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Chhattisgarh Election 2023: कोंटा विधानसभा...जिसे कहा जाता है कांग्रेस का गढ़, जानें- इस सीट का सियासी समीकरण

Chhattisgarh Elections: कोंटा विधानसभा  में आदिवासियों की संख्या अधिक है. इस कारण इस सीट को आदिवासियों के लिए आरक्षित किया गया है. फिलहाल इस सीट पर कांग्रेस के कवासी लखमा विधायक हैं.

Chhattisgarh Assembly Elections 2023: बस्तर (Batar) संभाग में 12 विधानसभा सीटें हैं. फिलहाल इन सीटों पर कांग्रेस का पूरी तरह से कब्जा है. कहते हैं कि जैसे भारत देश की सियासत का रास्ता उत्तर प्रदेश से तय होता है. ठीक वैसे ही छत्तीसगढ़ में सत्ता का रास्ता बस्तर संभाग से तय होता है. फिलहाल 2018 के चुनाव के बाद से अभी तक बस्तर संभाग के 12 विधानसभा सीटों में कांग्रेस का कब्जा है और इन सीटों में से एक कोंटा विधानसभा सबसे हाई प्रोफाइल सीट मानी जाती है. पिछले पांच विधानसभा चुनावों में लगातार यहां से कांग्रेस के नेता और वर्तमान में प्रदेश के आबकारी मंत्री कवासी लखमा ही चुनाव जीतते आ रहे हैं.

ऐसे में कांग्रेस (Congress) के इस किले को ढहाने के लिए इस बार बीजेपी (BJP) भी एड़ी चोटी लगा रही है. दरअसल, कोंटा विधानसभा  में आदिवासियों की संख्या अधिक है. इस कारण इस सीट को आदिवासियों के लिए आरक्षित किया गया है. फिलहाल इस सीट पर कांग्रेस के कवासी लखमा विधायक हैं, जो छत्तीसगढ़ सरकार में आबकारी मंत्री हैं. 1998 से पिछले 24 सालों से इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा है. कोंटा विधानसभा छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के आखिरी सीमा पर मौजूद है. इसके बाद तेलंगाना और उड़ीसा का सीमा लगती है. यही नहीं यह विधानसभा अत्यधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र है. 

गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी
छत्तीसगढ़ राज्य गठन से पहले और उसके बाद सबसे ज्यादा नक्सली वारदातें इसी विधानसभा में हुई हैं. इस वजह से सबसे ज्यादा फोर्स इसी जिले में तैनात है. लंबे समय से नक्सल समस्या से जूझ रहे इस क्षेत्र के ग्रामीणों का जो विकास होना था, वह आज तक नहीं हो पाया है. साथ ही यहां गांव-गांव में मूलभूत सुविधाओं की कमी है और यहां के ग्रामीण विकास से अभी भी काफी अछूते हैं. इन सब के बावजूद पिछले पांच विधानसभा चुनावों में इस सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी कवासी लखमा ही चुनाव जीतते आ रहे हैं.

 विधानसभा में आदिवासियों की जनसंख्या ज्यादा
आदिवासियों के लिए आरक्षित इस कोंटा विधानसभा सीट पर 80 फीसदी आदिवासी और 20 फीसदी अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के लोग हैं. यहां के माड़िया, हल्बा, दोरला, मुरिया चारों ही क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत आते हैं. आदिवासियों की जनसंख्या भी इस विधानसभा में सबसे अधिक है. इसके कारण यहां पार्टियों का फोकस भी आदिवासियों के ऊपर रहता है. मतदाताओं की संख्या की बात करें तो कोंटा विधानसभा सीट पर मतदाताओं की वर्तमान में कुल संख्या एक लाख 56 हजार 280 है. इनमें महिला मतदाताओं की संख्या 82 हजार 679 है और पुरुष मतदाताओं की संख्या 73 हजार 600 है. वहीं यहां थर्ड जेंडर का एक  मतदाता है. इस विधानसभा सीट पर पुरुषों की अपेक्षा महिला मतदाताओं की संख्या ज्यादा है.

कोंटा विधानसभा है कांग्रेस का गढ़
वहीं इस सीट की राजनैतिक समीकरण की बात की जाए तो कोंटा विधानसभा को हमेशा से ही कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है. कांग्रेस के प्रत्याशी कवासी लखमा ही लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे हैं. 1998 से लेकर 2018 के चुनाव तक पांच बार से लगातार चुनाव जीतकर कांग्रेस की सरकार बनने के बाद उन्हें आबकारी मंत्री बनाया गया है. माना जा रहा है कि इस बार भी कवासी लखमा को ही इस सीट से टिकट दिया जाएगा. कोंटा विधानसभा के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार सलीम शेख ने बताया कि ये कांग्रेस का गढ़ रहा है. इस विधानसभा से कांग्रेस के बड़े कद्दावर नेता कवासी लखमा ने ही चुनाव जीता है. कवासी लखमा ने बीजेपी के बड़े बड़े नेताओं को इस सीट से चुनाव हराया है और सभी चुनावों में वोटो का अंतर भी काफी ज्यादा रहा है.

दरअसल, पढ़े लिखे नहीं होने के बावजूद भी कवासी लखमा इस क्षेत्र में अपनी काफी अच्छी पकड़ रखते हैं और अपने राजनीतिक जीवन में शुरुआत से ही कांग्रेस का दामन थामे हुए हैं. स्थानीय लोगों से अच्छे संबंध होने की वजह से लगातार उन्हें यहां की जनता चुनाव में जीत दर्ज कराती आ रही है. कोंटा विधानसभा में हमेशा से ही बीजेपी कांग्रेस और सीपीआई के बीच लड़ाई होती आ रही है. इसमें कांग्रेस के प्रत्याशी की ही जीत होती रही है. वहीं कोंटा विधानसभा के जानकार रमाकांत साहू ने बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन होने के पहले से ही इसका अस्तित्व है. इस सीट को काफी हाई प्रोफाइल सीट माना जाता है, क्योंकि इस विधानसभा सीट का क्षेत्रफल काफी बड़ा है और यहां की जनसंख्या भी काफी ज्यादा है. 

यह क्षेत्र नक्सल प्रभावित
रमाकांत साहू  ने बताया कि यहां आदिवासियों की संख्या ज्यादा है और यह क्षेत्र नक्सल प्रभावित है.  पिछले सालों की तुलना में कोंटा विधानसभा  क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों और शहरी क्षेत्रों  की थोड़ी बहुत तस्वीर बदली है. वहीं  आदिवासियों की जनसंख्या ज्यादा होने की वजह से यह सीट हमेशा से ही उनके लिए आरक्षित है. छत्तीसगढ़  विधानसभा चुनाव में कोंटा विधानसभा पर सभी की निगाहें टिकी रहती हैं, क्योंकि यहां बीजेपी कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों से लड़ने वाले प्रत्याशी स्थानीय होने के साथ-साथ काफी कद्दावर नेता भी माने जाते हैं. हालांकि कांग्रेस हाईकमान ने 1998 के चुनाव से लेकर 2018 के चुनाव तक बार-बार कवासी लखमा को ही टिकट देता आ रहा है. वहीं कवासी लखमा सभी चुनाव में भारी मतों से जीत भी दर्ज कर रहे हैं. यही वजह है कि कांग्रेस की सरकार बनने के बाद उन्हें कैबिनेट में जगह दी गई है और वो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े नेता के रूप में भी जाने जाते हैं.

रमाकांत साहू  ने कहा कि  बीजेपी की बात की जाए तो वो हमेशा से ही इस सीट में प्रत्याशियों के चेहरे बदलती रही है और सभी को एक-एक मौका भी देती रही है, लेकिन पिछले 24 सालों से कांग्रेस के इस किले  को ढहा पाने  में बीजेपी के  किसी भी प्रत्याशी को सफलता नहीं मिली है.  वहीं सीपीआई भी इस सीट से बीजेपी को कांटे की टक्कर देते आ रही है. कई विधानसभा चुनावों में सीपीआई इस सीट पर सेकंड पोजीशन में रही, क्योंकि सीपीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कोंटा के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम इस सीट से चुनाव लड़ते आ रहे हैं. उनकी भी आदिवासियों में काफी अच्छी पकड़ है. इस वजह से हमेशा से ही कहा जाता है कि यहां कांग्रेस और  सीपीआई के बीच मुकाबला होता है, लेकिन सीपीआई भी अभी कवासी लखमा को हरा पाने में नाकामयाब ही  साबित हुई है.

विधानसभा का इतिहास
कोंटा विधानसभा के इतिहास की बात की जाए तो सन 1998 में हुए यहां हुए चुनाव में कवासी लखमा ने बीजेपी के प्रत्याशी को हराकर भारी मतों से जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में कोंटा विधानसभा में चार प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे. कांग्रेस से कवासी लखमा ने इस चुनाव में सीपीआई के प्रत्याशी मनीष कुंजाम को 17 हजार के मतों के अंतर से हराया. वहीं तीसरे पोजिशन पर बीजेपी के प्रत्याशी बुधराम सोढ़ी रहे. वहीं 2008 के चुनाव  में कवासी लखमा ने बीजेपी के प्रत्याशी पदम नंदा को 192 वोट के अंतर से हराया. इसके बाद 2013 के चुनाव में यहां से पांच प्रत्याशी मैदान में थे. इस चुनाव में भी कवासी लखमा ने बीजेपी के प्रत्याशी धनीराम बारसे को 5 हजार 786 मतों के अंतर से हराया. वहीं 2018 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने यहां से कवासी लखमा को ही टिकट दिया.  इस चुनाव में भी कवासी लखमा ने बीजेपी के प्रत्याशी धनीराम बारसे को 6 हजार 709 मतों के अंतर से हराया. पिछले पांच विधानसभा चुनावों से लगातार कवासी लखमा ही इस सीट से जीत दर्ज करते आ रहे हैं.

कवासी लखमा कांग्रेस के काफी कद्दावर नेता भी माने जाते हैं.  25 मई 2013 को हुए देश के सबसे बड़े नक्सली हमलो में से एक झीरम घाटी हमले में कांग्रेस की पूरी एक पीढ़ी नक्सलियों ने समाप्त कर दी थी. इनमें से इकलौते नेता कवासी  लखमा  हैं, जो अपनी जान बचाकर सुरक्षित इतनी बड़ी घटना से बाहर निकल आए थे. उसके बाद से छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता कवासी लखमा को जानने लगी.

स्थानीय मुद्दे
1. कोंटा विधानसभा छत्तीसगढ़ के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र में आता है. पिछले चार दशकों से इस क्षेत्र में नक्सलियों ने अपनी पैठ जमाई हुई है. नक्सल समस्या के कारण इस विधानसभा के सैकड़ों गांव विकास से पूरी तरह से अछूते हैं. सड़क, पुल, पुलिया, बिजली,पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य लगातार इस क्षेत्र की समस्या बनी हुई है. खासकर यहां कोंटा ब्लॉक का इलाका विकास से अछूता है.

2. बारिश के मौसम में इस विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. पुल पुलिये का निर्माण नहीं होने की वजह से यहां के सैकड़ों गांव टापू में तब्दील हो जाते हैं. यही नहीं यहां के सैकड़ों गांव के ग्रीमिण  तीन से चार महीने तक पूरे सुकमा मुख्यालय से कट जाते हैं. यही नहीं  यहां नदी और नालों पर पुल-पुलिया नहीं बनने की वजह से उफनते नदी नालों को पार करते वक्त ग्रामीण अपनी जान गंवा बैठते हैं.

3. इस विधानसभा क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी सबसे बड़ी समस्या है. हाल ही में एक अज्ञात बीमारी से 20 से अधिक ग्रामीणों की मौत हो गई थी. गांव-गांव तक स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंच पाने की वजह से इस क्षेत्र के ग्रामीण झाड़-फूंक पर निर्भर रहते हैं. कई गांवो में आज तक स्वास्थ्य केंद्र नहीं बन पाए हैं और ना ही बीमार ग्रामीणों को मुख्यालय तक लाने के लिए कोई सुविधा है. इस वजह से इलाज के अभाव में ग्रामीण दम तोड़ देते हैं. वहीं कई गांव तक आज तक बिजली नहीं पहुंच पाई है. आजादी के इतने साल बाद भी यहां ऐसे कई गांव हैं, जो पूरी तरह से अंधेरे में डूबे हुए हैं.

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