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अनंत सिंह के लिए एक और 'सूरजभान' बन गए सोनू-मोनू, 'छोटे सरकार' फिर गिरफ्तार

Anant Singh News: अनंत सिंह अपराध और राजनीति के बल पर 'छोटे सरकार' कहलाए। उनके शिष्य सोनू-मोनू ने उन्हें चुनौती दी और गोलियां चलाईं. अनंत सिंह ने पहले समझौता करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे.

Bihar News: अपने नाम के मुताबिक ही अनंत अपराधों में लिप्त अनंत सिंह ने अपराध और राजनीति के कॉकटेल के जरिए खुद को 'छोटे सरकार' की ऐसी उपाधि दी कि उसे कोई चैलेंज नहीं कर पाया. लेकिन ये अब इतिहास की बात है. अब तो 'छोटे सरकार' के दो शागिर्दों ने ही उन्हें इस कदर मजबूर कर दिया है कि वो खुद चलकर अदालत पहुंचे हैं और सरेंडर हो गए हैं. 

तो क्या अब मोकामा इलाके में छोटे सरकार का इकबाल खत्म हो गया है, क्या छोटे सरकार के लिए एक और सूरजभान बन गए हैं सोनू-मोनू और क्या सरकार की सरपरस्ती के बावजूद अनंत सिंह इतने कमजोर हो गए हैं कि उनसे आधी उम्र के लड़के भी उन्हें ओपन चैलेंज कर रहे हैं और अनंत सिंह कुछ करने की बजाय सरेंडर करने को मजबूर हो गए हैं. आखिर क्या है अनंत सिंह के अनंत अपराधों के जरिए बनाए गए साम्राज्य के ध्वस्त होने की पूरी कहानी, आज बताएंगे विस्तार से.

1990 के चुनाव में दिलीप सिंह खुद बने विधायक
अनंत सिंह की अपराध गाथा शुरू होती है अपने बड़े भाई की हत्या के बदले से. अनंत सिंह के सबसे बड़े भाई विरंची सिंह की हत्या का बदला अनंत सिंह ने खुद लिया था और नदी पार बैठे भाई के हत्यारे को तैरकर नदी पार करके ईंट-पत्थरों से कूंचकर मार डाला था. लेकिन तब अनंत सिंह पर कोई हाथ नहीं डाल पाया क्योंकि अनंत सिंह के एक और भाई दिलीप सिंह कांग्रेस के विधायक श्याम सुंदर सिंह धीरज के खास थे और तब बिहार में कांग्रेस की ही सरकार थी. लेकिन 1990 के चुनाव में दिलीप सिंह खुद मोकामा से जनता दल से विधायक बन गए. ये वही चुनाव था, जिसमें लालू यादव जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.

सूरजभान से मिली थी चुनौती
जब भाई विधायक हो और वो भी उस पार्टी का जिसकी बिहार में सरकार हो, तो किस पुलिसवाले की इतनी हैसियत की वो हाथ डाले. अनंत सिंह को इसका फायदा मिला. उन्होंने अपराध किया तो था, लेकिन राजनीति ने उन्हें बचा लिया. और फिर अपराध और राजनीति के कॉकटेल ने अनंत सिंह को उस शिखर पर पहुंचा दिया, जहां लोग उन्हें छोटे सरकार कहने लगे. लेकिन छोटे सरकार बनने के क्रम में ही उन्हें पहली और आखिरी चुनौती मिली उनके भाई के एक शागिर्द से, जिसका नाम है सूरजभान.

सूरजभान ने भी कर दी दिलीप सिंह के खिलाफ बगावत 
श्याम सुंदर धीरज से अलग होकर जब दिलीप सिंह ने अपना राजनीतिक रसूख हासिल कर लिया तो उन्हें भी एक ऐसे लड़के की जरूरत थी, जो बाहुबली हो और जो अपने नेता के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो. सूरजभान में दिलीप सिंह को वो सारी खूबियां नजर आईं. और सूरजभान दिलीप सिंह के शागिर्द बन गए. लेकिन लंबे समय तक सूरजभान को शागिर्दी नहीं करनी थी. उन्हें भी बॉस बनना था. और उन्हें बॉस बनाने में मदद की उन्हीं श्याम सुंदर सिंह धीरज ने, जिन्हें दिलीप सिंह से धोखा मिला था. और जब सूरजभान पर श्याम सुंदर सिंह धीरज ने हाथ रखा तो सूरजभान ने भी दिलीप सिंह के खिलाफ बगावत कर दी. मौका भी खुद दिलीप सिंह ने ही दिया था. 

क्योंकि दिलीप सिंह के एक और गुर्गे रहे नागा सिंह ने सूरजभान के चचेरे भाई मोती सिंह की हत्या कर दी.  सूरजभान का अनंत सिंह से टकराव हुआ. और भयंकर टकराव हुआ, जिसने बाढ़ इलाके को गोलियों से धुंआ-धुंआ कर दिया. इस लड़ाई में अनंत सिंह सूरजभान पर भारी पड़े थे और 2005 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने अपने भाई दिलीप सिंह की हार का बदला भी ले लिया था.  अनंत सिंह के बल पर तीन-तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके नीतीश कुमार ने साल 2005 में अनंत सिंह को मोकामा से विधानसभा का टिकट दे दिया. अनंत जीत गए वहीं सूरजभान ने भी रास्ता बदल लिया और वो जेल से बेल और लोकसभा की राजनीति में व्यस्त हो गए.

और फिर शुरू हुई अनंत सिंह की अनंत कहानियां, जिसमें 2005 और 2010 में नीतीश कुमार के साथ तो 2015 में नीतीश-लालू के विरोध के बावजूद भी अनंत सिंह जीतते रहे. उनकी बादशाहत को चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा. नीतीश से अदावत हुई तो जेल भी जाना पड़ा, लेकिन सियासी मजबूरियों ने नीतीश कुमार और अनंत सिंह की फिर से दोस्ती करवा दी तो अनंत के खिलाफ हर केस-मुकदमा खारिज हो गया. वो आखिरी केस में भी बरी होकर बाहर आ गए. 2025 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में व्यस्त हो गए. लेकिन इसी व्यस्तता में दो भाइयों सोनू और मोनू ने उनके एक आदमी को धमकी दे दी. 

'सोनू-मोनू उनके ही पुराने आदमी थे'
अपनी रौ में बहने वाले छोटे सरकार खुद को रोक नहीं पाए और चले गए समझौता करवाने. लेकिन सोनू-मोनू भी तो उनके ही पुराने आदमी थे. उन्हीं के शागिर्द. तो शागिर्दों ने गुरु को चुनौती दे दी. और चुनौती क्या सीधे गोलियां चला दीं. वो भी दो-चार राउंड नहीं 60-70 राउंड. और फिर धमकी भी दे दी कि अब वो 68 साल के हैं और हम 34 के.

अनंत सिंह के 8 लोग मारे गए थे 
बात अनंत सिंह ने भी की. अपने ही शागिर्दों को चोर-उचक्का कहा. मरने-मारने की बात कही. लेकिन इसी बात में वो खीझ साफ दिखने लगी कि कोई तो है, जिसने छोटे सरकार को चुनौती दी है. और अभी छोटे सरकार कुछ कर पाते, उससे पहले ही नीतीश कुमार की पुलिस की सख्ती बढ़ने लगी. सोनू ने सरेंडर किया तो अनंत सिंह पर गिरफ्तारी देने का दबाव बढ़ गया.

हालांकि अनंत ऐसे थे नहीं, क्योंकि जिन्हें 1999 की अनंत सिंह की एसटीएफ से मुठभेड़ याद होगी उन्हें याद होगा कि अनंत सिंह के लोगों ने एसटीएफ पर भी फायरिंग की थी, जिसमें अनंत सिंह के 8 लोग मारे गए थे और उसके बाद भी पुलिस अनंत को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. लेकिन तब वो सिर्फ छोटे सरकार थे, अब वो पूर्व विधायक भी हैं, विधायक पति भी हैं और खुद को मोकामा के भावी विधायक के तौर पर भी देख रहे हैं.

ऐसे में किसी विवाद में उलझने की बजाय उन्होंने सरेंडर का रास्ता चुना. खुद ही अदालत में सरेंडर कर दिया. लेकिन इस सरेंडर के बाद सवाल तो उठ ही रहे हैं कि क्या अब छोटे सरकार का मोकामा में इकबाल खत्म हो गया है. और क्या अब सोनू-मोनू अनंत सिंह के लिए दूसरे सूरजभान बनते जा रहे हैं, क्योंकि सूरजभान भी कभी अनंत सिंह के भाई दिलीप सिंह के शागिर्द ही हुआ करते थे, जिन्होंने दिलीप सिंह-अनंत सिंह से बगावत कर चुनाव लड़ा और जीत भी गए और ये सोनू-मोनू भी कभी अनंत सिंह के ही शागिर्द रहे हैं, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा इतनी है कि बहन का चुनाव खारिज होने के बाद अनंत सिंह की मुखालफत कर अपनी मां को मुखिया बनवा चुके हैं और अब नजर मोकामा की विधानसभा सीट पर भी है. 

25 साल पहले जिस जगह पर सूरजभान थे, वहां पर अब सोनू-मोनू हैं. 25 साल पहले भी अनंत के भाई दिलीप सिंह की पार्टी की सरकार थी और 25 साल बाद भी अनंत सिंह के दोस्त नीतीश कुमार की सरकार है. सरकार रहते हुए भी 25 साल पहले अनंत के भाई हार गए थे तो क्या अब 25 साल बाद इतिहास फिर से खुद को दोहराने जा रहा है. छोटे सरकार के इकबाल पर उठे सवाल तो इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें: 'जब वो पैदा किए हैं तो...', अपराध को लेकर दिलीप जायसवाल का लालू-तेजस्वी परिवार पर गंभीर आरोप

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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