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Ranveer Singh Encounter: इस एनकाउंटर के बाद 18 पुलिसवालों को एकसाथ हुई उम्रकैद, फिर राज्य में किसी ने नहीं सुनी 'गोलियों की गूंज'

MBA Student Ranveer Singh Encounter: उत्तराखंड में साल 2009 के एनकाउंटर का नतीजा यह निकला कि उसके बाद से अभी तक कोई एनकाउंटर वहां की पुलिस करने का साहस नहीं जुटा पाई.

Ranveer Singh Encounter 2009: एनआउंटर कहीं की पुलिस किसी भी वजह से क्यों न करे, उसको लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. इतना ही नहीं, कई मामलों में हंगामे के बाद सीबीआई तक जांच पहुंचती है. अधिकांश मामलों में मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में भी एनकाकाउंटर को गलत करार​ दिया जाता है. हैदराबाद एनकाउंटर और यूपी में विकास दुबे जैसे एनकाउंटर काफी चर्चित रहे हैं. विकास दुबे मामले में तो पहले से ही कहा जा रहा था कि उसका एनकाउंटर होगा. हुआ भी वही. यही वजह है कि एनकाउंटर को सरकारी कत्ल कहा जाता है. जांच में एनकाउंटर को गलत पाए जाने पर कई पुलिसकर्मियों को सजा भी मिल चुकी है, लेकिन एक एनकाउंटर में पुलिस वालों को ऐसी सजा मिली ​कि उस राज्य में फिर कभी पुलिस वालों ने निर्दोषों की तो छोड़िए, बदमाशों, गैंगस्टर्स व माफियाओं तक की एनकाउंटर ​करने की हिमाकत नहीं कर पाए हैं. यहां तक ​कि वहां के लोगों को उस घटना के बाद एनकाउंटर के गोलियों की गूंज नहीं सुनाई दी. 

जी हां, मैं बात कर रहा हूं, साल 2009 के उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के एक एनकाउंटर का, जिसमें पुलिसवालों ने मिलकर एक शिक्षित, होनहार और निर्दोष गाजियाबाद के एक युवा की जिसे बेमतल की बात पर बदमाश करार देते हुए वहां की पुलिस फर्जी एनकाउंटर में ढेर कर दिया था, लेकिन पुलिसवालों के घुसा वर्दी का सनकपन भारी पड़ा. इस मामले में सच सामने आने के बाद एक साल 18 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. एक, दो, तीन की संख्या में एनकाउंटर के मामले में पुलिसकर्मियों को सजा होती रहती हैं, लेकिन एक साथ देहरादून के फर्जी एनकाउंटर में होनहार युवा की हत्या कर देने के आरोप में 18 पुलिसकर्मियों को सजा मिलने की घटना देश के एनकाउंटर के इतिहास में नजीर बन गया. अभी तक और कोई ऐसा एनकाउंटर नहीं है, जिसमें इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मिसों को फेक एनकाउंटर को अंजाम देने का दुस्साहस करने के लिए सजा मिली हो. इसका नतीजा यह निकला कि उत्तराखंड पुलिस के इतिहास में साल 2009 के बाद एक भी पुलिस एनकांटर की घटना दर्ज नहीं है. इस घटना का खौफ वर्दीवालों पर इस कदम हावी है कि वहां की पुलिस अब एनकाउंटर की बात तक करने की हिमाकत नहीं कर पाती है. 
 

वर्दी की सनक ने ले ली रणबीर की जान

यह मामला साल 2009 की है. यूपी के गाजियाबाद के एक सामान्य परिवार के होनहार युवा रणवीर की जिदंगी की कहानी है, जो पुलिकर्मियों की सनकपन की वजह से इस दुनिया में नहीं रहा. उसके माता-पिता ने मेहनत की कमाई से दो—दो पैसा जोड़कर उसकी एमबीए तक की शिक्षा पूरी कराई. उसे लायक बनाया. एमबीए करने के बाद माता-पिता सोच रहे थे कि अब अपना बेटा बहुत जल्द अच्छी नौकरी कर आत्मनिर्भर हो जाएगा और अपने पुत्र की करियर की चिंता से हमेशा के लिए मुक्त हो जाऊँगा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. हुआ कुछ ऐसा कि जिसकी कल्पना दुनिया का कोई भी मां-बाप अपने बच्चे क्या दूसरों के बच्चों के लिए नहीं सोच सकते. दरअसल, रणबीर सिंह एमबीए करने के बाद रोजगार की तलाश में दो जुलाई 2009 को देहरादून की एक अच्छी कंपनी में इंटरव्यू देने के लिए गाजियाबाद से रवाना हुआ था. तीन जुलाई को वह इंटरव्यू में शामिल हुआ. उसका इंटरव्यू अच्छा गया, कंपनी ने अगले ही दिन से उसे अच्छी तनख्वाह की नौकरी की पेश की. रणबीर ने पेशकश को स्वीकार करते हुए देहरादून में यह सोचकर अपने दोस्त के पास रुक गया कि चार जुलाई से एक वर्किंग प्रोफेशनल्स के रूप में जिंदगी की नई शुरुआत करूंगा. नौकरी मिलने की सूचना पाकर उसके मा​ता-पिता भी बहुत खुश थे. इतने खुश थे कि उन्होंने अपने नजदीकियों को इस बात की सूचना भी दे दी कि रणबीर को देहरादून में अच्छी नौकरी मिल गई है. 

सीबीआई जांच में सामने आई पुलिस की करतूत

इस बीच नियति ने अपनी चाल चल दी. चार जुलाई 2009 को उत्तराखंड देहरादून के सभी अखबारों के फ्रंट पेज पर फ्रंट न्यूज यह छपी कि देहरादून पुलिस ने एक शातिर बदमाश को पुलिस चौकी इंचार्ज से रिवॉल्वर छीनकर भागने और जंगल में घिर जाने के बाद फायरिंग करने के दौरान पुलिस की जवाबी कार्रवाई में मार गिराया है. यहां पर आपको बता दें कि देहरादून पुलिस जिस बदमाश को एनकाउंटर करने का दावा कर रही थी वो कोई और नहीं बल्कि रणबीर सिंह था. इतना ही नहीं, बदमाश को एनकाउंटर में मार गिराने की खुशी की में पुलिस पार्टी ने रणबीर के शव के सामने अट्ठाहास करते हुए एक ग्रुप फोटो भी खिचवाए. खास बात यह है कि फ्रंट पेज पर सभी अखबारों में वही फोटो छपी थी. इस खबर को सुनते ही रणबीर के माता-पिता की खुशी गम में बदल गई. इस खबर को पाने के बाद रणबीर के माता-पिता और उनके कुछ करीबी देहरादून पहुंचे. वहां पहुंचने के बाद रणबीर के बारे में जब मीडिया को यह सूचना मिली कि वो तो होनहार युवक था. तीन जुलाई को इंटरव्यू देने आया था. ये बात मीडिया की जांचपड़ताल में जब सच साबित हुई तो अगले दिन देहरादून पुलिस के होश उड़ गए. पीड़ित परिवार वालों ने जमकर हंगामा किया. सीबीआई जांच की मांग की. मामले को बिगड़ता देख प्रदेश सरकार ने सीबीसीआईडी की जांच बैठाई, लेकिन मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने के बाद सीबीआई जांच को मंजूरी मिली. देहरादून पुलिस की फर्जी एनकाउंटर की रही सही कसर पांच जुलाई 2009 को आई पीएम रिपोर्ट ने पूरी कर दी. पीएम रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस अपनी मुंह छिपाने लायक भी नहीं रही.पीएम रिपोर्ट मरने वाले के जिस्म पर 22 गोलियां पुलिस ने मारी थी. उसके शरीर पर 28 जख्म थे. यहां पर सवाल यह उठा कि पुलिस ने पहले मृतक का टॉर्चर किया उसके बाद उसकी हत्या की है. यानी यह मामला पुलिस की ओर से जान बूझकर की गई हत्या है. 

पहली बार 18 पुलिसकर्मियों को मिली उम्रकैद की सजा

इस बीच सीबीआई ने जांच शुरू कर दी. सीबीआई ने चार जून 2014 को लोकल अदालत में चार्जशीट दाखिल की. अपनी जांच में सबूतों के साथ सीबीआई ने देहरादून के 18 पुलिसकर्मियों को रणबीर की ​हत्या का दोषी माना. साथ ही कहा कि हत्या जान बूझकर और प्रायोजित हत्या है. छह जून 2014 को अदालत ने सभी 18 कैदियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. इसके बाद उत्तराखंड ही नहीं देशभर के पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. दोषी पुलिसकर्मियों ने इसके खिलााफ दिल्ली हाईकोर्ट में रिट दायर की. दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 में 11 को डायरेक्ट हत्या में शामिल न होने के सबूते के आधार पर सजा से बरी कर दिया. वहीं सात लोगों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी. दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट पहुंची. सीबीआई ने शीर्ष अदालत में दावा किया है कि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला गलत है. इस मामले में निचली अदालत का फैसला सही है. सभी 18 दोषी पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा मिलनी चाहिए. रणबीर सिंह के पिता का भी कहना है कि उनके बेटे की हत्या पुलिस की वर्दी पर कलंक है, इ​सलिए 18 पुलिकर्मियों को सजा न मिलना उनके साथ अन्याय होगा. फिलहाल, 2009 के इस एनकाउंटर का नतीजा यह निकला कि उत्तराखंड में उसके बाद से अभी तक कोई एनकाउंटर वहां की पुलिस करने का साहस अभी तक नहीं जुटा पाई है.

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