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नहीं रहे पोप फ्रांसिस, UAE और ईरान जैसे मुस्लिम बहुल देशों का किया दौरा, जानें इस्लाम पर क्या थे उनके विचार

Pope Francis On LGBTQ Rights: पोप फ्रांसिस ने गर्भपात के पक्ष में अपना रुख बरकरार रखा और मुसलमानों और हाशिए पर पड़े धार्मिक समुदायों तक अपनी पहुंच बनाई.

Pope Francis On Abortion: ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप फ्रांसिस का 88 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्हें निमोनिया की शिकायत के बाद रोम के जेमेली अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां वो 38 दिनों तक भर्ती रहे. अपनी मौत से पहले ईस्टर के मौके पर उन्होंने श्रद्धालुओं को अपने दर्शन भी दिए थे.

जबतक वो पोप रहे उन्होंने मौत की सजा और परमाणु हथियारों जैसे मुद्दों पर चर्च की एजुकेशन को नया रूप दिया. हालांकि गर्भपात जैसे विषय पर उनका रुढ़िवादी रुख दिखा लेकिन मुसलमानों और अन्य समुदायों के साथ संबंध बनाने के लिए बहुत काम किया. एबॉर्शन को लेकर उनका मानना था कि इस कल्चर को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

दुनिया के प्रमुख मुद्दों पर क्या था पोप फ्रांसिस का रुख?

इस्लाम पर क्या थी राय

पोप फ्रांसिस ने इस्लाम के साथ अंतरधार्मिक संवाद को महत्वपूर्ण रूप से आगे बढ़ाया. उन्होंने सुन्नी और शिया दोनों नेताओं के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाया. मिस्र के शेख अहमद अल-तैयब के साथ मानव बंधुत्व पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और यूएई और इराक जैसे मुस्लिम बहुल देशों का दौरा किया, ऐसा करने वाले वे पहले पोप बने. उनके प्रयासों ने आपसी सम्मान और शांति को बढ़ावा दिया.

गर्भपात

पोप फ्रांसिस ने गर्भपात के खिलाफ चर्च के पारंपरिक रुख को बरकरार रखा, इसे थ्रोअवे कल्चर का हिस्सा बताया और यहां तक ​​कि इसकी तुलना एक हत्यारे को काम पर रखने से की. हालांकि, उन्होंने निंदा के बजाय करुणा पर जोर दिया और चर्च से गर्भपात कराने वाली महिलाओं के साथ आध्यात्मिक रूप से जुड़ने का आग्रह किया. उन्होंने नियमित पादरियों को पाप के लिए क्षमा देने का अधिकार दिया. जबकि पहले केवल बिशप ही ऐसा कर सकते थे. उनका कहना था कि पादरियों को उन महिलाओं के प्रति दयालु होना चाहिए जिन महिलाओं ने एबॉर्शन कराया है.

LGBTQ+

इस मुद्दे पर उन्होंने कहा था, ‘मैं कौन होता हूं न्याय करने वाला.’ कैथोलिक समलैंगिकों को लेकर उनका कहना था कि एलजीबीटीक्यू व्यक्तियों को भगवान प्यार करते हैं और चर्च में उनका स्वागत है. हालांकि उन्होंने समलैंगिक कृत्यों को अव्यवस्थित करार देने वाले सिद्धांत को नहीं बदला. अर्जेंटीना में उन्होंने समलैंगिक विवाह का विरोध किया और समझौते के तौर पर सिविल यूनियन्स का समर्थन किया.

पादरी के दुर्व्यवहार पर

चर्चों में बच्चों के साथ यौन शोषण की बात को पोप फ्रांसिस ने स्वीकार की थी और इसके लिए माफी भी मांगी थी. इसके साथ ही उन्होंने बिशपों पर इस्तीफा देने का दबाव भी बनाया था. उन्होंने चर्च के कानूनों में भी सुधार किया ताकि पोप की गोपनीयता को हटाया जा सके और बिशपों को जवाबदेह ठहराने के लिए प्रक्रियाएं की जा सकें. फिर भी, कभी-कभी उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाते रहे, जब वे कुछ आरोपी पादरियों का समर्थन करते दिखाई देते थे.

मौत की सजा और जेल सुधार

फ्रांसिस ने सभी मामलों में मौत की सजा को मानने से इनका कर दिया था. इसकी घोषणा करके चर्च की पिछली रीतियों को तोड़ दिया. उन्होंने पैरोल के बिना आजीवन कारावास को छिपा हुआ मृत्युदंड और एकांत कारावास को यातना करार दिया था और इसकी निंदा की. उन्होंने दोनों प्रथाओं को खत्म करने का आह्वान किया.

मौत की सजा और जेल सुधार

फ्रांसिस ने सभी मामलों में मौत की सजा को मानने से इनका कर दिया था. इसकी घोषणा करके चर्च की पिछली रीतियों को तोड़ दिया. उन्होंने पैरोल के बिना आजीवन कारावास को छिपा हुआ मृत्युदंड और एकांत कारावास को यातना करार दिया था और इसकी निंदा की. उन्होंने दोनों प्रथाओं को खत्म करने का आह्वान किया.

चर्च में महिलाओं को अधिकार

फ्रांसिस ने चर्च की लीडरशिप में महिलाओं की ज्यादा भूमिका का आह्वान किया. उन्होंने कई महिलाओं को सीनियर वेटिकन पदों पर नियुक्त किया और बिशपों की धर्मसभा में महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया.

माइग्रेशन

फ्रांसिस ने प्रवासी अधिकारों को केंद्र में रखा. उन्होंने शरणार्थियों को लेकर वैश्विक उदासीनता की निंदा की और बार-बार देशों से उनका स्वागत करने का आह्वान किया. खासतौर पर यूरोप में. उन्होंने सीमा की दीवारों की आलोचना की और घोषणा की कि उन्हें बनाना ईसाई धर्म के खिलाफ है.

ये भी पढ़ें: पोप फ्रांसिस का उत्तराधिकारी कौन? इन नामों पर हो रही चर्चा, जानें किसकी दावेदारी मजबूत

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