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Explained: सेल्फ रिस्पॉन्स, ऑनलाइन या दस्तक! US, UK और जर्मनी जैसे देशों में कैसे होती जनगणना, भारत में टीचर्स पर आफत क्यों?

World Census Process: भारत में टीचर्स गर्मी और सर्दी में घर-घर भटक रहे हैं, वहीं पश्चिमी देशों में जनगणना बिना इंसानी मशक्कत के पूरा हो रही है. उन्होंने बेहतर टेक्नोलॉजी और कमाल के सिस्टम बना लिए हैं.

सर्दियों में SIR ड्यूटी, गर्मियों में जनगणना और छुट्टियों में भी फील्ड में टीचर्स. यह भारत के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की असली तस्वीर है. स्कूल बंद हो या खुला, उनकी जिम्मेदारी सिर्फ क्लासरूम तक सीमित नहीं रह गई है. वहीं, दूसरी तरफ, दुनिया के विकसित देश अपनी जनगणना इतनी स्मार्ट और सिस्टमैटिक तरीके से कराते हैं कि उन्हें टीचर्स जैसे पेशेवरों को गली-गली घुमाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आइए पहले समझते हैं कि भारत के टीचर्स पर क्या गुजर रही है, फिर जानते हैं दुनिया के दूसरे देशों (खासकर पश्चिम) में जनगणना कैसे कराई जाती है...

सर्दियों में SIR, गर्मियों में जनगणना: टीचर्स पर 'एक्स्ट्रा' बोझ

साल 2025 के नवंबर से दिसंबर के बीच, जब सर्दी शुरू ही हुई, तो चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान चलाया. यह वोटर लिस्ट को अपडेट करने की प्रक्रिया है. करीब 51 करोड़ वोटर्स को कवर करने वाली इस ड्राइव को अंजाम देने के लिए सरकार ने टीचर्स को ही बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) बना दिया. 4 नवंबर से शुरू हुई इस प्रक्रिया में टीचर्स को पूरे एक महीने तक घर-घर जाकर फॉर्म बांटने और जमा करने पड़े. नोएडा में एक हाईलाइट तो यह थी कि 2400 प्राइमरी टीचर्स में से 1500 से ज्यादा SIR ड्यूटी पर चले गए, जिससे करीब 96,000 स्टूडेंट्स की पढ़ाई प्रभावित हुई.

अब जैसे ही गर्मी शुरू हुई तो टीचर्स पर नई आफत आ गई. कर्नाटक में 1 लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल टीचर्स को जनगणना 2027 के काम में लगाया जा रहा है। टीचर्स का कहना है कि उनके पास न तो कोई छुट्टी है और न ही आराम. कई टीचर्स ने 50 साल से ज्यादा उम्र वालों को SIR ड्यूटी से छूट देने की मांग की थी, क्योंकि दूसरे राज्यों में SIR ड्यूटी के दौरान टीचर्स की मौतें भी हो चुकी हैं, लेकिन यह मांग ठुकरा दी गई.

अब आता है असली सवाल: दुनिया के दूसरे देशों में जनगणना कैसे कराई जाती है?

जहां हमारे टीचर्स गर्मी और सर्दी में घर-घर भटक रहे हैं, वहीं पश्चिमी देशों में जनगणना को बिना इंसानी मशक्कत के पूरा करने का जादू दिख रहा है. उनके पास डेटा के लिए टीचर्स जैसा 'बैकअप' नहीं है, इसलिए उन्होंने टेक्नोलॉजी और कमाल के सिस्टम बना लिए हैं.

1. अमेरिका (USA): 'पहले आप खुद बताएं, वरना हम आएंगे'

अमेरिका का सिस्टम काफी मॉडर्न है और उन्होंने सेल्फ-रिस्पांस (खुद जवाब देने) के कॉन्सेप्ट को बड़े स्तर पर लागू किया है. वहां सबसे पहले हर घर को एक लेटर भेजा जाता है जिसमें ऑनलाइन जाकर फॉर्म भरने का ऑप्शन होता है. अगर आप ऑनलाइन नहीं भरते हैं, तब जाकर फील्ड एजेंट्स घर-घर जाते हैं.

एक उदाहरण से समझें: अमेरिका के टेनेसी राज्य में स्थित शहर 'व्हाइट हाउस' में 2025 में स्पेशल सेंसस हुआ. पहले जुलाई से अगस्त के बीच ऑनलाइन रिस्पांस का चरण चला. उसके बाद सितंबर से उन घरों में सेंसस ब्यूरो के फील्ड रेप्रेजेंटेटिव्स दर-दर गए जिन्होंने ऑनलाइन जवाब नहीं दिया था. ये रेप्रेजेंटेटिव्स टीचर्स नहीं होते, बल्कि इसके लिए विशेष तौर पर नियुक्त एजेंसी के स्टाफ होते हैं. इनका टारगेट था कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपने घर बैठे ऑनलाइन फॉर्म भर दें, ताकि डोर-टू-डोर जाने की जरूरत ही कम से कम पड़े.

2. ब्रिटेन (UK): 'डिजिटल-फर्स्ट' और एक्सपर्ट्स की टीम

ब्रिटेन पिछली बार 2021 में 'डिजिटल-फर्स्ट' तरीके से जनगणना करा चुका है. इसका मतलब है कि ज्यादातर लोगों ने अपनी जनगणना ऑनलाइन कंप्लीट की. अगर किसी को पेपर फॉर्म चाहिए था, तो वह रिक्वेस्ट कर सकता था. ब्रिटेन में हर 10 साल में जनगणना होती है. सरकार ने 2031 में होने वाली जनगणना के लिए भी तैयारियां शुरू कर दी हैं. ब्रिटेन इस मामले में इतना एडवांस है कि वे अब जनगणना के लिए ऑनलाइन सिस्टम पर फोकस कर रहे हैं. वहां सरकारी टीचर्स को इसके लिए नहीं लगाया जाता, बल्कि यह काम ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिक्स (ONS) के ट्रेंड प्रोफेशनल्स करते हैं.

3. जर्मनी: 'रजिस्टर बेस्ट सेंसस' का जलवा

जर्मनी सबसे स्मार्ट सिस्टम में से एक है. वे 'रजिस्टर-बेस्ड सेंसस' यानी Registerzensus की तरफ बढ़ रहे हैं. इसका मतलब है कि सरकार के पास पहले से ही हर नागरिक का डेटा मौजूद होता है. वह नौकरी, पता, टैक्स और दूसरी चीजों का डेटा सरकारी रिकॉर्ड्स (जैसे रेजिडेंट रजिस्ट्रेशन, सोशल सिक्योरिटी, एम्प्लॉयमेंट रिकॉर्ड्स) से निकाल लेती है. अब उन्हें हर किसी के घर जाने की जरूरत नहीं पड़ती. सिर्फ उन लोगों को सैंपल के तौर पर चुना जाता है, जिनके रिकॉर्ड्स में क्लैरिटी नहीं है. इसे 'वोह्न्सित्जानालिसे' (Wohnsitzanalyse) कहते हैं, यानी रेजिडेंस एनालिसिस.

जून 2025 में पूरे जर्मनी में करीब 1 लाख लोगों को इस तरह सैंपल के तौर पर पोस्ट/ऑनलाइन में एक छोटा सा 5 मिनट का फॉर्म भरना था. 2022 में जर्मनी ने जनगणना के लिए 'हाइब्रिड' मॉडल अपनाया था, जिसमें मौजूदा रजिस्टर डेटा के साथ-साथ कुछ लोगों का डेटा कलेक्ट किया गया था, लेकिन अब वे पूरी तरह रजिस्टर-बेस्ड सेंसस की तैयारी कर रहे हैं.

4. जापान: आधुनिकता का अलग ही अंदाज

जापान हर 5 साल में जनगणना कराता है. 2025 में उनकी 22वीं जनगणना हुई. यहां पर लोगों को तीन तरीकों से जवाब देने का ऑप्शन दिया जाता है: ऑनलाइन, पोस्ट (डाक से), या इंक्वॉयरेटर को सीधा फॉर्म सौंपकर. उनका भी टारगेट यही होता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग ऑनलाइन रिस्पॉन्स दें ताकि इंक्वॉयरेटर्स को कम से कम परेशानी हो. हालांकि सरकारी स्कूल टीचर्स को तो दूर, जापान ने सेंसस टेकिंग के लिए एक अलग ही सिस्टम बना रखा है.

जापान सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग ऑनलाइन फॉर्म भरें. जो लोग इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर पाते, उनके लिए पुराने तरीके का पेपर फॉर्म मेल से भेजा जाता है. अगर कोई दोनों तरीकों से जवाब नहीं देता, तभी फील्ड इंक्वॉयरेटर उनके दरवाजे पर दस्तक देते हैं. भारत में जहां 70% से ज्यादा काम टीचर्स पर आ जाता है, वहीं जापान जनगणना के काम के लिए प्रोफेशनल एजेंट्स या फील्ड रिप्रेजेंटेटिव्स पर निर्भर करता है.

तो आखिर इतना बड़ा फर्क क्यों?

आप सोच रहे होंगे कि इन देशों में ऐसा क्यों नहीं होता कि टीचर्स की पढ़ाई छूट जाए? इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं:

  1. डेटा की 'बुकिंग' पहले से होती है: पश्चिमी देशों में जन्म से मौत तक हर नागरिक का डेटा कंप्यूटर सिस्टम में दर्ज होता है. उन्हें यह पता लगाने के लिए घर-घर जाने की जरूरत नहीं पड़ती कि शहर में कितने लोग रहते हैं. यह डेटा ऑटोमैटिकली टैक्स, हेल्थ केयर और जन्म-मृत्यु रजिस्टर से मिल जाता है. इसे रजिस्टर-बेस्ड सेंसस कहते हैं. वहां पहले से ही हर नागरिक के लिए 'अकाउंटिंग' चलती रहती है. उदाहरण के लिए, डेनमार्क और नॉर्वे तो पूरी तरह इसी सिस्टम पर चलते हैं, उनके यहां सेंसस के लिए कोई फील्ड वर्क नहीं होता.
  2. टीचर्स को पढ़ाने के लिए रखा जाता है: इन देशों में सरकारी नौकरशाही इतनी मजबूत और खास है कि उनके पास डेटा कलेक्ट करने के लिए स्पेशल स्टाफ मौजूद है. वहां यह कानूनन मान्यता है कि टीचर का काम सिर्फ पढ़ाना है. भारत में RTE एक्ट की धारा 27 में कहा गया है कि टीचर्स को नॉन-एजुकेशनल कामों में नहीं लगाया जाना चाहिए, सिर्फ जनगणना, चुनाव और आपदा राहत जैसे मामलों को छोड़कर.
  3. बजट और ऑपरेशन स्केल: भारत के पास इतनी बड़ी आबादी है और देश की कंडीशंस इतनी वैराइड हैं कि डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह लागू करना भी एक चुनौती है. गूगल या इंटरनेट की पहुंच जहां मुश्किल है, वहां अब भी घर-घर जाना पड़ता है.

भारत में पहली बार 'डिजिटल' जनगणना, लेकिन फिर भी टीचर्स पर निर्भरता

यहां सबसे बड़ा अपडेट यह है कि भारत 2027 में अपनी पहली डिजिटल जनगणना (Census 2027) कराने जा रहा है. 2011 के बाद यह पहली बार जनगणना होगी. सरकार ने एक कैबिनेट मीटिंग में इसपर करीब 11,718 करोड़ रुपए खर्च करने की मंजूरी दे दी है. इसमें डेटा कलेक्शन मोबाइल ऐप्स के जरिए किया जाएगा और लोगों के पास ऑनलाइन भी जानकारी भरने का ऑप्शन होगा. इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट भी हो चुके हैं.

यह डिजिटल जनगणना भी टीचर्स को पूरी तरह राहत नहीं दे पाएगी क्योंकि इन्वेंटराइजेशन और डेटा कलेक्शन के काम में अब भी 34 लाख से ज्यादा इनक्वॉयरेटर्स लगाए जाने हैं, जिनमें सरकारी स्कूल टीचर्स भी शामिल हैं. तो भले ही कागज के बजाय फोन या टैबलेट आ गया है, लेकिन काम करने वाला टीचर ही है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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