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सोशल मीडिया पर चुनावी चर्चा पर सजा का वायरल सच

नई दिल्ली: अगर आपको सोशल मीडिया पर मजाक करने की आदत है और खासकर आप राजनेता या राजनीतिक पार्टी पर तंज कसते हैं तो ये खबर ध्यान से पढ़ें. क्योंकि, खबर कुछ ऐसी है जो मजाक करने वालों को परेशान कर रही है. एक मैसेज के जरिए दावा किया जा रहा है कि अगर आपने ऐसा किया तो आपके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. ऐसा करने के पीछे चुनाव आचार संहिता का हवाला दिया जा रहा है.

आखिर क्या है इस खबर का पूरा सच

क्या आपने अपने फेसबुक या वॉट्सऐप के जरिए उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में मुलायम और अखिलेश के बीच चल रही महाभारत पर कोई राय दी है ? क्या आपने नवजोत सिंह सिद्धू के बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने पर सोशल मीडिया पर कोई प्रतिक्रिया दी है.

आप किसी पार्टी से जुड़े हो या ना जुड़े हों भले ही आप किसी पार्टी के उम्मीदवार ना हो, लेकिन अगर आप इस तरह की बातें या टिप्पणियां फेसबुक या वॉट्सऐप पर कर रहे हैं तो ये खबर आपके लिए है. क्योंकि, दावा है कि ऐसा करने वालों को सजा मिल सकती है.

सोशल मीडिया पर चुनावी चर्चा पर सजा का वायरल सच

दावा है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक पार्टी और नेताओं पर कमेंट करने वाले लोगों पर एक कमेटी नजर बनाए हुए है. ये कमेटी चुनाव आयोग ने गठित की है अगर आपने ऐसा किया तो आपको चुनाव आयोग सजा दे सकता है.

इन दावों के पीछे है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक मैसेज जिसमें लिखा है=

‘’निर्वाचन आयोग द्वारा जारी सूचना कृपया ध्यान से पढ़ें

निर्वाचन आयोग ने सोशल मीडिया के लिए गाइडलाइंस यानि दिशानिर्देश जारी किए हैं. ये दिशानिर्देश आचार संहिता को ध्यान में रखकर जारी किए गए हैं. जो सोशल मीडिया पर प्रचार प्रसार के लिए हैं. अगर आप फेसबुक, वॉट्सऐप या ट्विटर पर किसी पार्टी या किसी नेता को लेकर पोस्ट करते हैं तो इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा.’’

मैसेज के मुताबिक, ‘’अगर आप किसी नेता पर जोक्स शेयर भी करते हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि चार जनवरी से आठ मार्च तक निर्वाचन आयोग ने कमेटी गठित की हुई है जो सोशल मीडिया पर नजर रखें हुए है.

अगर आप सोशल मीडिया पर इस तरह की कोई पोस्ट करते हैं तो आयोग आप पर आचार संहिता के उल्लंघन में कार्रवाई कर देगा. जिन्हें मैसेज पर किए दावे पर शक है उनके लिए लिखा है कि वो निर्वाचन आयोग की वेबसाइट eci.nic.in पर जाकर भी देख सकते हैं.’’

सोशल मीडिया पर चुनावी चर्चा पर सजा का वायरल सच

सबसे नीचे लिखा है- मुख्य चुनाव आयुक्त- नसीम जैदी

ये मैसेज लोगों को डरा रहा है. धमका रहा है और परेशान कर रहा है. क्योंकि ये युग सोशल मीडिया का है किसी भी राजनीतिक पार्टी की हलचल या नेता के बयान का पोस्टमार्टम सोशल मीडिया पर जरूर होता है औऱ लोग टिप्पणी करने के साथ-साथ राय भी रखते हैं और तंज भी कसते हैं ऐसे में सजा का दावा परेशान करने वाला है.

सोशल मीडिया पर चुनावी चर्चा पर सजा का वायरल सच

लेकिन ये कितना सच है ये जानने के लिए एबीपी न्यूज ने वायरल मैसेज की पड़ताल की. इस मैसेज का सच और इसका असर समझने के लिए हमारे दर्शकों का ये जानना जरूरी है कि चुनाव आचार संहिता क्या होती है?

चुनाव आचार संहिता क्या होती है?

  • देश में आदर्श आचार संहिता की शुरुआत सबसे पहले 1960 में केरल के विधानसभा से हुई थी.
  • इसके बाद 1962 के लोकसभा चुनावों में आचार संहिता के नियम सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को बताए गए.
  • 1991 में आचार संहिता को देश में पहली बार बड़ी मजबूती दी गई.
  • 1994 में चुनाव आयोग ने आचार संहिता तोड़ने पर पार्टी की मान्यता तक रद्द करने का नियम बनाया.
  • अगर आज के नियमों की बात करें तो चुनाव आचार संहिता कहती है कि पार्टी या प्रत्याशी दो धर्मों को बांटने वाली बात नहीं कह सकता.
  • वोट के लिए जाति-धर्म पर आधारित बात नहीं बोल सकता.
  • वोटर को रिश्वत देकर, डरा धमकाकर वोट नहीं मांग सकता.
  • किसी भी पब्लिक मीटिंग-जुलूस से पहले पार्टी-प्रत्याशी को स्थानीय प्रशासन से इजाजत लेनी होगी.
  • सत्ताधारी पार्टी सरकारी दौरे को चुनावी इस्तेमाल में नहीं ला सकतीं.
  • सरकारी इमारत, गाड़ी, हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल नहीं हो सकता.

अब चलिए इस खबर के सच की तरफ यानि ऐसा करने पर क्या आपको सजा हो सकती है? मैसेज में चार जनवरी की तारीख बताई जा रही है, क्योंकि चार जनवरी को ही चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान किया था.

मैसेज नसीम जैदी के नाम से वायरल किया जा रहा है जो मुख्य चुनाव आयुक्त हैं.यहां तक की बातें तो सही हैं, लेकिन आम लोगों के कमेंट्स और मजाक पर निगरानी वाली कोई कमेटी गठित हुई है या नहीं ये जानने के लिए एबीपी न्यूज ने सीधे चुनाव आयोग से संपर्क किया.

चुनाव आयोग के उच्च सूत्रों ने एबीपी न्यूज को बताया कि सबसे पहली बात की चुनाव आचार संहिता सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों पर ही लागू होती है. आयोग ने साफ किया कि आम नागरिक का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ भी लिखना आचार संहिता के तहत नहीं आता है और ना ही इसके लिए कोई कार्रवाई हो सकती है.

यहां एबीपी न्यूज ये स्पष्ट कर देना चाहता है कि अगर सोशल मीडिया पर किसी के कुछ लिखने से शांति व्यवस्था भंग होती है या फिर किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचती है तो आचार संहिता तो नहीं लेकिन देश के सामान्य कानून की धाराएं जरूर लागू हो सकती हैं और कार्रवाई भी हो सकती है.

सोशल मीडिया पर चुनावी चर्चा पर सजा का वायरल सच

इसलिए एबीपी न्यूज की पड़ताल में वायरल मैसेज झूठा साबित हुआ है.

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