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Mayawati-Akhilesh Yadav का झगड़ा क्या है? जानिए, UP के दो दिग्गजों के बीच क्यों नहीं बन पा रही बात

Mayawati-Akhilesh Yadav Controversy: एक-दूजे की धुर विरोधी रही ये दोनों पार्टियां पूर्व में साथ रह चुकी हैं. 2019 का चुनाव दोनों ने मिलकर लड़ा था. चुनाव के बाद इन दोनों दलों की राहें जुदा हो गई थीं. 

Mayawati-Akhilesh Yadav Controversy: उत्तर प्रदेश (यूपी) में बुआ और भतीजे की सियासी लड़ाई एक फिर से जगजाहिर हुई है. मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (सपा) ने हाल ही में एक-दूजे को आड़े हाथों लिया, जिससे बहुत हद तक ये संकेत मिले कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में ये दोनों बड़े क्षेत्रीय दल साथ नहीं आने जा रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में इस 'प्वॉइंट ऑफ नो रिटर्न' (वापस साथ न आने की स्थिति) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को रोकने से जुड़े विपक्षी गठजोड़ के अभियान पर बड़ी चोट के तौर पर देखा जा रहा है. आइए, समझते हैं कि आखिरकार मायावती और अखिलेश के बीच पूरा विवाद क्या है और इनके बीच क्यों बात नहीं बन पा रही है:  

SP vs BSP की नौबत फिर इस वजह से आई

ताजा झगड़ा तब शुरू हुआ जब 7 जनवरी 2024 को मायावती ने यादव के एक बयान पर पलटवार किया था, जिसमें उन्होंने बसपा की विश्वसनीयता पर सवाल दागे थे. अखिलेश ने एक रोज पहले बलिया (यूपी में) दौरे पर मायावती के ‘इंडिया’ गठजोड़ में शामिल होने पर गठबंधन के मजबूत होने को लेकर पूछे गए सवाल पर 'मायावती पर भरोसे के संकट' की बात कही थी. मायावती इसी पर बोली थीं कि बसपा पर अनर्गल तंज कसने से पहले सपा चीफ को अपने गिरेबान में झांककर जरूर देखना चाहिए कि भाजपा को आगे बढ़ाने और मेलजोल में उनका दामन कितना दागदार है. मायावती ने माइक्रो ब्लॉगिंग मंच 'एक्‍स' पर इस बाबत अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की थी. ये रहे उनके पोस्ट्सः

 


Mayawati-Akhilesh Yadav का झगड़ा क्या है? जानिए, UP के दो दिग्गजों के बीच क्यों नहीं बन पा रही बात

X पर Mayawati ने SP पर खुलकर लगाए ये आरोप  

आगे मायावती ने सपा पर फिर करारा हमला बोला और उसे ‘जबरदस्त दलित विरोधी’ बताया. पूर्व सीएम ने सपा पर अपने पिछले शासन काल में बसपा दफ्तर के सामने पुल बनवाकर उसे ‘असुरक्षित’ करने का भी आरोप लगाया. साथ ही मौजूदा सरकार से पार्टी कार्यालय को किसी और सुरक्षित जगह पर शिफ्ट करने का भी आग्रह किया है. मायावती ने जून 1995 में हुए चर्चित ‘गेस्ट हाउस कांड’ का जिक्र करते हुए यह भी कहा कि अब सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जिससे भी गठबंधन की बात करते हैं उनकी पहली शर्त बसपा से दूरी बनाए रखने की होती है, जिसे मीडिया भी खूब प्रचारित करता है.

सियासी तौर पर अभी यहां हैं बुआ और भतीजा

दरअसल, सपा पर मायावती का आरोप रहा है कि वह बीजेपी के खिलाफ नहीं बोलती है. यही वजह है कि यादव का दल बसपा को भाजपा बी टीम भी बताता है. यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि पिछले कुछ सालों में मायावती ने खुलकर योगी सरकार पर हमला नहीं बोला है. हालांकि, मायावती सपा को दलित विरोधी करार देती हैं. मौजूदा समय की बात करें तो अखिलेश मोदी सरकार से लोहा लेने के खिलाफ बने इंडिया गठजोड़ के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, जबकि मायावती 'एकला चलो रे...' (अकेले) दिख रही हैं.  

अब हैं धुर-विरोधी, तब रहे गठजोड़ के सियासी साथी

वैसे, रोचक बात है कि एक-दूजे की धुर विरोधी रही ये दोनों पार्टियां पूर्व में साथ रह चुकी हैं. मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव इन दोनों दलों ने मिलकर लड़ा था. हालांकि, उस चुनाव में बसपा शून्य से 10 सीट पर आ गई थी, जबकि सपा की सीटों का आंकड़ा पांच पर अटक गया था. चुनाव के बाद इन दोनों दलों की राहें जुदा हो गई थीं. 

BSP क्यों है सबके लिए अहम? 
दरअसल, बसपा की पहचान दलितों, वंचितों और हाशिए पर रहने वाले लोगों की पार्टी की है. यूपी में फिलहाल 21% दलित वोटबैक है. वहीं, कुल 80 सीटों में से 17 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं और 42 सीटों पर दलितों का ठीक-ठाक असर समझा जाता है. यही वजह है कि कांग्रेस इंडिया गठजोड़ की छतरी तले बसपा को देखना चाहती है. राजनीतिक एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर बसपा साथ आती है तब विपक्ष को मुस्लिमों और पिछड़े के अलावा दलितों का भी साथ मिल सकता है. हालांकि, अखिलेश अब इस राह में रोड़ा बने हैं और मायावती ने भी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. थोड़ा पीछे जाकर देखें तो साल 2014 और 2019 के चुनाव में बीजेपी पाले में जमकर दलित वोट गया था. 

...तो यह है साथ न आने की बड़ी वजह?  

मायावती और अखिलेश के बीच बुनियादी तौर पर विचार, उम्र और अनुभव का अंतर समझ में आता है, पर दोनों का वोटबैंक कॉमन (एक) है, जो कि दोनों दिग्गजों के विवाद की गहरी जड़ माना जाता है. बसपा के संस्थापक कांशीराम की सोच पर चलने वाली मायावती चतुर नेत्री मानी जाती हैं. वहीं, दूसरी ओर यादव की छवि सौम्य स्वभाव के नेता की है.  

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