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काशी को स्वर्ग तो मगहर को नर्क का द्वार समझते थे लोग, कबीर ने तोड़ा था अंधविश्वास

एक बात मगहर को बहुत खास बनाती है, वो ये कि यहां पर कबीर की मजार और समाधि अगल-बगल में है. हिंदू कबीर को अपने धर्म का मानते थे तो मुसलमान उन्हें अपने धर्म का समझते थे. कबीर के धर्म, जाति का कोई प्रमाण नहीं होने की वजह से दोनों ही अपने-अपने तरीके से उन्हें याद करते हैं.

लखनऊ:  काशी की तरह मगहर का भी नाम इतिहास में दर्ज है. काशी को लोग स्वर्ग का तो मगहर को नर्क का द्वार समझते थे. लोगों के मन में ये बात थी कि कि मगहर में मरने वाला नर्क में जाता है. उसका अगला जन्म किसी जानवर के रूप में होता है. ये बातें कहां से आई, किसने कहीं इसका पता नहीं था. लंबे समय से ये बस लोगों के बीच चली जा रही थीं. लोगों के बीच फैले इसी अंधविश्वास को ताड़ने के लिए कबीरदास मगहर आए थे. उन्होंने अपने जीवन का आधा से अधिक समय काशी में गुजारा पर आखिरी समय में वे मगहर आ गए.

मगहर को लेकर कही जाती थीं ये बातें

मगहर को लेकर कई तरह की बातें की जाती हैं. कोई कहता है कि ये बौद्द भिक्षुओं का मार्ग हुआ करता था, तो कोई कहता है कि आस-पास नदी और जंगल के नाते यहां लूट-पाट की घटनाएं होती थीं इसलिए इसका नाम मगहर पड़ा. मगहर का इतिहास चाहें जो भी रहा हो, पर इसे सही मायने में पहचान कबीर दास ने दी.

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अगल-बगल में है  कबीर की मजार और समाधि

जो एक बात मगहर को बहुत खास बनाती है, वो ये कि यहां पर कबीर की मजार और समाधि अगल-बगल में है. हिंदू कबीर को अपने धर्म का मानते थे तो मुसलमान उन्हें अपने धर्म का समझते थे. कबीर के धर्म, जाति का कोई प्रमाण नहीं होने की वजह से दोनों ही अपने-अपने तरीके से उन्हें याद करते हैं.

कबीर एक ईश्वर को मानते थे

कबीर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की रुढ़ियों के घोर आलोचक थे. कबीर लिखते हैं,"कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय. ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय." कबीर एक ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे.

अवतार, मूर्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे. कबीर की कोई पारंपरिक रुप से पढ़ाई लिखाई नहीं हुई थी. कबीर कहते हैं, "मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ." कबीर ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा है. उन्होंने बस मुंह से शब्दों को बोला और उनके शिष्यों ने उनके ग्रंथ लिखे.

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अंतिम संस्कार पर हुआ था मतभेद

कबीर दास की मृत्यु को लेकर भी एक अनोखा तथ्य सामने आता है. कहा जाता है कि कबीर ने जब अपना शरीर त्यागा तो हिंदू-सुस्लिम दोनों कौम के लोग इस बात पर लड़ने लगे कि उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा. हिंदू उनका दाह संस्कार करना चाहते थे, तो मुस्लिम उन्हें दफनाना चाहते थे. दोनों कौम एक दूसरे से बहस ही कर रही थी कि कबीरदास के शव पर डाली गई चादर खिसक गई. चादर खिसकने पर लोगों ने देखा कि वहां सिर्फ फूल बचे थे. उनका शरीर वहां से कहां गया किसी को नहीं पता.

 बता दें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज कबीर दास की 500वीं पुण्यतिथि के मौके पर उत्तर प्रदेश (यूपी) के संतकबीर नगर जिले के मगहर में कवि कबीरदास की मजार पर पुष्पांजलि अर्पित की और चादर चढ़ाई. इसके बाद उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कबीर को आज के संदर्भ में जोड़ते हुए कहा कि हम सभी को उनसे सीखना चाहिए. इस दौरान पीएम मोदी ने कबीर के दोहे भी पढ़ें.

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