Xप्लेन: जातिगत जनगणना क्या है और इसे लेकर इतना विवाद क्यों है?
1931 की जनगणना आख़िरी ऐसी जनगणना थी, जिसमें सभी जातियों का विस्तृत विवरण दर्ज किया गया था. इसके बाद सामान्य जनगणना में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा अन्य सभी जातियों की अलग-अलग गणना नहीं की गई.

भारतीय सामाजिक ढांचे में जाति एक प्राचीन, जन्म-आधारित और जटिल सामाजिक व्यवस्था है, जिसको लेकर समय-समय पर चर्चा और मतभेद होते रहे हैं. अब देश में 1931 (2011 में जारी नहीं किया गया) के बाद एक बार फिर जातिगत जनगणना होने जा रही है. जातिगत जनगणना में कुल आबादी के साथ-साथ देश के प्रत्येक नागरिक की जाति से संबंधित जानकारी भी जुटाई जाएगी. इसके अलावा उनके सामाजिक-आर्थिक हालात से जुड़ा जातिवार डेटा भी तैयार किया जाएगा.
इसी महीने 17 तारीख से जनगणना-2027 के दूसरे चरण की शुरुआत होगी. खबरों के मुताबिक, भारत का जो भी नागरिक अपनी जो भी जाति दर्ज कराएगा, उसे उसी रूप में दर्ज कर लिया जाएगा. इसके लिए किसी से जाति प्रमाण-पत्र या कोई अन्य दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा.
जातिगत जनगणना को लेकर कई विवाद भी हैं. मुख्य विवाद आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग, राजनीतिक नफ़ा-नुकसान और सामाजिक बंटवारे के गहरा होने की आशंकाओं से जुड़ा है. आइए, इस मुद्दे से जुड़े सभी पहुलओं को एक-एक कर समझते हैं.
भारत में वर्ण व्यवस्था क्या है?
भारत में वर्ण व्यवस्था की शुरुआत वैदिक युग से मानी जाती है. ऋग्वेद में सबसे पहले वर्णों का उल्लेख मिलता है. इसमें समाज को पुरुष का रूपक मानते हुए चार वर्णों का वर्णन किया गया है. इन चारों वर्णों की उत्पत्ति क्रमशः मुख, भुजाओं, जंघाओं और पैरों से बताई गई है.
इन्हीं वर्णों से आगे चलकर जाति व्यवस्था विकसित हुई. हालांकि प्रारंभ में जाति का निर्धारण व्यक्ति के कार्य (पेशा) के आधार पर होता था, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था वंशानुगत (Hereditary) बन गई. इसके बाद व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता, वही उसकी स्थायी सामाजिक पहचान बन जाती और उसे बदलना लगभग असंभव है.
चार प्रमुख वर्ण कौन से हैं और उनके कार्य का उल्लेख
वेदों के अनुसार समाज को इन चार वर्णों में विभाजित किया गया है
ब्राह्मण- पुजारी और धार्मिक कार्य करने वाले
क्षत्रिय- योद्धा, राजा और शासक वर्ग
वैश्य- किसान, व्यापारी और शिल्पकार
शूद्र- खेतिहर मजदूर, सेवक और श्रमिक

हजारों जातियां और उपजातियां
प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में केवल चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, लेकिन भारतीय समाज में समय के साथ हजारों जातियां और उपजातियां विकसित हो गईं. यही जाति सामाजिक प्रतिष्ठा, पेशे और समुदाय की वास्तविक इकाई बन गई.
चार प्रमुख वर्णों के अतिरिक्त अनेक अन्य जातियां हैं जैसे
भूमिहार – भूमि के स्वामी (जमींदार)
कायस्थ – लेखक, लिपिक और प्रशासनिक कार्य करने वाला समुदाय
राजपूत – उत्तर भारत का प्रमुख योद्धा समुदाय, जिसे क्षत्रिय वर्ग का हिस्सा माना जाता है
गरुड़ी – सांप पकड़ने या सांपों का खेल दिखाने वाले
सोंझारी – नदी की रेत से सोना निकालने का कार्य करने वाले
तो भारत में कुल कितनी जातियां हैं?
समाजशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग 3,000–4,000 प्रमुख जातियां और 25,000 से अधिक उपजातियां हैं. People of India परियोजना (Anthropological Survey of India) के अनुसार भारत में 4,600 से अधिक समुदाय दर्ज किए गए हैं. इनमें कई जातियां, उपजातियां और जनजातियां शामिल हैं.
1931 की जनगणना आख़िरी ऐसी जनगणना थी, जिसमें सभी जातियों का विस्तृत विवरण दर्ज किया गया था. इसके बाद सामान्य जनगणना में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा अन्य सभी जातियों की अलग-अलग गणना नहीं की गई.
ओबीसी कौन होते हैं?
इस बार जातिगत जनगणना में सबसे बड़ा मुद्दा ओबीसी की संख्या को लेकर है. भारतीय संविधान के तहत सामाजिक न्याय के उद्देश्य से ऐसे समुदायों की पहचान की गई, जो ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों में पीछे रह गए थे. इन्हें ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की श्रेणी में रखा गया.
ओबीसी की सूची केंद्र और राज्यों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है. कुछ प्रमुख ओबीसी समुदाय हैं- यादव, कुर्मी, जाट (कुछ राज्यों में), गुर्जर (कुछ राज्यों में), मौर्य, कुशवाहा, सैनी, नाई, लोहार, कुम्हार, तेली, कहार, मल्लाह आदि

ध्यान देने वाली बात यह है कि कोई जाति एक राज्य में ओबीसी हो सकती है, जबकि दूसरे राज्य में नहीं. केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में नॉन-क्रीमी लेयर ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है.
जाति जनगणना से ओबीसी का मुद्दा क्यों गर्म हो सकता है?
जातिगत जनगणना के बाद सभी जातियों के साथ ओबीसी की वास्तविक आबादी का भी आधिकारिक आंकड़ा सामने आएगा. यदि उनकी आबादी अपेक्षा से अधिक निकलती है, तो कुछ राजनीतिक दल 27 प्रतिशत आरक्षण बढ़ाने की मांग कर सकते हैं.
-भारत के कई राज्यों में ओबीसी मतदाता बड़ी संख्या में हैं। यदि उनकी वास्तविक आबादी के आंकड़े सामने आते हैं, तो राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन, चुनावी रणनीति और घोषणापत्र में बदलाव कर सकते हैं.

-ओबीसी कोई एक समान समूह नहीं है. इसमें सैकड़ों जातियां शामिल हैं. लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि कुछ अपेक्षाकृत मजबूत ओबीसी जातियों को आरक्षण का अधिक लाभ मिला है, जबकि अत्यंत पिछड़ी जातियां पीछे रह गई हैं. जातिगत जनगणना के आंकड़े इस बहस को नया आधार दे सकते हैं और ओबीसी के उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) की मांग तेज हो सकती है.
यह विवाद कब तेज हुआ?
1979 में मंडल आयोग का गठन हुआ. आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान की और 1931 की जनगणना के आधार पर अनुमान लगाया कि ओबीसी की आबादी लगभग 52 प्रतिशत है.
1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करने की घोषणा की. इसके बाद सवाल उठने लगा कि जब आरक्षण का आधार जनसंख्या है, तो ओबीसी की वास्तविक संख्या का नया आधिकारिक डेटा क्यों नहीं है.
इसके बाद 2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत सर्वेक्षण (SECC) कराया गया, लेकिन जातिवार आंकड़ों में तकनीकी और वर्गीकरण संबंधी समस्याएं बताकर उन्हें आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया. इससे विवाद और तेज हो गया.
2027 की जातिगत जनगणना से क्या बदल सकता है?
यदि जातिवार आंकड़े उपलब्ध हो जाते हैं, तो आगे इन मुद्दों पर बहस तेज हो सकती है—
क्या ओबीसी की वास्तविक आबादी 1931 के अनुमान से अलग है?
क्या आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए?
क्या ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) होना चाहिए?
क्या सरकारी योजनाओं और संसाधनों का वितरण नए आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए?
इस मुद्दे पर दो पक्ष
जाति जनगणना को लेकर फिलहाल दो प्रमुख मत हैं
एक पक्ष का मानना है कि इससे सामाजिक न्याय को मजबूती मिलेगी और सरकारें वास्तविक आंकड़ों के आधार पर बेहतर नीतियां बना सकेंगी. वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि इससे जातीय पहचान और वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ने का खतरा है.
यही वजह है कि जातिगत जनगणना केवल आंकड़े जुटाने का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, आरक्षण, नीति निर्माण और भारतीय राजनीति चारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है.






















