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बिहार चुनाव स्पेशल: क्या प्रशांत किशोर बड़ी ताकत बनकर उभरेंगे? एक्सपर्ट से समझें

Bihar Election 2025: राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडे ने कहा कि प्रशांत किशोर का मुख्य मकसद महागठबंधन को सरकार में आने से रोकना और एनडीए सरकार को सत्ता से बाहर करना है.

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है. मुख्य मुकाबला एनडीए गठबंधन और महागठबंधन में पहले से होता रहा है. लेकिन इस बार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी चुनाव मैदान में है और ऐसी संभावना बन रही है कि इस बार त्रिकोणीय मुकाबला हो सकता है. लेकिन सवाल है कि क्या महज 1 साल की पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर इस चुनाव में बड़ी ताकत के तौर पर उभरेंगे? 

सवाल ये भी है कि क्या वो दोनों गठबंधन को डैमेज कर सकते हैं या अपने बलबूते बिहार में सरकार बना सकते हैं. अभी चुनाव में एक महीने से ज्यादा का वक्त है, ऐसे में प्रशांत किशोर की ताकत कितनी होगी? इस पर राजनीतिक जानकारों ने अपनी बात रखी है.

प्रशांत किशोर का क्या है मकसद?

राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडे ने कहा, ''प्रशांत किशोर जिस तरह से बिहार की राजनीति में सक्रिय हुए हैं और लगातार कई तरह के वादे के साथ साथ आरजेडी, बीजेपी, जेडीयू, और कांग्रेस के नेताओं पर सवाल भी उठाते रहे हैं. उनका मुख्य मकसद महागठबंधन को सरकार में आने से रोकना और एनडीए सरकार को सत्ता से बाहर करना है. इसके लिए उन्होंने दोनों राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी और कांग्रेस पर भी हमला किया है.'' 

क्या 2020 के चिराग वाली स्थिति में रहेंगे प्रशांत किशोर?

उन्होंने आगे कहा, ''पहले आरजेडी प्रशांत किशोर को बीजेपी का B टीम कह रही थी लेकिन हाल के दिनों में देखा गया है कि उन्होंने बीजेपी और जेडीयू के कई बड़े नेताओ पर हमला किया है, इससे भी जनता प्रभावित हुई है.'' पांडे ने आगे कहा, ''यह तो नहीं कहा जा सकता है कि वह कितनी सीट लाएंगे, लेकिन जिस तरह से प्रशांत किशोर चुनाव में उभर रहे हैं, निश्चित तौर पर वो दो धारी तलवार के रूप में काम करेंगे, जो महागठबंधन और एनडीए दोनों के उम्मीदवारों के डैमेज करने का काम कर सकते हैं. 2020 में जिस तरह चिराग पासवान मात्र एक सीट लाए थे लेकिन NDA को कमजोर कर दिए थे, वही स्थिति इस बार प्रशांत किशोर की रह सकती है.

प्रशांत किशोर मीडिया में ज्यादा बने हुए- संतोष कुमार

वहीं राजनीतिक जानकार संतोष कुमार कहा, ''प्रशांत किशोर अभी जिस तरह से चर्चा में हैं, यह वोट में तब्दील होगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है .अभी चुनाव में वक्त है और मेरा मानना है कि मीडिया में वह ज्यादा बने हुए हैं. सोशल मीडिया से लेकर सभी मीडिया में इनको प्रमुखता दिया जा रहा है. लेकिन जनता के बीच ऐसी ताकत नहीं बनती दिख रही है. 

क्या 1995 का इतिहास दोहराया जाएगा?

उन्होंने कहा, ''जिस तरह से प्रशांत किशोर अभी बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं, उससे यह लग रहा है कि 1995 का इतिहास दोहराया जा रहा है. जब नीतीश कुमार लालू से अलग होकर 1995 में पूरे बिहार में अति पिछड़ा को एकजुट करने का काम किए थे तो उन्हें 7 सीट मिली थी. उसी वर्ष  आनंद मोहन अपनी पार्टी बनाए थे जिसका नाम बिहार पीपुल्स पार्टी था और उस वक्त चुनाव में पूरी सक्रिय थे जब वह गांधी मैदान में रैली किए थे तो पूरा गांधी मैदान भर गया था.'' 

संतोष कुमार कहा ये भी कहा, ''उस वक्त ऐसा माना जा रहा था कि आनंद मोहन लालू प्रसाद के किले को ध्वस्त कर देंगे लेकिन चुनाव में क्या हुआ सब लोगों ने देखा, मात्र 4 सीट आनंद मोहन जीते थे. उस वक्त भी आनंद मोहन पर कई लोगों ने आरोप लगाया था कि लालू प्रसाद के इशारे पर वह काम कर रहा है और यह बात जब आनंद मोहन के कान में आई थी तो जमकर लालू प्रसाद को गाली दिए थे. लेकिन लालू प्रसाद की सरकार बनी थी. 

हवा बनने और वोट में तब्दील होने में अंतर- संतोष कुमार

उन्होंने आगे कहा, ''हवा बनना और वोट में तब्दील होना दोनों में अंतर है. ऐसा नहीं माना जा सकता है कि इस चुनाव में प्रशांत किशोर बड़ी ताकत बन सकते हैं. यह अलग बात है कि एनडीए गठबंधन और महागठबंधन के कई सीटों पर वह प्रत्याशियों को डैमेज कर सकते हैं. वह भी प्रत्याशियों पर निर्भर करता है. प्रशांत किशोर दोनों गठबंधन को डैमेज कर सकते हैं लेकिन सीट ज्यादा लाने की उम्मीद है. उन्होंने दावा किया कि PK दो नंबर तो कभी नहीं ला सकते है यह मेरा मानना है.''

परमानंद सिंह 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. कशिश न्यूज़ सहित पटना में कई प्रतिष्ठित चैनलों में काम करने का अनुभव प्राप्त है. बिहार की खबरों पर इनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है.  कई एक्सक्लूसिव खबर कर चुके हैं. राजनीति से लेकर क्राइम तक की खबरों में इनकी रुचि है. पांच साल से एबीपी बिहार से जुड़े हैं. डिजिटल विंग के लिए काम कर रहे हैं.

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