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Explained: इंसाफ या पुलिस की नाकामी पर पर्दा! बारुईपुर रेप केस आरोपी की एनकाउंटर में मौत, किन सवालों में उलझी गुत्थी?

Kolkata Encounter: बारुईपुर एनकाउंटर उस पैटर्न का हिस्सा है जो देश के कई राज्यों में देखने को मिलता है. आरोपी पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है और पुलिस कहती है कि उसने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की.

कोलकाता के दक्षिणी उपनगर बारुईपुर में एक ऐसी घटना हुई है जिसने पूरे पश्चिम बंगाल को हिला कर रख दिया है. एक नाबालिग लड़की के साथ रेप और हत्या के आरोपी की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई. पुलिस का कहना है कि आरोपी ने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की, लेकिन मानवाधिकार संगठनों से लेकर स्थानीय लोगों तक ने इस पूरी कार्रवाई पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. क्या यह सच में इंसाफ था या फिर पुलिस ने अपनी नाकामी छिपा ली...

बारुईपुर में हुआ क्या था, जो बात एनकाउंटर तक पहुंची?

5 जुलाई 2026 को बारुईपुर थाना क्षेत्र के सूर्यपुर इलाके में एक नाबालिग लड़की का शव एक स्थानीय तालाब से बरामद हुआ. लड़की 4 जुलाई (शनिवार) से लापता थी. परिजनों का आरोप था कि हत्या से पहले उसके साथ बलात्कार हुआ. शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, लड़की की मौत डूबने से हुई थी. लेकिन जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई, तो पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) की धाराओं के तहत रेप का मामला भी दर्ज किया.

यह घटना सामने आते ही इलाके में तनाव फैल गया. इतना गुस्सा था लोगों में कि भीड़ ने हत्या के शक में एक युवक की पिटाई कर दी, जिससे उसकी मौत हो गई.

आरोपी कौन था और कैसे हुई पुलिस से मुठभेड़?

पुलिस ने रविवार को एक आरोपी को गिरफ्तार किया. उसकी पहचान प्रभास मंडल के रूप में हुई. परिजनों ने CCTV फुटेज देखकर उसकी पहचान की थी.

7-8 जुलाई की दरमियानी रात पुलिस आरोपी प्रभास मंडल को क्राइम सीन रीक्रिएट कराने के लिए उसी तालाब के पास ले गई. पुलिस का दावा है कि इसी दौरान आरोपी ने एक पुलिसकर्मी की सर्विस रिवॉल्वर छीनकर भागने की कोशिश की. इसके बाद पुलिस ने उस पर गोली चला दी. घायल आरोपी को बारुईपुर उप-मंडलीय अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस पर पहले से ही थे आरोप

मुठभेड़ से पहले ही पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे थे. एक स्थानीय निवासी के मुताबिक, 'उस रात करीब साढ़े आठ बजे हमने पुलिस को सूचना दी थी, लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया. रविवार सुबह स्थानीय लोगों से जानकारी मिलने के बाद हमने इलाके के CCTV फुटेज खंगाले और खुद मुजरिम की पहचान कर उसे पकड़ लिया.'

उन्होंने आगे दावा किया, 'मुजरिम ने थाने में अपना अपराध कबूल किया था. हम उसके साथ घटनास्थल पर गए और शव बरामद कराया. इसके बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.' यानी पुलिस ने शुरुआती शिकायत पर कार्रवाई नहीं की, तो स्थानीय लोगों ने खुद जांच की, आरोपी को पकड़ा और पुलिस के सामने पेश किया. फिर पुलिस मुठभेड़ में उसी आरोपी की मौत हो गई.

बीजेपी नेता पर आरोप और आरोपी की मां का दर्द क्या?

इस पूरे मामले में स्थानीय बीजेपी नेता शांतनु मंडल का नाम भी सामने आया. स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि शांतनु मंडल ने आरोपी को भागने में मदद की. हालांकि, शांतनु मंडल ने इन आरोपों से इनकार किया है. उन्होंने मीडिया से कहा, 'घटना की जानकारी मिलने के बाद हम थाना प्रभारी के पास गए और शिकायत दर्ज कराई. CCTV फुटेज देखने के बाद हमने एक व्यक्ति को पहचाना जो लड़की को ले जाते हुए दिखा था. हमने उसे खुद पकड़ा और उसने अपराध स्वीकार किया.'

इस पूरी घटना में सबसे चौंकाने वाला पहलू आरोपी की मां का बयान था. उन्होंने ANI से कहा, 'दो पुलिसकर्मी मेरे घर आए थे. मैं अभी-अभी उठी थी. उन्होंने मुझे बताया कि मेरे बेटे की मौत हो गई है और पूछा कि क्या मैं अस्पताल जाना चाहती हूं. मैंने उनसे कहा कि मैं नहीं जा सकती, क्योंकि मेरे पति बीमार हैं.'

उन्होंने आगे कहा, 'मैंने कहा कि आप लोग जो करना चाहते हैं, करिए. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. मेरे बेटे ने जो किया, उसकी उसे सजा मिल गई. मैं उसका शव स्वीकार नहीं करूंगी. मैं उसका शव अपने घर भी नहीं लाऊंगी. उसने कोई अच्छा काम नहीं किया. उसने गलत किया था और उसी की उसे सजा मिली है. उसे मार दें या जो करना हो करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है. मुझे उसकी लाश नहीं चाहिए.'

एक मां का अपने बेटे के लिए यह बयान बताता है कि इस घटना ने समाज को किस हद तक झकझोर दिया है.

मानवाधिकार संगठन ने क्या सवाल उठाए?

जहां एक तरफ पुलिस अपनी कार्रवाई को सही ठहरा रही है, वहीं मानवाधिकार संगठनों ने इस मुठभेड़ पर गंभीर सवाल उठाए हैं...

एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (APDR) के सदस्य रंजीत सूर का कहना है, 'यह मामला संदिग्ध है. यह व्यक्ति पूरे मामले का सबसे अहम गवाह था. उसकी मौत के बाद पुलिस अपनी सुविधा के अनुसार कहानी गढ़ सकती है और अपनी विफलताओं पर पर्दा डाल सकती है.'

उन्होंने यह भी कहा कि देश के कई राज्यों में पुलिस मुठभेड़ों की कहानी लगभग एक जैसी होती है. यानी मुजरिम पुलिस का हथियार छीनकर भागने की कोशिश करता है और फिर मुठभेड़ में मारा जाता है.

'हथियार छीनकर भागने' का पैटर्न: यह कोई पहला मामला नहीं

बीते सालों में देश के अलग-अलग राज्यों में कई ऐसे मुठभेड़ के मामले सामने आए हैं, जिनमें पुलिस ने यही दावा किया कि मुजरिम ने पुलिस का हथियार छीनकर भागने की कोशिश की.

2019 में हैदराबाद में एक पशु चिकित्सक के रेप और हत्या के चार आरोपियों की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई थी. पुलिस का दावा भी वही था कि क्राइम सीन रीक्रिएट करने के दौरान आरोपियों ने हथियार छीनकर भागने की कोशिश की. उस घटना के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग' (कानूनी प्रक्रिया के बाहर की हत्या) बताया था और इसकी निंदा की थी. संगठन ने कहा था कि दोषियों को निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा मिलनी चाहिए.

उत्तर प्रदेश के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं. यूपी पुलिस के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 9 साल के कार्यकाल में राज्य में 17,043 पुलिस मुठभेड़ की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 289 अपराधियों की मौत हुई. पुलिस का कहना है कि इनमें से कई मामलों में आरोपी क्राइम सीन रीक्रिएट करने के दौरान पुलिस का हथियार छीनकर भागने की कोशिश कर रहे थे.

यानी बारुईपुर की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है. यह एक पैटर्न है जो देशभर में दिखता है.

राजनीति की आंच से नहीं बच पाया मामला

इस घटना के बाद राजनीतिक दलों ने भी एक-दूसरे पर आरोप लगाने शुरू कर दिए.

TMC ने दावा किया कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बारुईपुर जाना चाहती थीं, लेकिन उन्हें हाउस अरेस्ट कर लिया गया. वहीं, बीजेपी ने TMC के इन आरोपों को खारिज कर दिया. इलाके में हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं. बारुईपुर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है और प्रशासन का कहना है कि इलाके में और अशांति न फैले, इसके लिए कदम उठाए जा रहे हैं.

तो क्या यह मामला खत्म हुआ या कोई सवाल छूट गए?

बारुईपुर का यह मामला कई सवाल खड़े करता है:

  • क्या पुलिस ने शुरुआती शिकायत पर कार्रवाई की होती, तो लड़की की जान बच सकती थी? स्थानीय लोगों का यही आरोप है.
  • जब स्थानीय लोगों ने खुद आरोपी को पकड़ा और पुलिस को सौंपा, तो क्या पुलिस को उसे सुरक्षित हिरासत में रखना चाहिए था?
  • क्या आरोपी ने सच में पुलिस का हथियार छीनकर भागने की कोशिश की, या यह पुलिस अपनी नाकामी छिपा रहा है?
  • जब आरोपी पूरे मामले का सबसे अहम गवाह था, तो क्या उसकी मौत से जांच प्रभावित नहीं होगी?

यह घटना एक बार फिर से पुलिस मुठभेड़ों पर बहस छेड़ देती है. क्या कानून को अपने हाथ में लेना सही है? क्या पुलिस को 'एनकाउंटर' का अधिकार है? या फिर आरोपी को भी निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया का हक है?

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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