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अगर महागठबंधन में शामिल हुए उपेंद्र कुशवाहा तो कितनी बदलेगी बिहार की सियासी तस्वीर?

उपेंद्र कुशवाहा ने कभी लालू यादव के नेतृत्व में राजनीति नहीं की है. सियासी उभार के बाद उन्होंने सिर्फ लालू विरोध की राजनीति की है. बिहार में कुशवाहा जाति की आबादी करीब छह फीसदी है.

पटना: उपेंद्र कुशवाहा के हालिया बयान के बाद अब बिहार में अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं कि वे महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं. हालांकि कुशवाहा ने इस बात से साफ इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनें. उधर आरजेडी ने भविष्यवाणी कर दी है कि 2019 में कुशवाहा महागठबंधन का हिस्सा होंगे. बिहार में महागठबंधन में तीन बड़े प्लेयर आरजेडी, कांग्रेस और जीतन राम मांझी हैं. अगर इसमें कुशवाहा की एंट्री होती है तो सियासी गणित कैसा होगा इसको लेकर कई तरह के सवाल शुरू हो गए हैं.

बता दें कि उपेंद्र कुशवाहा ने कभी लालू यादव के नेतृत्व में राजनीति नहीं की है. सियासी उभार के बाद उन्होंने सिर्फ लालू विरोध की राजनीति की है. बिहार में कुशवाहा जाति की आबादी करीब छह फीसदी है. कुशवाहा के उभार से पहले नीतीश ही इस जाति का नेतृत्व करते थे. 1994 में लालू यादव से अलग होकर नीतीश कुमार ने जब समता पार्टी बनाई थी तब कुर्मी और कुशवाहा जाति को ही आधार वोटर माना गया था. इन दोनों जातियों की आबादी करीब 11 फीसदी है.

नीतीश कुमार ने विपक्ष में रहते हुए उपेंद्र कुशवाहा को काफी आगे बढ़ाने का काम किया. लेकिन कुशवाहा की महत्वकांक्षा बढ़ती गई और 2005 में जब नीतीश सीएम बने तभी से दोनों की दूरी बढ़ती चली गई. अब सवाल ये है कि उपेंद्र कुशवाहा अगर एनडीए छोड़ महागठबंधन से हाथ मिलाते हैं तो क्या होगा. क्या कोइरी जाति का मास वोट एनडीए से अलग हो जाएगा, क्या एनडीए को 2019 में सीटों का नुकसान होगा या फिर उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति ही खत्म हो जाएगी?

2015 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पार्टी के जितने उम्मीदवार उतारे थे उनमें से करीब आधा कोइरी जाति के थे. लेकिन इसमें सिर्फ एक कैंडिडेट ने ही जीत हासिल की. अगर वाकई में कुशवाहा समाज उपेंद्र कुशवाहा को ही नेता मानता तो ऐसा नहीं होता. ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा के अपनी जाति का थोक वोट ट्रांसफर कराने की क्षमता पर सवाल खड़ा होता है.

वैसे भी बीजेपी के समर्थन से ही पहली बार जीतकर कुशवाहा सांसद बने. ससे पहले 2005 के नीतीश लहर में खुद विधानसभा हार गये थे. अपने करियर में सिर्फ एक बार जंदाहा से विधानसभा जीते हैं. 2009 में अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़े तो कहीं जमानत नहीं बचा पाए. उधर सासंद अरुण कुमार के पार्टी छोड़ने से कुशवाहा वैसे भी कमजोर हो चुके हैं. ऐसे में कहा जा रहा है कि अगर वे लालू यादव के साथ जाते हैं तो आरजेडी को थोड़ा बहुत फायदा होगा लेकिन इनकी राजनीति को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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