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उत्तर प्रदेश की एक बच्चे की नीति पर वीएचपी ने उठाए सवाल, कहा- दो बच्चे की पॉलिसी पर हो विचार

उत्तर प्रदेश विधि आयोग को भेजे गए सुझाव में विश्व हिंदू परिषद ने उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण कानून से एक बच्चे की नीति को हटाने का आग्रह किया है.

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के लिए नई जनसंख्या नीति का ऐलान किया है. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के राज्य विधि आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण बिल के ड्राफ्ट को लेकर लोगों से उनके सुझाव मांगे हैं. इसी कड़ी में विश्व हिंदू परिषद की तरफ से भी उत्तर प्रदेश विधि आयोग को सुझाव भेजा गया है. अपने सुझावों में विश्व हिंदू परिषद ने राज्य विधि आयोग की प्रस्तावित एक बच्चे की नीति को हटाने की मांग की है. साथ ही सुझाव दिया है कि राज्य में दो बच्चों की नीति को लागू करना चाहिए. इसके लिए वीएचपी ने तर्क यह दिया है कि एक बच्चे की नीति उत्तर प्रदेश अलग-अलग समुदायों के बीच जनसंख्या असंतुलन पैदा कर सकती है, क्योंकि परिवार नियोजन और गर्भ निरोध के उपायों को लेकर सबकी सोच अलग है.

उत्तर प्रदेश विधि आयोग को भेजे गए सुझाव में विश्व हिंदू परिषद ने उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण कानून से एक बच्चे की नीति को हटाने का आग्रह किया है. राज्य विधि आयोग को भेजे सुझाव में विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण और परिवार में दो बच्चों की नीति को प्रोत्साहन देने के प्रस्तावित कानून के उद्देश्य से परिषद सहमत है लेकिन एक बच्चे के लिए प्रोत्साहन के प्रस्ताव से जनसंख्या में नकारात्मक वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा.

पुनर्विचार की मांग

वीएचपी की तरफ से कहा गया है कि प्रस्तावित कानून में निश्चित समय सीमा में कुल प्रजनन दर 1.7 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है, जिस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए. विशेष तौर पर एक ही बच्चा होने पर सरकारी कर्मचारियों और अन्य लोगों को प्रोत्साहन की नीति पर फिर से विचार होना चाहिए. वीएचपी के मुताबिक किसी समाज में जनसंख्या तब स्थिर होती है, जब एक महिला से जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या कुल प्रजनन दर 2 से कुछ अधिक होती है. प्रजनन दर यदि 2.1 होगी, तब यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है. 

उत्तर प्रदेश के विधि आयोग को भेजे गए सुझाव में वीएचपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण के लिए दो बच्चों की नीति पर विचार होना चाहिए. एक महिला के औसतन दो से कम बच्चों की नीति अपनाने से जनसंख्या को लेकर समय के साथ अंतर्विरोध पैदा होंगे. इस कारण कई तरह के सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव होंगे. युवाओं और परिवार पर निर्भर लोगों की संख्या का अनुपात गड़बड़ा जाएगा. एक बच्चे की नीति के चलते आने वाले सालों में स्थिति ऐसी हो जाएगी कि एक समय पर परिवार में 2 माता-पिता और बुजुर्ग पीढ़ी के 4 सदस्यों की देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ एक कामकाजी युवा के कंधों पर आ जाएगी.

उद्देश्य से भटक सकती है नीति

इस सुझाव में कहा गया है कि एक बच्चे की नीति उत्तर प्रदेश के अलग-अलग समुदायों के बीच जनसंख्या असंतुलन पैदा कर सकती है, क्योंकि परिवार नियोजन और गर्भ निरोध के उपायों को लेकर सबकी सोच अलग है. भारत के कई प्रदेशों में यह असंतुलन पहले से ही बढ़ रहा है. असम और केरल का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इन राज्यों में दो समुदायों के बीच असंतुलन खतरे के स्तर तक बढ़ गया है, जहां जनसंख्या की कुल वृद्ध दर घट गई है. केरल और असम जैसे प्रदेशों में हिंदू समुदाय में प्रजनन दर 2.1 से कम हो गई है. असम में मुस्लिम प्रजनन दर 3.16 और केरल में 2.33 हो गई है. इसलिए उत्तर प्रदेश को इस स्थिति में पहुंचने से बचना चाहिए. लिहाजा जनसंख्या नीति में आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए. वरना एक बच्चे की नीति उद्देश्य से भटका सकती है.

चीन का दिया उदाहरण

राज्य विधि आयोग को भेजे गए सुझाव में वीएचपी ने चीन का उदाहरण भी दिया है. सुझाव में कहा गया कि चीन ने 1980 में एक बच्चे की नीति अपनायी थी. तकनीकी तौर पर इसे 1-2-4 की नीति कहते हैं लेकिन इसके दुष्परिणामों को दूर करने के लिए चीन को उन माता-पिता के लिए इस नीति में ढील देनी पड़ी, जो अपने माता-पिता के अकेले बच्चे थे. नतीजा यह हुआ तीन दशकों के अंदर चीन ने इस नीति को पूरी तरह समाप्त कर दिया.

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