और चालकों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के जरिए कानूनसम्मत समाधान निकाला जाए.

अभिषेक नयन का पत्रकारिता में लंबा अनुभव है. साल 2011 से ABP News से जुड़े हैं. दिल्ली-NCR की राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक समस्याओं की जमीनी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग करते हैं.

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