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In Depth: यूपी में मोदी लहर का राजस्थानी कनेक्शन

लखनऊ: चौदह साल के बनवास के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सत्ता में वापसी हुई है. वो भी प्रचंड बहुमत से. अखिलेश यादव और मायावती ईवीएम में 'सेटिंग' ढूंढ रहे है. और बीजेपी के नेता हैरान परेशान है, मोदी नाम की ये कैसी आंधी चल पडी है ? यूपी में मोदी के नाम पर चली इस आंधी का राजस्थान से गहरा नाता है. आप सोच रहे होंगे छप्पड़फाड़ वोट यूपी में बीजेपी को मिले तो फिर राजस्थान से क्या लेना देना! इन्ही वोटों को पार्टी के लिए मैनेज करने में दो नेताओं का बड़ा रोल रहा. दोनों ही राजस्थान के रहने वाले है.

''बंसल को पार्टी का आम कार्यकर्ता भी नहीं पहचानता''

एक को लोग अमित शाह का पीके कहते हैं. तो दूसरे को बीजेपी के लिए शगुनी मानते हैं. पहले वाले नेता हैं यूपी में बीजेपी के मंत्री सुनील बंसल और दूसरे नेता है बीजेपी के राज्य प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर. माथुर को तो आपने कई बार टीवी पर देखा होगा. कभी पीएम नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर हाथ हिलाते हुए तो अमित शाह के संग बैठकों में. लेकिन बंसल को तो पार्टी का आम कार्यकर्ता भी नहीं पहचानता है. बीजेपी के हज़ारों समर्थकों ने फोन पर उनकी आवाज जरूर सुनी है. पार्टी के अंदर बंसल को यूपी चुनाव में शानदार जीत का चाणक्य कहा जा रहा है.

क्या है यूपी में बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल का राजस्थान कनेक्शन ?

यूपी में बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल का राजस्थान कनेक्शन क्या है ? 47 साल के बंसल का जन्म कोटपुतली गाँव में हुआ था. जो जयपुर के पास है. यहां के लाल बहादुर शास्त्री राजकीय कॉलेज से वे छात्र संघ के सचिव का चुनाव लड़े और जीत भी गए. ये बात 1988 की है. उन दिनों वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में थे. जो आरएसएस का छात्र संगठन है. संघ के प्रचारक होने के नाते लगातार आगे बढ़ते रहे. गुजरमल बंसल के सबसे छोटे बेटे सुनील ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. पहले उन्होंने जयपुर में ABVP के संगठन का काम देखा और फिर उदयपुर में. 2002 में बंसल विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय मंत्री बन गए. वे जयपुर से अब दिल्ली आ गए. तीन सालों बाद उन्हें दिल्ली और राजस्थान में ABVP को मजबूत करने का काम मिल गया.

लखनऊ में पार्टी के वाररूम के कर्ता-धर्ता बन गए सुनील बंसल

साल 2010 में वे विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री बना दिए गए. 10 जनवरी 2014 को संघ ने उन्हें बीजेपी भेज दिया. और फिर अमित शाह उन्हें लखनऊ ले आये. उन दिनों लोक सभा चुनाव की तैयरियां चल रही थी. बीजेपी के यूपी प्रभारी अमित शाह को जरुरत एक भरोसेमंद साथी की थी. जिसका यूपी में पार्टी की गुटबाजी से कोई लेनादेना नहीं हो. सुनील बंसल लखनऊ में पार्टी के वाररूम के कर्ता-धर्ता बन गए. तब उन्हें कोई पद भी नहीं मिला था. राकेश जैन यूपी के संगठन मंत्री हुआ करते थे.

संगठन मंत्री ही होता है राज्य में पार्टी का सबसे ताकतवर नेता

लखनऊ में बीजेपी ऑफिस के एक कमरे में रह कर सुनील बंसल ने अमित शाह के एजेंडे पर काम शुरू किया. पार्टी के मठाधीशों ने शुरुआत में उन्हें 'बच्चा' समझा. कोई उनकी बात ही नहीं सुनता था. लेकिन एक बार जब अमित शाह ने लखनऊ में पार्टी दफ्तर में नेताओं की इसी बात पर क्लास लगाई तो सब राईट टाईम हो गए. फिर अमित शाह और सुनील बंसल की जोड़ी ने लोक सभा चुनाव में कमाल ही कर दिया. 80 में से बीजेपी को 71 सीटें और सहयोगी पार्टी अपना दल के दो सांसद चुने गए. इस बंपर जीत का ईनाम दोनों को मिला. अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो सुनील बंसल यूपी में पार्टी के संगठन मंत्री. आपको बता दें कि बीजेपी में संगठन मंत्री ही किसी भी राज्य में पार्टी का सबसे ताकतवर नेता होता है.

तारक मेहता का उलटा चश्मा जैसे कॉमेडी सीरियल मिस नहीं करते बंसल

लोक सभा चुनाव जीतने के बाद सुनील बंसल यूपी विधान सभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए. सबसे पहले उन्होंने लखनऊ में पार्टी ऑफिस को कॉरपरेट लुक दिया. पार्टी ऑफिस की नयी बिल्डिंग में लायब्रेरी, डायनिंग हॉल से लेकर प्रेस कांफ्रेंस रूम तक बनाया गया है. चार ऐसे कमरे बने जहाँ बड़े नेता ठहर. अमित शाह जब भी लखनऊ में होते है, इन्ही में से एक कमरे में रूकते है. बिल्डिंग की पहली मंजिल पर सुनील बंसल खुद रहते है. सवेरे 5 बजे उठ जाना और देर रात तक बैठकों का दौर. लेकिन तारक मेहता का उलटा चश्मा और भाभीजी घर पर हैं जैसे कॉमेडी सीरियल बंसल मिस नहीं करते है. वे जब भी टेंशन में होते हैं शर्मा की चाय मंगा लेते है.

अब ज़रा जान ले राजस्थान कनेक्शन वाले बीजेपी के लकी रणनीतिकार ओमप्रकाश माथुर के बारे में. राजस्थान के पाली ज़िले के ओम को अब यूपी का हर बीजेपी कार्यकर्ता जानता है. वे जहाँ भी पार्टी के प्रभारी बन कर गए, जीत बीजेपी को ही नसीब हुई. जब वे मध्य प्रदेश के प्रभारी बने तो कॉग्रेस को हरा कर बीजेपी सत्ता में आ गयी. उमा भारती सीएम बनी. फिर ओम माथुर गुजरात के प्रभारी बना दिए गए. जीत का रिकार्ड बना रहा.

शिवसेना से चुनावी तालमेल ना करने का माथुर का ही था आइडिया

बीजेपी जीती और नरेंद्र मोदी सीएम बने रहे. इसी बीच उनका प्रमोशन कर उन्हें मंत्री से बीजेपी का राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया गया. वे मोदी के करीब होते गए. ओम माथुर नौ सालों तक बीजेपी के गुजरात प्रभारी रहे. बीच में कुछ महीनों के लिए वे राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष भी बने. सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया से उनकी कभी बनी नहीं. जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो फिर बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन बने पर चर्चा तेज हुई. दो ही नाम रेस में थे. अमित शाह और ओम माथुर. अमित शाह के नाम पर मुहर लगी. इसी बीच महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव का एलान हो गया. मोदी ने अपने लकी माथुर को वहाँ भेज दिया. शिवसेना के बिना बीजेपी अकेले ही चुनाव लड़ी और जीत गयी. कहते है शिवसेना से चुनावी तालमेल ना करने का आयडिया माथुर का ही था.

माथुर और बंसल का ज्वॉइंट सर्जिकल स्ट्राईक

माथुर की जीत का सिलसिला जारी रहा. अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए यूपी का विधान सभा चुनाव सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा थी. सुनील बंसल पहले से ही यूपी के संगठन मंत्री थे.  बीजेपी उपाध्यक्ष ओम माथुर को प्रदेश प्रभारी बना कर लखनऊ भेज दिया गया. माथुर ने शहर में ही एक मकान किराए पर ले लिया. और फिर शुरू हुआ माथुर और बंसल का जॉइंट सर्जिकल स्ट्राईक. एक साथ दो मोर्चों पर काम शुरू हुआ. दूसरी पार्टियों से मजबूत नेताओं को तोड़ कर पार्टी में लाया गया. और साथ ही साथ बीजेपी को बूथ स्तर तक मजबूत किया गया.

कांशीराम को दीक्षा देने वाले की अगुवाई में धम्म यात्रा

मायावती और अखिलेश यादव से मुकाबले सवर्ण, गैर जाटव और गैर यादव पिछड़ी जातियों के समीकरण पर ऑपरेशन शुरू हुआ. केशव मौर्या को यूपी बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया. तो वहीं स्वामी प्रसाद मौर्या को बीएसपी से तोड़ कर माथुर ने मायावती के कैम्प में हड़कंप मचा दिया. फिर तो बीजेपी का झंडा थामने के लिए दूसरी पार्टियों के नेताओं में होड़ मच गयी. फिर साल भर चला बीजेपी का किस्म किस्म का अभियान. हर समाज और बिरादरी तक पहुँचने के लिए पार्टी ने नए नए प्रयोग किये. दलितों को जोड़ने के लिए बीएसपी के संस्थापक कांशीराम को दीक्षा देने वाले की अगुवाई में धम्म यात्रा निकाली गयी. राजनाथ सिंह ने इसे शुरू किया और जहाँ ये यात्रा ख़त्म हुई, अमित शाह वहां मौजूद थे.

ताबड़तोड़ प्रचार और बूथ मैनेजमेंट के बूते मोदी लहर ने छोड़ दिया मंदिर लहर को भी पीछे

नौजवानों और महिलाओं के लिए बीजेपी ने अलग अलग सम्मलेन किये. पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने के लिए 400 विधानसभा सीटों पर 200 बैठकें हुई. सहारनपुर, झांसी, बलिया और सोनभद्र से 4 परिवर्तन यात्रा शुरू हुई. जिसने 75 ज़िलों की सभी 403 विधान सभा क्षेत्रों को कवर किया. जगह जगह कमल मेला आयोजित किया गया. मोटर सायकिल सवार 1649 पार्टी कार्यकर्ताओं ने 76 हज़ार गाँव में जाकर बीजेपी का प्रचार किया. 1603 कॉलेजों में पार्टी ने नौजवानों से संवाद के लिए सम्मलेन किये. टाऊन हॉल कार्यक्रम के बहाने खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने हज़ारों लोगों के सवालों के जवाब दिए. ताबड़तोड़ प्रचार और बूथ मैनेजमेंट के बूते यूपी में मोदीलहर ने मंदिरलहर को भी पीछे छोड़ दिया.

खबर तो ये भी है कि यूपी में बीजेपी के लिए चमत्कार करने वाले दोनों राजस्थानी नेताओं के लिए पार्टी ने कुछ 'बड़ा' सोच रखा है. अब जब जीत इतनी बड़ी है तो फिर सुनील बंसल और ओम माथुर के लिए तोहफा भी 'बड़ा' ही होगा.

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