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पटना हाईकोर्ट में जातिगत सर्वे पर कौन सी दलील बिहार सरकार के खिलाफ गई?

बिहार सरकार के वकील पीके शाही ने हाईकोर्ट में जातिगत सर्वे का जोरदार बचाव किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं के 5 दलील भारी पड़ गया. पटना हाईकोर्ट ने सर्वे पर अंतरिम रोक लगा दी है.

बिहार में फिलहाल जाति गिनने पर पटना हाईकोर्ट ने रोक लगा दिया है. हाईकोर्ट ने सरकार की सभी दलीलें खारिज करते हुए अंतरिम रोक का फैसला सुनाया है. जातिगत सर्वे पर रोक लगने के बाद बिहार में सियासत भी खूब हो रही है.

आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का कहना है कि जातीय जनगणना तो होकर रहेगा. डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कहा है कि सरकार मजबूती से कोर्ट में पक्ष रखेगी. गणना तो होना ही है और हम केंद्र से भी इसकी मांग करेंगे.

बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने इस आदेश पर कहा है कि हाईकोर्ट में नीतीश सरकार ने सही से पक्ष नहीं रखा. इस वजह से हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है. नीतीश कुमार को असंवैधानिक कार्य करने की आदत है.

सत्ताधारी जेडीयू ने इस मामले में याचिककर्ताओं पर सवाल उठाया है. जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा है कि बीजेपी गाजियाबाद के लोगों से याचिका डलवा रही है और पर्दे के पीछे सक्रिय है.

जातीय गणना के खिलाफ हाईकोर्ट में 5 याचिका
पटना हाईकोर्ट में जातिगत गणना के खिलाफ 5 याचिका दाखिल है, जो एनजीओ यूथ फॉर इक्वलिटी, एनजीओ सोच-एक प्रयास, रेशमा प्रसाद, अखिलेश कुमार और मुस्कान कुमारी ने अलग-अलग दाखिल की है. कोर्ट सभी याचिकाओं को मिलाकर सुनवाई कर रही है. 

याचिका में केंद्र सरकार को भी प्रतिवादी बनाया गया है. एनजीओ यूथ फॉर इक्वलिटी जातिगत आरक्षण के खिलाफ पहले भी कोर्ट में याचिका दाखिल करता रहा है. वहीं एनचीओ सोच-एक प्रयास (ESEP Trust) दिल्ली का स्वयंसेवी संगठन है.

बिहार में जातिगत सर्वे के खिलाफ सबसे पहले इसी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था, जिस पर कोर्ट ने हाईकोर्ट जाने के लिए कहा था. एक याचिकाकर्ता रेशमा प्रसाद ट्रांसजेंडर हैं और जातिगत के बजाय लिंग आधारित गणना की मांग कर रही हैं.

जातिगत सर्वे को लेकर बिहार सरकार का आदेश क्या है?
6 जून 2022 को बिहार सरकार ने जातिगत सर्वे को लेकर एक अधिसूचना जारी की. सरकार की ओर से कहा गया कि बिहार में सभी जातियों और उसके उपजातियों को गिना जाएगा. इसका मकसद कल्याणकारी योजनाओं को बेहतरीन ढंग से लागू करना बताया गया.

7 जनवरी से 15 मई 2023 तक दो चरणों में इसका काम पूरा होना था. सरकार ने बिहार में जातियों के लिए 215 कैटेगरी भी बना रखी थी. सर्वे के दौरान लोगों से 17 सवाल पूछे जा रहे थे, जिसे ऑफलाइन और ऑनलाइन रिकॉर्ड किया जा रहा था.

बिहार सरकार ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के खिलाफ फिर से अपील दायर की है. सरकार का कहना है कि आदेश अंतरिम नहीं लग रहा है, इस पर तुरंत सुनवाई कर फाइनल ऑर्डर दिया जाए.

5 दलीलें, जो बिहार सरकार के खिलाफ गई

1. सर्वे से व्यक्तिगत पहचान उजागर होगी- याचिकाकर्ता के वकील अभिनव श्रीवास्तव ने कोर्ट से कहा कि 1931 में भारत में पहली बार जातिगत सर्वे हुआ था. उस वक्त देश में 74 जातियां को रिकॉर्ड में लिया गया था. बिहार सरकार के कथित सर्वे में 215 जातियां रिकॉर्ड में है.

सरकार भले इसे सर्वे बता रही हो, लेकिन जो तरीका है वो जनगणना का है और इससे व्यक्तिगत पहचान उजागर होगी. अगर ऐसा होता है तो यह आम लोगों के लिए खतरा है. किसी के व्यक्तिगत पहचान को निजी लाभ या हानि के लिए उपयोग किया जा सकता है.

2. फॉर्मेट जनगणना वाला, मकसद साफ नहीं- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिहार सरकार ने जातिगत सर्वे के लिए एक फॉर्मेट तैयार किया है. यह फॉर्मेट जनगणना वाला है. इसमें जो सवाल पूछे जा रहे हैं, उसमें से अधिकांश जनगणा वाले सवाल हैं. 

सर्वे का मकसद भी सरकार साफ-साफ नहीं बता रही है. सरकार का कहना है कि कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर बनाने के लिए यह सर्वे कराया जा रहा है. व्यवसायिक और योजनाओं के रणनीतिक उपयोग के लिए होने वाले सर्वे में ओपिनियिन लिया जाता है, न कि व्यक्तिगत जानकारी.

3. सर्वे डेटा लीक होने का खतरा- याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सर्वे का डेटा लीक हो सकता है और इसका उपयोग दूसरे जगहों पर निजी फायदे के लिए किया जा सकता है. 

दलील में कहा गया कि सरकार ने डेटा सुरक्षा के लिए कोई खास इंतजाम नहीं किया है. सरकार स्वैच्छिक आधार पर इस डेटा को इकट्ठा करवा रही है. डेटा अगर लीक हुआ तो कौन इसके लिए जिम्मेदार होगा?

4. सर्वे के लिए इमरजेंसी फंड का उपयोग- याचिकाकर्ता के वकील दीनू कुमार ने अपने दलील में कहा कि बिहार सरकार इस सर्वे के लिए इमरजेंसी फंड का उपयोग कर रही है. कुमार ने कहा कि सर्वे के लिए करीब 500 करोड़ रुपए खर्च किया जा रहा है.

दलील के मुताबिक बिहार सरकार ने इमरजेंसी फंड के उपयोग के लिए नियम का पालन भी नहीं किया है. पैसा खर्च करने की जो पूरी कवायद है, वो दुर्भाग्यपूर्ण है.

5. ट्रांसजेडर को जाति में बांटना गलत- याचिकाकर्ता के वकील मुन्ना दीक्षित ने कोर्ट में कहा कि सरकार के इस सर्वे में ट्रांसजेंडरों को भी जातिगत खांचे में बांट दिया गया है. यह नेशनल लीगल सर्विस ऑथोरिटी के टिप्पणी की अवहेलना है.

नेशनल लीगल सर्विस ऑथोरिटी ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि ट्रांसजेडर एक अलग पहचान है. ट्रांसजेंडर को जाति में बांटने से उस वर्ग का नुकसान हो सकता है. 

हाईकोर्ट में सरकार ने किया जोरदार बचाव
याचिकाकर्ताओं की दलीलों का हाईकोर्ट में सरकार ने जोरदार बचाव किया. सरकार के महाधिवक्ता पीके शाही ने कहा कि सर्वे में 17 सवाल पूछे जा रहे हैं, इससे व्यक्तिगत पहचान को कोई खतरा नहीं है.

शाही ने आगे कहा कि ट्रांसजेंडर को अलग-अलग जातियों में नहीं बांटा जा रहा है. साथ ही इमरजेंसी फंड की बात बेबुनियाद है. सरकार ने सर्वे के लिए अलग से व्यवस्था की है.

सर्वे कराना राज्यों का अधिकार है और दोनों सदनों से इसे पास कराया गया है. बिहार कैबिनेट ने भी इसकी संस्तुति दी है. हम विधिसम्मत तरीके से सर्वे करा रहे हैं. डेटा सुरक्षा का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है और इसके लिए विशेषज्ञों से मदद ली जा रही है. 

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा है?
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस मधुरेश की बेंच ने सर्वे पर अंतरिम रोक लगाते हुए कहा कि डेटा को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि सर्वे का काम अभी रोक दिया जाए. पूरी सुनवाई के बाद ही इस पर आगे का फैसला हो.

कोर्ट ने 3 जुलाई को अगली सुनवाई के लिए तिथि निर्धारित की. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से इस पर सुनवाई करने के लिए कहा था. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सुनवाई के बीच सर्वे का काम हो जाएगा तो फिर इसका क्या फायदा है?

बिहार सरकार के पास ऑप्शन क्या?
बिहार सरकार ने हाईकोर्ट में फिर से अपील की है और कहा है कि इस पर जल्द सुनवाई करे. हाईकोर्ट अगर अपील पर राजी होती है तो सर्वे के मुद्दे पर गर्मी छुट्टी में भी नियमित सुनवाई संभव है. 

हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का भी रास्ता खुला है. सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश के नाम पर अंतिम आदेश दे दिया है. 

सरकार सर्वें कराने के पक्ष में क्यों?

1. संख्या के बारे में सटीक जानकारी मिलेगी- एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में सांख्यिकी विभाग के प्रोफेसर सुधीर कुमार नीतीश के इस फैसले को सही ठहराते हैं. संसद टीवी से बात करते हुए सुधीर कुमार कहते हैं कि 1931 के बाद समानुपात में सभी वर्गों की जनसंख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई. बिहार में जाति जनगणना अगर होती है, तो उससे सही संख्या के बारे में जानकारी मिल सकेगी.

सरकार के लोग भी दबी जुबान इसी बात को कहते हैं. सरकार का कहना है कि जातियों का डेटा अगर रहेगा तो योजनाओं को लागू करने में आसानी होगी. 

2. अन्य मुद्दों पर सरकार को राहत- जाति गणना के बाद ओबीसी आरक्षण की मांग तेज होने के आसार हैं. इससे सरकार को अन्य मुद्दे लॉ एंड ऑर्डर, शराबबंदी जैसे मुद्दे पर राहत मिल सकती है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में 2024 में लोकसभा का चुनाव भी इसी मुद्दे पर लड़ा जा सकता है.

2009 के आसपास बिहार में इसी तरह विशेष राज्य का मुद्दा हावी था. इसका फायदा भी उस वक्त नीतीश कुमार को मिला था. बाद में यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया.

वहीं इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन स्टडी में डेटा विभाग के प्रमुख डॉ एसके सिंह इस दांव से जातियों में गतिरोध बढ़ने की आशंका जताते हैं. सिंह के मुताबिक डेटा जुटाना और जनसंख्या करने में फर्क है. राज्य में इस फैसले के बाद जातियों के बीच गतिरोध बढ़ सकता है.

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