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अयोध्या मामला: SC ने शुरू की निर्णायक सुनवाई, पहले दिन निर्मोही अखाड़े ने रखा अपना पक्ष

2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला दिया था. दो तिहाई हिस्सा हिन्दू पक्ष को मिला था और एक तिहाई सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को. लेकिन कोई भी पक्ष इस फैसले से संतुष्ट नहीं हुआ. सबने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की.

नई दिल्ली: अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में आज से विस्तृत सुनवाई शुरू हुई. पहले दिन निर्मोही अखाड़े की तरफ से पक्ष रखा गया. निर्मोही अखाड़े ने मंदिर ऐतिहासिक रूप से अपने पास होने का दावा किया. कहा कि पूरी विवादित ज़मीन उसे सौंप दी जानी चाहिए. 5 जजों की बेंच ने अखाड़े के वकील से कुछ उलझाने वाले सवाल भी किए.

कैसे हुई शुरुआत

सुबह करीब 10.34 पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की बेंच बैठी. शुरू में ही एक वकील ने सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग या वीडियो रिकॉर्डिंग का मसला उठाया. लेकिन चीफ जस्टिस ने कहा कि बेंच हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई के लिए बैठी है. इस तरह के प्रशासनिक सवाल पर अभी विचार नहीं होगा.

पिछले हफ्ते कोर्ट ने पहले निर्मोही अखाड़ा और फिर रामलला विराजमान की अपीलों पर सुनवाई की बात कही थी. लेकिन निर्मोही अखाड़ा के वकील सुशील जैन ने रामलला की तरफ से कोर्ट में वरिष्ठ वकील के परासरन के मौजूद होने की बात कही. उन्होंने पूछा कि क्या कोर्ट पहले परासरन की सुनना चाहेगा. चीफ जस्टिस ने कहा कि हम कह चुके हैं कि पहले आपकी अपील पर सुनवाई होगी. आप अपनी बात रखें. इसके बाद जैन ने दलीलें रखनी शुरू कर दी.

पूरी ज़मीन पर दावा

सुशील जैन ने कहा- विवादित परिसर के 2 हिस्से हैं. बाहरी हिस्से पर हमारा कब्ज़ा था. उसमें सीता रसोई, भंडारगृह, चबूतरा आदि थे. इसे लेकर 1961 तक कोई विवाद नहीं था. असली विवाद अंदर के हिस्से का है. 1950 में गोपाल सिंह विशारद का पहला केस भी अंदर पूजा करने का अधिकार मांगने के लिए था. क्योंकि वही वो जगह है जिसे भगवान राम का वास्तविक जन्मस्थान माना जाता है. ये जगह भी मस्ज़िद बनने से पहले निर्मोही अखाड़े के नियंत्रण में ही थी.

अखाड़े के वकील ने आगे कहा, "मंदिर तोड़ कर बने इस मस्ज़िद को पुराने रिकॉर्ड में मस्ज़िद ए जन्मस्थान लिखा जाता रहा है. मस्ज़िद बनने के बाद भी इसके बाहर के हिस्से में निर्मोही साधु पूजा करवाते रहे. हिन्दू बड़ी संख्या में पूजा करने और प्रसाद चढ़ाने आया करते थे. निर्मोही अखाड़े के संचालन में ऐसे कई पुराने मंदिर हैं. झांसी की रानी ने भी हमारे ही एक मंदिर में साधुओं की सुरक्षा के बीच प्राण त्यागे थे."

जैन ने कोर्ट से कहा कि उसके ऐतिहासिक दावे को स्वीकार किया जाना चाहिए. कोर्ट की तरफ से तय रिसीवर यानी फैज़ाबाद के डीएम को हटा कर विवादित जगह का नियंत्रण उसे दिया जाना चाहिए.

सुन्नी बोर्ड और रामलला के दावे को गलत कहा

निर्मोही अखाड़े ने ज़मीन के दो और दावेदारों की अपील को गलत बताया. उसकी तरफ से दलील दी गई कि मुसलमानों ने 1934 में वहां 5 वक्त की नमाज बंद कर दी थी. हर शुक्रवार सिर्फ जुमे की नमाज होती रही. इसे भी 16 दिसंबर 1949 के बाद से ये भी बंद हो गई. विवादित स्थान पर वुज़ू (नमाज से पहले हाथ, पैर आदि धोने) की जगह मौजूद नहीं है. साफ है कि वो इमारत मस्ज़िद नहीं थी.

रामलला के दावे को भी खारिज करने की मांग करते हुए निर्मोही अखाड़े ने दलील दी, "देवता को कानूनन नाबालिग माना जाता है. इसे आधार बना कर एक पूर्व जज ने उनकी तरफ से 1989 में याचिका कर दी. इस दलील को मान भी लें तो भी विवादित जगह पर हमारा ही हक है. हम ही वहां पूजा करते थे. यानी देवता की तरफ से याचिका डालने का हक हमारा है."

कोर्ट के सवाल

कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े से मुख्य रूप से 2 सवाल किए.

1. कोर्ट ने पूछा कि 1949 में विवादित स्थान पर मूर्तियां रखे जाने के 10 साल बाद आपकी याचिका दाखिल होने के चलते हाई कोर्ट उसे खारिज कर चुका है. फिर हम आपकी बात क्यों सुनें?

2. आपने ज़मीन के मालिकना हक का दावा नहीं किया था. सिर्फ मंदिर के प्रबंधन की बात कही थी. आपको ज़मीन पर हक कैसे दिया जा सकता है?

सुशील जैन ने दोनों सवालों पर कोर्ट को संतुष्ट करने की कोशिश की. उन्होंने कहा, "जगह को 1955 में सरकार ने कब्ज़े में लिया. ऐसे में 1959 में दाखिल याचिका को समय सीमा के परे नहीं माना जा सकता. जब हम जगह पर पहले कब्ज़ा होने की बात कर रहे हैं. फिर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं तो इसे मालिकाना हक का दावा ही माना जाना चाहिए."

मुस्लिम पक्ष के वकील को फटकार

जिरह के बीच में बोल पड़े मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन के चीफ जस्टिस ने झिड़का. धवन का कहना कि निर्मोही के वकील उनके दावे को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं. चीफ जस्टिस ने उन्हें फटकारते हुए कहा, "आपको पूरा मौका दिया जाएगा. क्या आपको लगता है कि हम आपकी बात नहीं सुनेंगे?" धवन ने कहा, "उम्मीद है मुझे पर्याप्त समय दिया जाएगा." कोर्ट ने कहा, "एक वरिष्ठ वकील का इस तरह का बर्ताव सही नहीं है."

समय सीमा तय नहीं की

माना जा रहा था कि कोर्ट सुनवाई की शुरुआत में सभी पक्ष के वकीलों के जिरह की समय सीमा तय करेगा. कोर्ट ने ऐसा तो नहीं किया, लेकिन सुनवाई के दौरान निर्मोही के वकील पूछा, "आप अभी अपीलकर्ता की हैसियत से जो बोल रहे हैं, वही बातें दूसरों की अपीलों पर अपना जवाब देने के दौरान भी कहेंगे?" वकील ने इसका जवाब हां कह कर दिया. इसके बाद सुनवाई आगे बढ़ गई.

मामले से जुड़े वकील इसे साफ इशारे के तौर पर देख रहे हैं कि कोर्ट दलीलों का दोहराव नहीं चाहता. उसकी मंशा एक समय सीमा में मामले का निपटारा करने की है. कल भी निर्मोही अखाड़े की दलीलें जारी रहेंगी.

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