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अयोध्या मसले से जुड़े एक अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कल, तय होगा जल्द सुनवाई हो सकेगी या नहीं
30 सितंबर 2010 को इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया था. हाई कोर्ट ने विवादित ज़मीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बांटने का आदेश दिया था. इसके खिलाफ सभी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

नई दिल्ली: अयोध्या विवाद से जुड़े एक अहम मसले पर सुप्रीम कोर्ट कल आदेश देगा. दोपहर 2 बजे कोर्ट ये तय करेगा कि इस्लाम में मस्ज़िद की अनिवार्यता का सवाल संविधान पीठ को सौंपा जाए या नहीं. अगर कोर्ट इस सवाल को संविधान पीठ को सौंपने को तैयार हो जाता है तो मुख्य अयोध्या विवाद की सुनवाई टल सकती है. क्या है मस्ज़िद की अनिवार्यता का सवाल दरअसल, 1994 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा था कि मस्ज़िद इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है. इस्माइल फारुखी बनाम भारत सरकार मामले में अयोध्या में विवादित ज़मीन के सरकारी अधिग्रहण को चुनौती दी गई थी. कहा गया था कि मस्ज़िद की जगह को सरकार नहीं ले सकती. कोर्ट ने अधिग्रहण को कानूनन वैध ठहराया. साथ ही कहा कि नमाज तो इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इसके लिए मस्ज़िद अनिवार्य नहीं है. मुस्लिम पक्ष की दलील है कि ये फैसला उसके दावे को कमज़ोर कर सकता है. इसलिए सबसे पहले इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए. 8 साल से लंबित है मामला 30 सितंबर 2010 को इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया था. हाई कोर्ट ने विवादित ज़मीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बांटने का आदेश दिया था. इसके खिलाफ सभी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. पिछले साल अगस्त में कोर्ट ने सभी पक्षों को मामले से जुड़े दस्तावेजों के अनुवाद और दूसरी औपचारिकताएं पूरी करने को कहा था. दिसंबर में कोर्ट ने जल्द सुनवाई का संकेत देते हुए कहा था कि सभी पक्ष अनुवाद किए गए 19,950 पन्नों का आपस मे लेन देन कर लें. लेकिन मार्च में मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने इस्माइल फारुखी मामले को उठा दिया. उन्होंने कहा कि सबसे पहले इस्लाम मे मस्ज़िद की अनिवार्यता पर फैसला हो. इसके लिए 5 या 7 जजों की संविधान पीठ बनाई जाए.
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Source: IOCL
























