भारत की आलोचना और आतंक के पनाहगार पाकिस्तान को अरबों डॉलर की मदद... कनाडाई लेखक ने समझाया अमेरिका का खेल
कनाडाई लेखक पीटरसन ने अमेरिका और उनके सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा कि वैश्विक महाशक्तियां बलिदान नहीं करतीं, वे हिसाब-किताब करती हैं. वे निवेश करती हैं.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत को अमेरिका अकसर मानवाधिकार और धार्मिक सद्वाव को लेकर पाठ पढ़ाता रहता है, वहीं दूसरी ओर दुनियाभर में आतंक के लिए कुख्यात पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की बजाए उल्टा उसे इनाम देता है. इसके पीछे के कारण एक पॉडकास्ट में डॉ. जॉर्डन पीटरसन ने बताए.
कनाडाई मनोवैज्ञानिक, लेखक और मीडिया टिप्पणीकार डॉ. जॉर्डन बी. पीटरसन ने इसका सीधा जवाब देते हुए कहा कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए उपयोगी है. कनाडाई लेखक ने अमेरिकी विदेश नीति की आलोचना करते हुए वॉशिंगटन पर लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह रणनीतिक पहुंच को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया.
पीटरसन ने कहा, "यह सोवियत क्षेत्र की सीमा से शरू हुआ, इसने अमेरिका को चीन के पास पैर जमाने का मौका दिया. इसने अफ़गानिस्तान में एक चैनल की पेशकश की और अंत में उस उपयोगिता ने अमेरिका की लोकतंत्र, धार्मिक उग्रवाद या आतंकवाद के बारे में सोचने की चिंता ही खत्म कर दी."
'भारत को दबाकर पाकिस्तान को अरबों डॉलर दिए जाते हैं'
उन्होंने पाकिस्तान और भारत की तुलना करते हुए कहा कि भारत, अपने स्वतंत्र चुनावों, बहुलवाद और स्वतंत्र न्यायालयों के साथ दबाव और आलोचना का शिकार होता है. वहीं, पाकिस्तान, जिसने आतंकवादियों को पनाह दी, असहमति को दबाया और वैश्विक सहानुभूति का दुरुपयोग किया, वो अरबों डॉलर की सहायता और हथियार पाता है.
पीटरसन ने भारत के भीतर की निराशा को दोहराते हुए कहा कि आपको ऐसा लगता है कि आपके देश को कड़ी मेहनत करने के बावजूद लगातार उन मानकों के आधार पर आंका जाता है, जिन पर किसी और का कोई हक नहीं है, यह न केवल अनुचित है बल्कि अपमानजनक भी है. 1980 के दशक को याद करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान में आतंकवादियों को हथियार दिए और प्रशिक्षित किया जो बाद में तालिबान में बदल गए. जब उन ताकतों ने क्षेत्र को अस्थिर किया तब भी अमेरिका का रुख नहीं बदला बल्कि ये बस और विकसित होता गया.
मीडिया टिप्पणीकार डॉ. जॉर्डन बी. पीटरसन ने अमेरिका और उनके सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा कि वैश्विक महाशक्तियां बलिदान नहीं करतीं, वे हिसाब-किताब करती हैं. वे निवेश करती हैं और वे ऐसे निवेशों को छोड़ देती हैं जो अब हाई रिटर्न नहीं देते.
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Source: IOCL





















