राजनीतिक सवालों से परेशान हुए उपेंद्र कुशवाहा, पत्रकारों से कहा- कहिए तो आपके पांव पकड़ लूं
उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, ''आज के दिन पूरे बिहार में पार्टी की ओर से सभी जिला मुख्यालयों पर 'शिक्षा सुधार, शिक्षक सत्कार' का कार्यक्रम आयोजित है. इस कार्यक्रम के माध्यम से समाज में यह मैसेज देना चाहते हैं कि शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव आदर का भाव बनाकर रखना जरूरी है.''

पटना: आज गुरू पूर्णिमा के एकदिवसीय उपवास में भाग लेने पहुंचे आरएलएसपी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा पर पत्रकारों ने सवालों की बौछार कर दी और वे उससे बचते दिखे. उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा कि आज के दिन यहां शिक्षकों के आदर लिए शिक्षको से संबंधित सवाल ही पूछें. लेकिन ऐसा न होते देख कुशवाहा ने पत्रकारों से कहा कि हम यहां राजनीति करने नहीं आए हैं. कहिये तो मैं आपके हाथ जोड़ लूं या पैर पकड़ लूं. गौरतलब है कि हाल ही में कुशवाहा ने कहा था कि अब नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का पद छोड़ देना चाहिए और दूसरों को भी मौका देना चाहिए. उनके इसी बयान को लेकर सवाल किए जा रहे थे.
उपेंद्र कुशवाहा ने कहा, ''आज के दिन पूरे बिहार में पार्टी की ओर से सभी जिला मुख्यालयों पर 'शिक्षा सुधार, शिक्षक सत्कार' का कार्यक्रम आयोजित है. इस कार्यक्रम के माध्यम से समाज में यह मैसेज देना चाहते हैं कि शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव बनाकर रखना जरूरी है. जबतक शिक्षकों के प्रति समाज में आदर और सम्मान का भाव नहीं होगा तबतक शिक्षा का स्तर ऊंचा नहीं उठ सकता.''
आरएलएसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने 'शिक्षा सुधार, शिक्षक सत्कार' कार्यक्रम के तहत दस गुरुओं को सम्मानित किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि गुरू पुर्णिमा के अवसर पर मैं समस्त देशवासियों का अभिनंदन करता हूं. आज के दिन गुरुओं को याद करने का दिन है. आज का दिन इसलिए विशेष है क्योंकि आज पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि भी है. हमारे देश में गुरुओं को सबसे ज्यादा सम्मान दिया जाता है. बिहार का नाम शिक्षा के गौरवशाली रहा है लेकिन आज देखने से लगता है कि वो परंपरा दिन प्रति दिन खत्म होती जा रही है.
कुशवाहा ने कहा, ''गांधी मैदान के कार्यक्रम में हमने शिक्षा के प्रति सुधार का संकल्प लिया था. शिक्षा राजनीति का विषय नहीं राष्ट्रनीति का विषय है. इसको दलीय भावना से अलग उठकर सोचना चाहिए. मैं आग्रह करता हूं कि शिक्षक को रसोइया, ठेकदार आदि नहीं बनाया जाए बल्कि शिक्षक को शिक्षक ही रहने दें. शिक्षको के प्रति नारा हे कि 'जब तक शिक्षक भूखा है, ज्ञान का मंदिर सुखा है'.''
Source: IOCL

























