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Explained: सूद समेत 12 बिलियन डॉलर लौटाएंगे ट्रंप! US टैरिफ के मुआवजे में भारत को कब और कैसे मिलेगा रिफंड?

Trump Tariffs Refund: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद टैरिफ का रिफंड शुरू हो गया है. यानी जिन देशों ने ट्रंप के टैरिफ में पेनाल्टी दी थी, उन्हें ब्याज समेत पैसा वापिस मिलेगा.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल 2025 को दुनिया भर के सभी देशों पर टैरिफ लगाने का ऐलान किया था. पहले 10% फिर 15%, 25%, 50%, 100% और 150% तक टैरिफ बढ़ाया. भारत को भी इस टैरिफ की सजा मिली. इस टैरिफ से करीब 166 बिलियन डॉलर यानी 15 लाख करोड़ रुपए कमाए, लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने पूरा खेल पलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को बेबुनियाद बताते हुए सूद समेत पैसा वापिस करने का आदेश दिया. तो क्या अब ट्रंप को ज्यादा पैसे वापिस करने पड़ेंगे और भारत को अपना हिस्सा मिलेगा या नहीं? जानेंगे एक्सप्लेनर में...

सवाल 1: किस मजबूरी में डोनाल्ड ट्रंप पैसा वापिस लौटा रहे हैं?

जवाब: अमेरिका में ट्रंप सरकार ने व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल बताकर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगा दिए थे, लेकिन अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को 6-3 के फैसले में इन टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया. अदालत ने कहा कि सरकार ने 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियों वाले कानून का गलत इस्तेमाल किया और संसद की ताकत में दखल दिया. इससे पूरा टैरिफ सिस्टम रद्द हो गया.

अब अमेरिका की सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा विभाग ने 20 अप्रैल 2026 से वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी है. कुल मिलाकर करीब 166 अरब डॉलर यानी लगभग 14 लाख करोड़ रुपये वापस होने हैं. यह पैसा 3 लाख 30 हजार से ज्यादा इम्पोर्टर्स ने 5 करोड़ 30 लाख से ज्यादा शिपमेंट पर भरा था. इसमें ब्याज भी जुड़ेगा. शुरुआती चरण में 127 अरब डॉलर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से वापस करने के लिए तैयार हैं.

 

डोनाल्ड ट्रंप ने 22 अप्रैल 2025 को टैरिफ का ऐलान किया था
डोनाल्ड ट्रंप ने 22 अप्रैल 2025 को टैरिफ का ऐलान किया था

सवाल 2: यह वापसी का पैसा किन लोगों या कंपनियों को मिलेगा?

जवाब: वापसी का पैसा किसी खास देश की सूची के आधार पर नहीं बंटेगा. यह पैसा सिर्फ उन अमेरिकी इम्पोर्टर्स को मिलेगा जो सीधे सरकार को टैरिफ का भुगतान कर चुके थे. ये आयातकर्ता दुनिया के किसी भी देश से सामान मंगवा सकते थे. कुल 166 अरब डॉलर में से करीब 12 अरब डॉलर भारत से आए सामान पर लगे टैरिफ से जुड़े हैं, लेकिन यह पैसा सीधे भारतीय एक्सपोर्टर्स को नहीं जाएगा. यह अमेरिकी इम्पोर्टर्स के खाते में ही आएगा. कोई विदेशी कंपनी या निर्यातकर्ता खुद दावा नहीं कर सकता.

सवाल 3: पेमेंट की पूरी प्रोसेस क्या है और इसमें कितना समय लगेगा?

जवाब: रिफंड की प्रोसेस पूरी तरह डिजिटल और साफ है. अमेरिका की सीमा शुल्क विभाग ने एक नया सिस्टम बनाया है जिसे एकीकृत प्रविष्टि प्रशासन और प्रसंस्करण प्रणाली कहा जाता है. यह पुराने ऑटोमेटेड कमर्शियल एनवायरनमेंट प्लेटफॉर्म में जुड़ा हुआ है.

  • सबसे पहले अमेरिकी इम्पोर्टर्स या उनके कस्टम ब्रोकर को विभाग के इलेक्ट्रॉनिक भुगतान सिस्टम में नाम दर्ज कराना जरूरी है. फिर नए पोर्टल पर दावा करना होगा. इसमें शिपमेंट की पूरी डिटेल, टैरिफ की कैटेगरी, पेमेंट सर्टिफिकेट और एंट्री नंबर सब देना पड़ता है. दावा मंजूर होने के बाद 60 से 90 दिनों में पैसा ब्याज समेत बैंक खाते में आ जाता है.
  • यह प्रोसेस स्टेप बाय स्टेप होगी. पहले चरण में सिर्फ हाल के या जिनकी गणना 80 दिन के अंदर हो चुकी है, वे शामिल हैं. पुराने भुगतान बाद के चरण में आएंगे.
  • पूरा काम कई महीनों या सालों तक चल सकता है क्योंकि 3 लाख 30 हजार इम्पोर्टर्स और करोड़ों दस्तावेज हैं. अगर दावे में कोई गलती हुई या नियमों में कमी आई तो समय और बढ़ सकता है.

सवाल 4: क्या पूरा पैसा वापस मिलेगा या कुछ कटौती होगी?

जवाब: हां, पूरा पैसा मूल टैरिफ की रकम के साथ ब्याज समेत वापस मिलेगा. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि गलत तरीके से वसूला गया टैक्स पूरी तरह लौटाना है. कोई कटौती नहीं होगी, लेकिन यह सिर्फ उन इम्पोर्टर्स को मिलेगा जिन्होंने खुद भुगतान किया था. आम उपभोक्ताओं या छोटे दुकानदारों को सीधे कुछ नहीं मिलेगा. हालांकि फेडएक्स जैसी कुछ बड़ी कंपनियां अपनी नीति के तहत ग्राहकों को कुछ हिस्सा दे सकती हैं, लेकिन यह कानूनी रूप से जरूरी नहीं है.

सवाल 5: भारत को अपने हिस्से का पैसा कब और कैसे वापिस मिलेगा?

जवाब: भारत इस प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन सिर्फ इसलिए कि 12 अरब डॉलर का हिस्सा भारत से आए सामान पर लगे टैरिफ से जुड़ा है. फिर भी भारतीय एक्सपोर्टर्स को एक पैसा भी सीधा नहीं मिलेगा. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि भुगतान सिर्फ अमेरिकी इम्पोर्टर्स को जाता है और एक्सपोर्टर्स को कानूनी रूप से कोई अधिकार नहीं है. इसलिए भारतीय कंपनियां सिर्फ व्यापारिक बातचीत से फायदा ले सकती हैं. जैसे पुराने अनुबंध दोबारा खोलकर, छूट बांटने की शर्त जोड़कर, कीमत बढ़ाने या क्रेडिट नोट मांगकर.

 

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जिन एक्सपोर्टर्स की सौदेबाजी की ताकत मजबूत है, खासकर टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग सामान वाले, उन्हें आने वाले ऑर्डर में बेहतर शर्तें मिल सकती हैं. अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल और केमेक्सिल जैसी संस्थाएं निर्यातकर्ताओं को गाइडेंस दे रही हैं.

भारतीय एक्सपोर्टर्स को तुरंत अपने अमेरिकी खरीदारों से संपर्क करना चाहिए और इनवॉइस और टैरिफ के आंकड़े दिखाकर हिस्सा बांटने की बात करनी चाहिए. जिन क्षेत्रों में सौदेबाजी की ताकत मजबूत है, उन्हें फायदा हो सकता है, लेकिन कमजोर वाली कंपनियों को शायद कुछ नहीं. कुल मिलाकर यह भारतीय निर्यातकर्ताओं के लिए सीधा नकद नहीं, बल्कि बातचीत का मौका है.

अगर बातचीत अच्छी रही तो आने वाले ऑर्डर सस्ते हो सकते हैं और मुनाफा बढ़ सकता है. लेकिन अगर अमेरिकी आयातकर्ता पूरा पैसा अपनी जेब में रख लें तो भारतीय कंपनियों को कोई राहत नहीं मिलेगी. प्रक्रिया अभी शुरू हुई है, इसलिए हर हफ्ते नई खबरें आ सकती हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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